कन्हैया को कृष्ण न बनाया जाए

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कन्हैया का भाषण एक छात्र नेता का भावुक और राजनीतिक भाषण था, जो जेएनयू के लिए नया नहीं है.

जेएनयू की छात्र राजनीति क़रीब से देख चुका हूँ, मुझे ताज्जुब तब हुआ जब मैंने भाषण के तुरंत बाद सोशल मीडिया का नज़ारा देखा.

कुछ लोग कह रहे थे ‘हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की’, तो कुछ लोग यहाँ तक कह रहे थे कि आज की तारीख में यह लड़का चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी को कहीं भी हरा देगा.

इस तरह की टिप्पणियां जेएनयू के पूर्व छात्रों ने भी की थीं और आम जनता में से भी कई लोगों ने.

ऐसी तुलना और ऐसी तारीफ़ मुझे अजीब-सी लगी क्योंकि कन्हैया के भाषण में ऐसी कोई भी नई या ऐतिहासिक बात नहीं थी, जो वाम दल पहले से न कहते रहे हों. चाहे वह भारत में मुसीबतों से आज़ादी की बात हो या फिर संघ का विरोध हो या फिर दलितों को साथ में लेकर चलने की बात हो.

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कन्हैया से पहले भी जेएनयू में वक्ता हुए हैं और कई बेहतरीन वक्ता हुए हैं. आनंद कुमार, बत्तीलाल बैरवा, सीताराम येचुरी, शकील अहमद खान और प्रणय कृष्ण जैसे छात्र नेताओं के पास न केवल जनता की भाषा थी बल्कि मुद्दों को पेश करने की और लोगों से जुड़ जाने की अभूतपूर्व क्षमता थी.

तो फिर लोगों को कन्हैया में ऐसा क्या दिख रहा है. टीवी...टीवी...और टीवी...ये शायद पहली बार है जब जेएनयू के किसी प्रेसिडेंट का भाषण 50 मिनट तक टीवी पर लाइव दिखाया गया हो.

जो जेएनयू में रहे हैं और प्रेसिडेंशियल डिबेट देखते रहे हों वो जानते हैं कन्हैया का भाषण अच्छा ज़रूर था, महान तो कतई नहीं था.

यह ज़रूर था कि कन्हैया के भाषण का समय महत्वपूर्ण है. संभवत इमरजेंसी के बाद पहली बार जेएनयू का कोई प्रेसीडेंट जेल से लौटा है और वो भी देशद्रोह के मामले में.

इसके बावजूद जो गंभीर मुद्दा कन्हैया ने अपने भाषण में उठाया है उस पर दिग्गज वामपंथियों ने कहीं कुछ लिखा हो तो मुझे नहीं दिखा है.

मसलन, कन्हैया ने बात की सेल्फ़ क्रिटिसिज़्म की. कन्हैया के ही शब्दों में ''जेएनयू में हम सभी को सेल्फ क्रिटिसिज़्म की ज़रूरत है क्योंकि हम जिस तरह से यहां बात करते हैं वो बात आम जनता को समझ में नहीं आती है. हमें इस पर सोचना चाहिए.''

यह एक महत्वपूर्ण बात है लेफ़्ट की राजनीति की, जो पिछले कुछ बरसों में सिमट गई है.

लेकिन देखते रहिए. इन मुद्दों पर शायद ही वामपंथी छात्र बात करेंगे. कन्हैया ने अपने जेल के अनुभव गिनाते हुए लाल और नीली कटोरी का उदाहरण दिया और संकेत दिया कि वाम दल और दलित मूवमेंट को साथ चलना होगा.

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मज़ेदार है कि यह बात एक छात्र को समझ में आ रही है. लेफ़्ट पार्टियों के पोलित ब्यूरो में कोई दलित है या नहीं, इसकी पड़ताल शायद ही पार्टी कर रही है.

ख़ैर इस देश में टीवी ने बहुत कुछ किया है. यह वही टीवी है जिसने कन्हैया को रातोरात देशद्रोही बना दिया था और यही टीवी है जिस पर भाषण देखकर लोग रातोरात कन्हैया को भगवान कृष्ण बनाए दे रहे हैं.

इस अतिरेक से बचने की ज़रूरत है और चीज़ों को पर्सपेक्टिव में देखने की भी, वर्ना कल को जब कन्हैया एक छात्र की तरह बर्ताव करेगा, तो यही टीवी उसे फिर से विलेन बना देगा.

कन्हैया एक छात्र नेता है. भावुकता, आंदोलन और क्रांति की बातें उसे शोभा देती हैं लेकिन उस पर आकांक्षाओं का बोझ न डाला जाए. उसे अपना उबड़-खाबड़ रास्ता ख़ुद तय करने दिया जाए.

भाषण से ही अगर प्रधानमंत्री बनना होता तो कई वामपंथी नेता आज प्रधानमंत्री होते.

भाषण देखिए. दो मिनट की गहरी सांस लीजिए, कन्हैया से उम्मीद रखिए, उसके भाषण से नहीं और कम-से-कम अपनी उम्मीदों का बोझ एक 28 साल के छात्र के कंधों पर तो मत ही डालिए.

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