दलितों को रिझाने का मोदी का दांव उल्टा न पड़ जाए

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बनारस में गोवर्धनपुर के डेरा सचखंड बलां जाना विवादों में घिर गया है.

सुरक्षाकर्मियों ने संत निरंजनदास को अपने ही संगठन के बनाए मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया.

गोवर्धनपुर 600 साल पुराने संत रविदास की जन्मस्थली है. संत रविदास में दलितों की बहुत आस्था है.

संत निरंजनदास को मंदिर में जाने से रोकने को लेकर दलितों में ख़ासी नाराज़गी है. पंजाब-उत्तर प्रदेश में साल 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं और बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी ने इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है.

पंजाब में बसपा के प्रभारी अवतार सिंह करीमपुरी का कहना है, "बनारस के संत रविदास मंदिर में संत निरंजन दास को प्रवेश न करने देने से दलित समुदाय को धक्का पहुंचा है."

उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी और आरएसएस 1972 में डेरा बलां की ओर से बनाए गए इस मंदिर को हड़पने की साजिश कर रहे हैं.

आम आदमी पार्टी के पंजाब प्रभारी संजय सिंह ने भी इस घटना की निंदा की है.

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हालांकि बाद में सुरक्षाकर्मियों ने भूल सुधार की कोशिश की और और संत निरंजनदास को मंदिर में जाने को कहा लेेकिन वो उल्टे पांव वहां से लौट गए.

केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री विजय सांपला ने दावा किया कि वो संत निरंजनदास से मिले थे उन्हें सुरक्षा मुद्दों के बारे में बताया था. उन्होंने संत को ये भी कहा कि प्रधानमंत्री को घटना की जानकारी नहीं थी.

डेरा बलां ने ही संत रविदास के जन्मस्थल की पहचान की थी और वहां पर एक मंदिर बनाया था. जालंधर के पास के इलाक़ों में डेरा सचखंड बलां का बड़ा प्रभाव है. वहां दलित सशक्तिकरण की विरासत काफी पुरानी है.

इस धार्मिक संस्था को दो दिग्गजों ने मिलकर खड़ा किया था.

आदी धर्म की स्थापना करने वाले मंगू राम मुगोवालिया ने दलितों को आदी धर्म का और भारत का मूल निवासी बताया था, उनके मुताबिक आर्यों के हिंदू धर्म की स्थापना से भी पहले के हैं.

ब्रिटिश राज के समय 1931 की जनगणना में आदी धर्म को मान्यता दी गई थी और उस वक़्त उनकी संख्या पांच लाख बताई गई थी.

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डेरा बलां सचखंड का नेतृत्व करने वाले संत निरंजन दास ने 2010 में खुद को रविदासी कहते हुए अलग धर्म की घोषणा की थी.

यह नया धर्म पंजाब में हिंसक विरोध प्रदर्शनों का परिणाम था. यह हिंसक विरोध प्रदर्शन वियना में मई 2009 में एक रविदास मंदिर में संत रामानंद की हत्या के बाद हुए थे.

डेरा पहले सिर्फ सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब की पूजा करता था लेकिन बाद में उन्होंने घोषणा की कि रविदासी समाज के लोग सिर्फ गुरु रविदास के पाठ को ही पढ़ेंगे.

गोवर्धनपुर के जिस मंदिर में प्रधानमंत्री गए थे, उसे डेरा बलां ने 1972 में बनाया था. रविदासियों के मंदिर पूरे दुनिया में फैले हुए हैं.

ये मंदिर दलित अस्मिता से जुड़े हुए हैं. इनके प्रभाव का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1998 में राष्ट्रपति केआर नारायणन ने संत रविदास के नाम से लगने वाले गोवर्धनपुर धाम के एक गेट का उद्घाटन किया था.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने इस दरवाजे की नींव 1997 में रखी थी. संत रविदास के एक जन्मोत्सव पर गोवर्धनपुर धाम के अंदर सोने की पालकी रखी गई थी.

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