नेहरू का बेटा होता तो इंदिरा का क्या होता?

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भारतीय राजनीति की 'अगर ऐसा होता तो क्या होता' वाली तमाम तरह की अटकलों में 'इंदिरा गांधी का कोई भाई होता तो क्या होता' वाली अटलकबाज़ी सबसे मशहूर है.

इसका जवाब ढूंढने के लिए आपको बिहार की राजनीति को देखने की ज़रूरत है. बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव लालू प्रसाद के आठवें बच्चे और दूसरे नंबर के लड़के हैं.

26 साल के तेजस्वी देश के अब तक के सबसे कम उम्र के उपमुख्यमंत्री हैं. उनके साथ लालू प्रसाद यादव के परिवार से तेजस्वी के बड़े भाई तेज प्रताप भी मंत्री हैं.

लालू प्रसाद की पहली बेटी मीसा भारती हैं जिनका नाम उन्होंने इमरजेंसी के दौरान लगने वाले मीसा क़ानून के नाम पर रखा है.

उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज से स्त्रीरोग में डिस्टिंक्शन के साथ एमबीबीएस की डिग्री हासिल की है.

अब फिर से बात करते हैं 'अगर ऐसा होता तो क्या होता' की.

इंदिरा गांधी की बुआ कृष्णा नेहरू हथीसिंग 19 नवंबर, 1917 को इंदिरा गांधी के जन्म के वक्त घर पर मौजूद थी.

वो कमला नेहरू का इलाज करने वाले स्कॉटिश डॉक्टर की बात याद करते हुए बताती हैं, "यह एक सुंदर लड़की है, सर!"

लेकिन परिवार के विश्वासपात्र और करीबी रहे मुबारक अली उस नवजात को मोतीलाल नेहरू का 'पोता' कहते रहे.

मोतीलाल ने अपनी पत्नी स्वरूप रानी और वहां मौजूद दूसरे लोगों से कहा, "क्या हमने अपने लड़के और दो लड़कियों के परवरिश में कोई फर्क किया है? क्या तुम दोनों से बराबर का प्यार नहीं करती? जवाहर की यह बेटी हज़ारों बेटों से बेहतर साबित होगी."

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जब सोनिया गांधी दिसंबर 1997 में राजनीति में आई थी तो उनसे अक्सर प्रियंका गांधी के बारे में पूछा जाता था और वो हमेशा राहुल गांधी की बात करती थी. वो कहती थीं ये उनके बच्चों का फ़ैसला होगा कि राजनीति में आना है या नहीं.

साल 2004 में सोनिया ने कहा कि प्रियंका एक मां के रूप में ज्यादा बेहतर भूमिका निभा रही हैं. प्रियंका ने खुद 2009 में कहा था कि इंदिरा की पसंद राहुल थे.

उन्होंने कहा था, "बिल्कुल उनकी (इंदिरा गांधी) पहली पसंद मेरा भाई था और उनके पोते की वजह से मैं उनकी आदर्श पोती बनते-बनते रह गई."

इंदिरा और सोनिया दोनों ही राहुल को लेकर हमेशा से सकारात्मक बनी रहीं जबकि कांग्रेस पार्टी के कई हलकों में प्रियंका गांधी को आज की पार्टी का नेतृत्व संभालने की बात की जाती रही है.

भारत के दूसरे राजनीतिक परिवारों की बात करें तो बादल, सिंधिया, अब्दुल्लाह और करुणानिधि परिवारों की महिलाएं या तो महज इत्तेफाक से राजनीति में आईं है या उन्हें अपने भाइयों के साथ राजनीति में आना पड़ा है.

1996 का साल मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा के लिहाज से अहम रहा था क्योंकि जम्मू-कश्मीर में कई सालों के बाद चुनाव हो रहा था.

मुफ्ती कांग्रेस में थे और उन्हें एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो दक्षिणी कश्मीर के बीजबेहरा से लड़ सकें.

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बाद में महबूबा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता की पसंद उनका बेटा तासादुक़ हुसैन था लेकिन चूंकि उनकी उम्र कम थी इसलिए उन्हें अपने पिता के साथ खड़ा होना पड़ा.

डीएमके के वरिष्ठ नेता एम करुणानिधि की बेटी कनिमोझी ने जरूर अपने पिता का विश्वास हासिल किया था लेकिन ये तब हुआ जब उनके भाई एमके स्टालिन को करुणानिधि का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था.

लेकिन करुणानिधि की 2001 में गिरफ्तारी के बाद कनिमोझी की राजनीतिक किस्मत बदल गई. 2009 में वो डीएमके की स्टार प्रचारक थीं. करुणानिधि ने कनिमोझी में जयललिता का प्रतिद्वंदी देखा.

राजमाता सिंधिया और उनके लड़के माधवराव सिंधिया के बीच राजनीतिक और घरेलू लड़ाई का फायदा उनकी बेटी वसुंधरा को अपना राजनीतिक करियर बनाने में मिला.

माधवराव ने 1972 में जन संघ को छोड़कर कांग्रेस का दामन पकड़ लिया.

इसके बाद राजमाता ने वसुंधरा को अपना उत्तराधिकारी चुना जो अब राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं.

वसुंधरा की राजनीतिक ज़िंदगी का पहला पड़ाव तब आया जब 1984 में वे बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य बनीं.

उनकी छोटी बहन यशोधरा राजे 1994 में राजनीति में आईं. अब वो शिवराज सिंह चौहान की सरकार में मंत्री हैं.

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कश्मीर के अब्दुल्लाह परिवार से एक औरत संसद में पहुंची थी. वो थी फारुक़ अब्दुल्लाह की मां बेगम अकबर जहान जिन्होंने शेख़ अब्दुल्लाह के जेल जाने के बाद नेशनल कांफ्रेस के झंडे को थामे रखा था.

उस वक्त फारुक़ अब्दुल्लाह लंदन में थे. उन्हें कश्मीर का मादरे मेहरबान कहा जाता था. उन्होंने लोकसभा में अनंतनाग का 1977 से 1979 और श्रीनगर का 1984 से 1989 के बीच प्रतिनिधित्व किया था.

महाराष्ट्र के ठाकरे, ओडिशा के पटनायक और आंध्रा के रेड्डी परिवार में मर्द वंशवाद से व्यापक जुड़ाव रहा है. शरद पवार ने सुप्रिया सूले को राजनीति में उतारा लेकिन उनका कोई बेटा नहीं था.

ममता बनर्जी ने भी अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर एक बड़ी भतीजी के रहते भतीजे का चुनाव किया है.

लेकिन इस तरह का लैंगिक भेदभाव सिर्फ राजनीति में ही नहीं है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में हैं. और इसे देखने के लिए बिहार की ओर देखने की जरूरत नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त गर्ग से बातचीत पर आधारित)

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