एफ़-16 डील मोदी के लिए राजनीतिक शर्मिंदगी?

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हाल के महीनों में, अमरीकी अधिकारियों ने स्पष्ट तौर पर भारतीय वार्ताकारों से कहा है कि भारत और अमरीका अधिकांश मामलों में 95 फ़ीसदी तक एकमत हैं, लेकिन जब पाकिस्तान या एक हद तक अफ़ग़ानिस्तान की बात आती है तो यही सहमति सिमटकर 5 प्रतिशत पर आ जाती है.

ओबामा प्रशासन के पाकिस्तान को 8 एफ़-16 लड़ाकू विमान देने पर भारत की तीखी प्रतिक्रिया और भारत की ‘निराशा’ और ‘नाराजगी’ पर अमरीकी लापरवाही ने दिखाया है कि जब बात पाकिस्तान की आती है तो दोनों देश एक दूसरे से कैसी सहमति रखते हैं?

इससे ये संकेत मिलते हैं कि नजदीकी और गहरे रणनीतिक संबंध रखने की कोशिश कर रहे भारत और अमरीका के बीच कैसे 'पी' शब्द एक बड़ी बाधा बना रहेगा.

अमरीका की पाकिस्तान को एफ़-16 विमानों की बिक्री पर भारत का गुस्से को ख़ारिज करना ग़लत होगा क्योंकि जब भी दोनों में से कोई भी देश रक्षा उपकरणों की ख़रीद करता है या अपना रक्षा बजट बढ़ाता है तो वे इसी तरह का विरोध दर्ज कराते हैं.

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हालाँकि दोनों पक्ष जानते हैं कि उनके विरोध का दूसरे पक्ष के लिए कोई मतलब नहीं है, अब तो ये दस्तूर सा बन गया है कि कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं होता.

भारत की सैन्य हैसियत पाकिस्तान के मुक़ाबले मजबूत बनी है. भले ही पाकिस्तान को चीन से या आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध के नाम पर अमरीका से हथियार मिलते रहे हों. अब भी, आठ एफ़-16 विमान मिलने से पाकिस्तान की स्थिति में भारत के मुक़ाबले बहुत इजाफा नहीं होगा.

इसलिए, अमरीका के साथ भारत का असंतोष लड़ाकू विमानों की संख्या को लेकर नहीं, बल्कि पाकिस्तान को इस तरह की बिक्री से इस क्षेत्र में जाने वाले संदेश को लेकर है.

अमरीकियों का ये तर्क हास्यास्पद है कि वो पाकिस्तान को लड़ाकू विमान आंतकवाद का मुक़ाबला करने के प्रयासों में सहायता के तहत दे रहे हैं. ये देखते हुए कि तालिबान के पास कोई वायु सेना या यहाँ तक कि कोई वायु रक्षा प्रणाली नहीं है.

पाकिस्तान उनके ख़िलाफ़ आसानी से चीन के डिज़ाइन किए और पाकिस्तान में बने जेएफ़-17 विमानों का इस्तेमाल कर सकता है. इन्हीं के बारे में पाकिस्तान डींग हांकता रहा है कि जेएफ़-17 अमरीकी एफ़-16 के मुक़ाबले कहीं बेहतर है.

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अमरीकी पाकिस्तान को न केवल एफ़-16 विमान दे रहे हैं, बल्कि उन्होंने पाकिस्तान को हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और अन्य हथियार प्रणालियों की आपूर्ति भी की है, जिनका इस्तेमाल भारत के ख़िलाफ़ हो सकता है.

जाहिर है, पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी प्रयासों को मजबूती देना कमज़ोर दलील है. अमरीका मानता रहा है कि वो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए ऐसा कर रहा है, लेकिन यदि ये हित भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के ख़िलाफ़ हैं तो ये भारत के लिए बहुत बुरा है.

ये असहज हक़ीक़त है जो कि अब भारत को पीड़ा पहुँचा रही है.

हालाँकि भारत-अमरीकी संबंध पाकिस्तान पर टिके नहीं रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान दोनों को राजनीतिक और सामरिक रूप से प्रभावित करता रहा है. एफ़-16 सौदे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शर्मिंदगी के रूप में देखा जा रहा है और उसकी वजह ये है कि मोदी अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ निकटता को अपनी विदेश नीति की एक उपलब्धि के रूप में बताते रहे हैं.

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स्पष्ट है, कि अमरीकी संसद के विरोध के बावजूद ओबामा प्रशासन का पाकिस्तान को एफ़-16 विमान देना दिखाता है कि दोनों नेताओं के बीच ‘दोस्ती’ का कोई मतलब नहीं है जब राष्ट्रीय सुरक्षा और अपने हितों को आगे बढ़ाने की बात आती है.

रणनीतिक तौर पर, भारत में ये भावना तेज़ी से उभर रही है कि अफ़ग़ानिस्तान की पहेली को सुलझाने के लिए पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मदद दे कर अमरीका एक बार फिर ऐतिहासिक भूल कर रहा है.

ये नीति अतीत में भी नाकाम रही है और भविष्य में भी इसका विफल होना तय है.

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इस विफलता का असर जितना भारत पर पड़ेगा उतना अमरीका पर नहीं. क्योंकि भारत जिहादियों से न केवल अपने देश में, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में भी जूझ रहा है. पाकिस्तान को जिहादियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई के लिए दबाव डालने की बजाय अमरीकी उसे खुश करने में लगे हुए हैं.

स्वाभाविक रूप से, भारत अमरीकियों की इस सरासर मूर्खता को देखकर हैरान है.

भारत और अमरीका दोनों घोषणा कर रहे हैं कि 21वीं सदी में उनके रिश्ते निर्णायक होंगे. लेकिन ये तब तक नहीं होगा जब तक कि वे पाकिस्तान पर अपनी नीतियों पर एक सुर न हो जाएं.

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