'डेवलपरों ने ज़मीन ले ली, अब हमें आरक्षण चाहिए'

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पश्चिमी दिल्ली की तरफ सुबह आठ बजे जब आप बहादुरगढ़ की ओर बढ़ते हैं तो आम दिनों पर ये रास्ता ट्रैफिक से जाम हो जाता है.

लेकिन फिलहाल ये पूरी तरह से सूनसान है. सड़क के किनारे ट्रकों की लंबी कतार लगी है. कुछ लोगों ने टेंट लगा रखा है और उसमें दरी बिछाकर लेटे हुए हैं. कुछ बुज़ुर्ग लोग हुक्के का मज़ा ले रहे हैं.

ये सभी लोग पिछले कई दिनों से सड़कों पर ही मौजूद हैं और किसी भी तरह के वाहन को यहां से नहीं गुज़रने दे रहे.

कुछ आक्रामक युवा हाथों में डंडे लिए सड़क पर गश्त लगा रहे हैं. पैदल लोगों को तो निकलने दिया जा रहा है, लेकिन उनके सिवा किसी को भी जाने की इजाज़त नहीं है.

एक निराश युवक ने मुझे बताया, "मुझे यहां से दूसरे शहर जाना था, मेरी नौकरी का पहला दिन है. लेकिन उन्होंने मुझे नहीं जाने दिया."

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अपनी बाइक को वापस मोड़ते हुए उसने मुझे ये जानकारी दी. जैसे-जैसे हम बैरीकेड का वीडियो ले रहे थे वहां मौजूद प्रदर्शनकारी हमें बहुत ही चौकसी से देखने लगे.

कुछ प्रदर्शनकारी हमारे नज़दीक आए और कहा, "मीडिया ने हमारे साथ सही नहीं किया. तुम बस ये कह रहे हो कि हम मुश्किलें बढ़ा रहे हैं, लेकिन हम यहां शांतिपूर्वक इकट्ठा हुए हैं."

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जैसे ही मैंने कैमरे पर बात करने की कोशिश की, तभी उनमें से एक ने लेंस पर हाथ रखते हुए कहा, "पहले हमसे बात करो, हमारी बात सुनो तभी हम तुम्हें तुम्हारा काम करने देंगे."

एक अन्य प्रदर्शनकारी सुखराम धनकड़ कहते हैं, "हम यहां पिछले कई दिनों से मौजूद हैं, लेकिन कोई भी नेता हमसे मिलने नहीं आया."

धनकड़ ने कहा, "पुलिस बेवजह हमें उकसा रही है. वो ज़ोर-ज़बरदस्ती कर रहे हैं. हम में से कई लोग घायल हुए हैं."

जैसे ही उन्होंने बोलना ख़त्म किया, सशस्त्र पुलिसवाले वहाँ पहुंच गए. जैसे ही उनके अधिकारियों ने आदेश दिया उन्होंने सड़कों के किनारे खड़े ट्रकों को वहां से हटाना शुरू कर दिया, जिससे सड़कों को साफ किया जा सके.

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वहां मौजूद टेंट उखाड़ दिए गए और उसमें रह रहे लोगों को वहाँ से जाने के लिए कहा गया. लेकिन इसके बावजूद वहां से कोई नहीं गया.

प्रदर्शनकारी वहीं नीचे ज़मीन पर बैठकर नारेबाज़ी करने लगे और पुलिस देखती रही.

कुछ ही मिनटों में वहां मौजूद कुछ प्रदर्शनकारियों ने वहां बचे हुए ट्रकों के टायरों की हवा निकाल दी, जिससे कि उन्हें वहां से हटाया न जा सके.

इसके बाद पुलिस ने वहां से हटने का फैसला किया. उनके जाने के तुरंत बाद टेंट फिर से लगा दिए गए. इसके बाद और अधिक ट्रकों को वहां लाया गया जिससे सड़कों पर अवरोध पैदा किया जा सके.

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एक प्रदर्शनकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि वो वहां से नहीं हटेंगे. सरकार द्वारा दी गई कुछ रियायतों की ख़बर से भी वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, "हमें उन पर भरोसा नहीं है. हमें लिखित में चाहिए." हम दिल्ली के बाहरी इलाकों पर खड़े हैं.

यहां की अधिकतर ज़मीन खेती के लायक थी. लेकिन अब वहां बड़ी इमारतें हैं और कुछ पर काम चल रहा है.

धनकड़ कहते हैं, "हम किसान हैं, हमारे पास अब खेती के लिए कोई ज़मीन नहीं बची है. डेवलपरों ने ये ज़मीनें ले ली हैं. इसलिए हमें सरकारी नौकरियां चाहिए."

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