'आतंक जिहाद हो ही नहीं सकता'

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इस्लाम ने अमन और शांति की स्थापना और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को कितना ज़रूरी ठहराया है और वह ख़ून खराबा, मारकाट और आतंकवाद का कितना घोर विरोधी है, इसे समझने के लिए यही काफ़ी है कि इस्लाम ने मानव जीवन को काबे से ज़्यादा सम्मानित ठहराया है.

मानव जीवन के प्रति यह सम्मान किसी विशेष धर्म, जाति, रंग, नस्ल, वर्ग या क्षेत्रवासियों के लिए ना होकर सबके लिए है.

कुरान शरीफ़ की सूरत अलमाइदा की आयत नंबर 32 में साफ़ है कि किसी एक व्यक्ति की जान बचाना, सभी इंसानों की जान बचाने और किसी एक की जान लेना सभी इंसानों की हत्या करने जैसा है.

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इस्लाम के तहत आदमी को जीवन रक्षा का अधिकार और दूसरों की जान की हिफ़ाज़त की गारंटी देने को कहा गया है. 'जियो और जीने दो' का यह संदेश जिस दौर में दिया गया था तब यह दुनिया के लिए अजनबी चीज़ थी.

जिहाद भी अत्याचार और हिंसा के उन्मूलन का एक तरीक़ा है. यह इस्लाम का अपना दर्शन है. इसके लिए उसने जो दिशानिर्देश दिए हैं वो पूरी तरह मानवीय हैं.

जिहाद का आदेश उसके उद्देश्य, इरादे और कार्यशैली की शुद्धता के अधीन है. ऐसा नहीं कि कोई भी व्यक्ति या कुछ लोगों का गिरोह किसी के इशारे या दुनियावी मक़सद हासिल करने के लिए हिंसा फैलाए और उसे जिहाद ठहरा दिया जाए.

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हदीस में कहा गया है कि क़यामत के दिन बंदे से सबसे पहले उसकी नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा और पहली चीज़ जिसका फ़ैसला लोगों के बीच किया जाएगा, वह ख़ून का दावा है.

समाज में हिंसा और अव्यवस्था फैलाना और ऐसे लोगों की हत्या, जिन्होंने मुस्लिम समाज के विरु़द्ध हथियार नहीं उठाए, जिहाद के पावन उद्देश्य को नकारना है. यह जिहाद नहीं बल्कि आतंकवाद है और आतंकवाद चाहे जिस रूप में और जिस नाम से हो, घोर अपराध और अत्यंत निंदनीय दुष्कर्म है.

इसलिए आतंक जिहाद हो ही नहीं सकता.

आतंकवाद को जिहाद ठहराने की कोशिश को राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. ऐसे उदाहरण सामने हैं, जिनसे साबित होता है कि बड़ी शक्तियों ने एक गिरोह खड़ा किया. पहले उसे मुजाहिदों का गिरोह कहा, फिर उसी को आतंकवादी कहने लगे.

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बड़ी शक्तियों की योजना के तहत भी कुछ लोग आतंक और उपद्रव को हवा दे रहे हैं. उनका इस्लाम और क़ुरान और सुन्नत की शिक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है. वे लोग उन ताक़तों में हैं, जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए मानव जाति का जीना दूभर कर दिया है.

हिंदुस्तान में दारुल उलूम देवबंद पहली दीनी संस्था है, जिसने क़रीब 15 साल पहले आतंकवाद के ख़िलाफ़ फ़तवा दिया था.

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने समय-समय पर देश के कोने-कोने में बड़ी-बड़ी सभाएं और गोष्ठियां कीं. आतंक के विरुद्ध उसका यह संघर्ष आज तक जारी है.

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दारुल उलूम देवबंद और जमीयत उलेमा बार-बार साफ़ कर चुके हैं कि इस समय दुनिया में आतंक और हिंसा का जो माहौल है, वह जिहाद हरगिज़ नहीं बल्कि बिगाड़ और फ़साद है. इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना सबकी ज़िम्मेदारी है.

यहां यह भी साफ़ करना ज़रूरी है कि इस्लाम के नाम पर जो हो रहा है, ज़रूरी नहीं वह सब इस्लामी हो.

हाल में इराक़ और सीरिया में जिस बेदर्दी से निर्दोष लोगों की हत्याएं हो रही हैं, औरतों को ग़ुलाम बनाकर बाज़ार में बेचा जा रहा है, उसकी इस्लाम में हरगिज़ इजाज़त नहीं. यह जघन्य अपराध है.

इसकी निंदा के लिए कठोर से कठोर शब्द भी काफ़ी नहीं. हमारे लिए दोहरी परेशानी यह है कि इसे इस्लाम के सिर थोपा जा रहा है. इस्लाम तो ऐसे अपराधों को जड़ से मिटा देने के पक्ष में है.

भारत के मामले में देखें तो एक बहुसंख्यक समुदाय में एक ख़ास मानसिकता के लोग लंबे समय से मुसलमानों पर देश के विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का आरोप लगाकर उनकी जान-माल और स्वाभिमान को आहत करते रहे हैं.

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पिछले 15 सालों में यह इज़ाफ़ा और हुआ है कि मुसलमानों पर आतंकवाद का आरोप भी थोपा जाने लगा है. दक्षिणी, मध्य भारत, उत्तर-पूर्व, पंजाब और देशभर में जो दूसरी उपद्रवी ताक़तें हैं, क्या उनके लिए भी इस्लाम या मुसलमानों पर आरोप लगा सकते हैं?

वास्तव में कश्मीर का मामला अलग है. उसका आधार भी मुसलमानों का धार्मिक विश्वास नहीं है. उसकी कई दूसरी वजहें हैं, जिनको सरकार हमसे बेहतर जानती है.

यहां यह बात भी अहम है कि हम आतंकवाद को तब तक नहीं उखाड़ सकते, जब तक उसके असली दोषियों को कठोरतम दंड न दिया जाए.

असल दोषियों के बजाए आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों की पकड़-धकड़ और उनको लंबे समय तक जेलों में डाले रखना आतंकवाद की समस्या के हल में सबसे बड़ी बाधा है.

किसी शख़्स पर केवल इसलिए आतंकवादी होने का आरोप लगाना कि उसका संबंध किसी वर्ग विशेष से है, बहुत ही ग़ैरज़िम्मेदाराना और निंदनीय काम है.

इससे आतंकवाद रुकने के बजाए उसे और ताक़त मिलती है. असल बात यह है कि आतंकवाद का अंत आतंक से नहीं किया जा सकता बल्कि न्याय और इंसाफ़ के ज़रिए ही इसका मुक़ाबला किया जा सकता है.

हाल में आतंकवाद को मुसलमानों के एक विशेष संप्रदाय के नाम से जोड़कर देखने की भी घिनौनी कोशिश शुरू हुई है. संभव है कि यह पहले से परेशान मुस्लिम समाज को और अधिक दर्द में धकेलने की साज़िश हो.

खेद की बात है कि इसमें कुछ मुसलमान भी माध्यम बन गए हैं. यह घटिया हरकत सूफ़ीवाद के नाम पर हो रही है, जबकि सूफ़ी परंपरा लोगों को जोड़ने का काम करती है.

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हमारे पूर्वजों का भी संबंध तसव्वुफ़ की सारी परंपराओं और शाखाओं से रहा है. मैं ख़ुद एक सूफ़़ी परंपरा से जुड़ा हूँ. यह जो हो रहा है, वह विरोधाभास से भरा है.

जिस तरह आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ना ग़लत है, उससे भी बड़ा अपराध यह है कि उसके लिए किसी इस्लामी पंथ या परंपरा को ज़िम्मेदार ठहराया जाए.

हमारा कहना है कि अपने-अपने धार्मिक विश्वासों और तौर-तरीक़ों पर कायम रहकर देश और क़ौम की समस्याओं के हल के लिए सामूहिक कोशिश और एकजुटता समय की पुकार है, जिससे भागने की कोई राह नहीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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