ये दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है

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रोमन साम्राज्य में ग्लेडियेटर्स के बीच लड़ाई काफ़ी लोकप्रिय होती थी और यह आम जनता के मनोरंजन का एक बड़ा साधन होता था. ग्लेडियेटर्स अक्सर ग़ुलाम होते थे और उन्हें अखाड़ों में उतारने वाले उनके मास्टर या मालिक समाज के रईस हुआ करते थे.

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में 9 फ़रवरी को उठा विवाद रोमन साम्राज्य में ग्लेडियेटर्स के बीच लड़ाई की तरह लगता है.

वामपंथियों के ग्लेडियेटर्स कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद हैं जो दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ग्लेडियेटर्स से भिड़े हुए हैं.

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फ़र्क़ इतना है कि रोमन साम्राज्य के दौर में ये मुक़ाबले आम लोगों के मनोरंजन के लिए कराए जाते थे. जेएनयू का अखाड़ा गंभीर है.

ये दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है. ये नई लड़ाई नहीं है. ये संभव है कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद जेएनयू कैंपस में दक्षिणपंथी ग्लेडियेटर्स का मनोबल बढ़ा हो.

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कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा करके केंद्र सरकार ने दक्षिणपंथी ग्लेडियेटर्स की ताक़त और बढ़ा दी है. कन्हैया वामपंथी विचारधारा रखने वालों के हीरो बन गए हैं. जेल से रिहा होने के बाद उनके भाषण ने दक्षिणपंथी ग्लेडियेटर्स को एक झटका दिया है.

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इस भाषण को सोशल मीडिया पर खूब उछाला जा रहा है. इसमें शक नहीं कि भाषण ज़बर्दस्त था लेकिन ऐसे भाषण कैंपस में पहले भी दिए जा चुके हैं.

अफ़सोस कि वरिष्ठ पत्रकार भी अपना संतुलन खोकर इस भाषण की जय-जयकार कर रहे हैं. फ़ेसबुक पर हमारे दोस्त उसकी पूजा करने पर उतारू हैं. अब समझ में आया कि फ़ेसबुक वाले हमारे अधिकतर दोस्त वामपंथी विचारधारा वाले हैं.

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हमने ज़िंदगी भर विचारधारा के आधार पर दोस्ती नहीं की. सालों पहले लंदन में एक वरिष्ठ भारतीय ब्रॉडकास्टर ने मुझसे कहा था, "ज़ुबैर साहब, आप तय कर लीजिए कि वामपंथी लोगों को दोस्त बनाएंगे या दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वालों को."

मैंने उनसे कहा था कि मैं विचारधारा देखकर दोस्त नहीं बनाता. इसी तरह हाल में एक वरिष्ठ पत्रकार साथी को जब पता चला कि हमारे गहरे दोस्तों में एक ऐसे पत्रकार मित्र हैं, जो कथित रूप से दक्षिणपंथी विचारधारा वाले हैं तो वह मुझ पर बरस पड़े, "यार वह तो संघी हैं. उससे तुम्हारी दोस्ती कैसे?"

वामपंथी विचारधारा वालों की यही समस्या उन्हें ले डूबी है. वो ख़ुद को उच्च नैतिक स्तर वाला समझते हैं और दूसरों को खुद से नीचे. विचारधारा में कट्टर तो होते हैं लेकिन मौक़ा पड़ने पर कभी-कभी सत्ता के क़रीब जाने के लिए अपनी विचारधारा बदल भी देते हैं. शायद ढुलमुल विचार के कारण ही उनका देश भर में पतन हुआ है.

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अगर ग़रीबी से आज़ादी चाहिए थी तो पश्चिम बंगाल में 34 साल सत्ता में रहने के बावजूद इस राज्य को ग़रीबी से आज़ादी क्यों नहीं दिलाई? केरल में भी हुकूमत की लेकिन सत्ता में आने के बाद वो दूसरी पार्टियों से कितना अलग थे? अभी वो केवल त्रिपुरा में सत्ता में हैं जिसे एक अमीर राज्य तो नहीं कहा जा सकता?

कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा चाहिए. जेएनयू मुद्दे ने वामपंथी पार्टियों को अपना असर वापस लाने के लिए एक अवसर दिया है. वहीं कैंपस के अंदरूनी मामले को मोदी सरकार ने भी हवा देने की कोशिश की.

कन्हैया और उनके साथियों के ख़िलाफ़ देशद्रोह के मुक़दमे इन छात्रों के साथ नाइंसाफी है. लेकिन बीजेपी और आरएसएस के लिए भी ये एक मौक़ा है कैंपस में अपनी विचारधारा आगे बढ़ाने का.

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ये दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है जो अब कैंपस से बाहर आ चुकी है.

रोमन साम्राज्य में ग्लैडिएटर्स को उनके मालिक खूब खिलाते-पिलाते थे ताकि वो स्वस्थ रहें और लड़ाई में उनकी जीत हो. हारने वाला ग्लैडिएटर या तो मारा जाता था या घायल हो जाता था.

जीत हो या हार एक ग्लैडिएटर समाज का हीरो माना जाता था.

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