वो बेख़ौफ़ नापता है पुलिसवालों की छाती

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"कहां खाना, कहां नहाना और कहां होगा सोने का ठिकाना, कुछ पता नहीं. इस जंगल से उस जंगल तक... हर पल दस्ते की बंदूकें तनी रहती थीं और अक्सर पुलिस से सामना होने का डर. लेकिन अब बेख़ौफ़ होकर पुलिस वालों की छाती नापता हूँ. दरअसल ज़िंदगी की दूसरी पारी में उनकी वर्दियां सिलने में लगा रहा हूँ. हाथ में पैसे भी आते हैं और बाल-बच्चों के साथ सुकून से दो वक़्त की रोटी खा पाता हूँ. सच पूछिए तो नौ साल तक नक्सली दस्ते में रहकर थक गया था."

आदिवासी समुदाय के रामपोदो लोहरा एक सांस में यह सब बोल जाते हैं.

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रामपोदो लोहरा कभी हथियारबंद दस्ते में माओवादियों के एरिया कमांडर थे. झारखंड के बुंडू-तमाड़ से लेकर पोड़ाहाट-सारंडा के जंगलों में उनका आना-जाना होता था. रामपोदो लोहरा रांची ज़िले के तमाड़ थाना क्षेत्र के एक सुदूर गांव पुंडीडीह के रहने वाले हैं.

रामपोदो महज़ नवीं तक पढ़े हैं और अब उनकी उम्र 50 की होगी. साल 2013 में उन्होंने रांची पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था. इसके बाद जब वे जेल से बाहर निकले, तो रोज़गार की समस्या सामने थी. हालांकि सरकार से उन्हें आत्मसमर्पण नीति के तहत चार लाख रुपए मिले थे.

जेल से बाहर आने के बाद रामपोदो लोहरा ने पुलिस के एक आला अधिकारी प्रवीण सिंह से मुलाक़ात की और बताया कि वे कपड़े की सिलाई जानते हैं. फिर रांची पुलिस लाइन में उनको सिलाई मशीन लगाने के लिए जगह मिल गई. अब वो दिन रात पुलिस वालों के ड्रेस तैयार करने में जुटे रहते हैं.

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रामपोदो लोहरा के मुताबिक़, गांव में उनके पास मामूली ज़मीन थी, जिस पर ज़मींदारों ने कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन गांव वालों की बैठक में भी यह मामला नहीं सुलझा.

उस इलाक़े में जिनकी भी ज़मीन को लेकर झंझट होती, वो नक्सली दस्ते में शामिल हो जाते और फिर जनअदालत लगाकर अपनी ज़मीन हासिल कर लेते थे. रामपोदो लोहरा के मुताबिक़, उन्हें भी यही रास्ता ठीक लगा और वो 2004 में वे माओवादी संगठन में शामिल हो गए.

नक्सली दस्ते में शामिल होने के बाद उस ज़मीन को लेकर उन्हें कभी किसी ने परेशान नहीं किया, लेकिन आत्मसमर्पण करने के बाद ज़मींदारों ने वह ज़मीन को किसी और को बेच दी.

रामपोदो लोहरा अब उस ज़मीन पर ध्यान नहीं देना चाहते, हालांकि गांव छूट जाने का दुःख उन्हें ज़रूर होता है. रामपोदो लोहरा के मुताबिक़, अब वो गांव भी नहीं जाते हैं, क्योंकि माओवादियों की नज़रों में अब वो पुलिस के आदमी हो गए हैं.

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पुलिसवालों के ड्रेस सिलने में ही दिलचस्पी क्यों, इस सवाल पर वो कहते हैं, "इन कपड़ों को तैयार करने में हाथ बैठ गए हैं, माओवादी सगंठन के शुरुआती दिनों में मैंने दस्ते के सदस्यों के लिए सैकड़ों खाकी व छापामार वर्दी, पिठ्ठू, गोलियां रखने की खोली तैयार की थीं, कई बार तो कैंप पर पुलिस की छापेमारी में मेरी मशीनें और कैंचियां भी जब्त हुई थीं."

पुलिस वाले सिलाई के पैसे देने से मना तो नहीं करते? इस सवाल पर रामपोदो मुस्कराते हुए कहते हैं कि सीआरपीएफ़ वालों के ड्रेस फ़िट होने पर तो शाबाशी मिलती है और मिठाई भी खिलाते हैं.

पुलिस के जवान राजेश टोप्पो बताते हैं कि एक बार रामपोदो का फीता गिरा तो समझिये नाप पक्का हो गया.

रामपोदो लोहरा को माओवादी दस्ते में राइफ़ल मिली थी. उन्होंने हथियार चलाना बहुत जल्दी सीख लिया था और दस्ते में उनका पद भी बड़ा था.

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उनका कहना है कि दस्ते में महिलाएं भी थीं, पर उनके साथ ठीक व्यवहार नहीं होता था.

मुठेभड़ के बारे में पूछे जाने पर वो कहते हैं, "पोड़ाहाट के कुटीपिड़ी जंगल में पुलिसवालों के साथ हमारा सामना हुआ था और दोनों तरफ से काफ़ी देर तक गोलीबारी होती रही, लेकिन हमलोग बच निकले."

वो बताते हैं कि उनके दस्ते के कई लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे.

रामपोदो लोहरा के भाई परिवार के साथ गांव में ही रहते हैं. रामपोदो ने अपने बड़े बेटे दिनेश लोहरा को भी सिलाई का काम सिखा दिया है. दोनों साथ में काम करते हैं और महीने में 18 से 20 हज़ार रुपया कमा लेते हैं.

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रामपोदो की इच्छा है कि बेटे को पुलिस में नौकरी मिल जाए. दिनेश लोहरा बताते हैं कि पिता जब माओवादी संगठन में थे, तो घर पर पुलिस के खूब छापे पड़ते थे और सबलोग परेशान रहते थे, इसलिए वो पढ़ाई नहीं कर सके. लेकिन अब उनके बच्चे अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ते हैं.

माओवादी दस्ते में रहकर घर आने के सवाल पर वे रामपोदो लोहरा बताते हैं कि चार-छह महीने पर चोरी-छिपे घंटे-दो घंटे के लिए वो गांव आते थे. उन्हें गांव आने के लिए तीन-चार हज़ार रुपए भी मिलते थे. उनको बेटी की शादी के लिए संगठन ने 25 हज़ार रुपए की मदद की थी.

रामपोदो के मुताबिक़, आत्मसमर्पण के बाद सरकार की ओर से नामकुम के पास रहने के लिए उन्हें ज़मीन भी मिली है, लेकिन वह नक्सल प्रभावित इलाक़ा है, इसलिए वहां बसना सुरक्षित नहीं है. उन्होंने जगह बदलने के लिए बड़े अफ़सरों के पास आवेदन किया है.

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झारखंड पुलिस के प्रवक्ता एसएन प्रधान कहते हैं कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली मुख्य धारा से जुड़ सकें, इसके लिए सरकारी कोशिशें तेज़ की गई हैं. सरेंडर पॉलिसी के तहत उनके पैसे और पुनर्वास की व्यवस्था पर हमारा ध्यान है.

एसएन प्रधान के मुताबिक़, फिट कपड़े सिलने की वजह से रामपोदो लोहरा तो पुलिस वालों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हो गए हैं.

वो बताते हैं कि महिला नक्सली रश्मि महली को कलक्ट्रेट में चाय की दुकान दी गई है और वो भी अब बेहतर ज़िंदगी जी रही हैं. रश्मि ग़रीबी की वजह से माओवादी दस्ते में शामिल हुई थीं और दस्ते के एक सदस्य से ही उनकी शादी भी हो गई थी.

उसके बाद क़रीब आठ साल तक दस्ते में रहने के बाद उन्होंने भी सरेंडर कर दिया था.

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