प्रशांत किशोर यूपी में कांग्रेस के लिए कर क्या पाएँगे?

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चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ उत्तर प्रदेश के करीब 35 कांग्रेसी नेताओं की 15 गुरुद्वारा रकाबगंज, नई दिल्ली में हुई मुलाकात दो बातों को लेकर काफी अहम है.

ना तो प्रशांत किशोर ने इसके बारे में कुछ कहा और ना ही कांग्रेसी नेताओं ने ही उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी को पार्टी का चेहरा बनाने पर कोई टिप्पणी की.

देश की सबसे पुरानी पार्टी एक तरह से बेबस नज़र आ रही है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंदर किसी प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रप नेता के अभाव में कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार पर ही निर्भर है.

इस चुनावी रणनीतिक बैठक में राहुल गांधी देर से पहुंचे थे. लेकिन यह बैठक प्रशांत किशोर के लिए उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं से मिलने का और पार्टी नेताओं के लिए 2017 में प्रशांत किशोर की क्षमता को देखने-समझने का मौका था.

शुरुआती प्रतिक्रियाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों पक्षों को निराशा हुई है.

बहुत सारे कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि राहुल या प्रियंका अगर सरकार बनाने या चलाने का अनुभव लेना चाहते हैं तब उन्हें इसे उत्तर प्रदेश में अज़माना चाहिए.

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इसके पीछे तर्क यह है कि अगर पहले वो 20 करोड़ लोगों की समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हो जाते हैं तब वो एक अरब से अधिक की आबादी की समस्या को सुलझा पाने के लायक होंगे.

प्रशांत किशोर को भी यह बहुत साफ तौर पर दिख रहा है कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ आकर्षक नारों से काम नहीं चलेगा. कांग्रेस को राज्य में एक ऐसे चेहरे की जरूरत पड़ेगी जो बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक ताकत को चुनौती दे सके.

राज्य के चुनावों में नवीन पटनायक या चंद्रबाबु नायडु जैसे क्षेत्रीय नेताओं को लोग वोट देते हैं. उत्तर प्रदेश के वोटर श्रीप्रकाश जयसवाल या बेनी प्रसाद वर्मा जैसे कम लोकप्रिय कांग्रेसी नेताओं को वोट नहीं देंगे.

2012 में राहुल गांधी के नज़दीकी नहीं चाहते थे कि उत्तरप्रदेश में राहुल कोई हस्तक्षेप करें. 2017 में भी राहुल या प्रियंका के लिए उत्तरप्रदेश में कोई हस्तक्षेप करना मुश्किल होगा.

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इसमें कोई शक नहीं है कि अगर उत्तर प्रदेश के चुनाव में ये दोनों नंबर दो की भूमिका निभाते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को बड़ा सहारा मिलेगा.

औम तौर पर पार्टी के लोग 2004 और 2009 की चुनावी जीत के लिए नेहरू-गांधी परिवार के प्रति एहसानमंद हैं और यह बात पार्टी में किसी विद्रोह की संभावना को खारिज करती है.

मई 2014 में हुई चुनावी हार के लिए बहुत सारे कांग्रेसी अब तक राहुल गांधी को ही जिम्मेदार मानते हैं.

जैसे हार की तोहमत काफी नहीं था, पार्टी के अंदर राहुल को एक प्रेरणादायक नेता या भविष्य के नेता के तौर पर पूरी तरह से स्वीकृति नहीं मिल रही है.

निजी तौर पर कई कांग्रेसी नेता राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का अभिषेक बच्चन मानते हैं.

उनके मुताबिक़ अभिषेक, अमिताभ का बेटा होते हुए और बहुत सारे अवसरों के मिलने के बाद भी सफलता की उन बुलंदियों तक नहीं पहुँच पाए हैं जिसकी उम्मीद की जाती है.

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1837 में डेनमार्क के लेखक हैंस क्रिश्चन एंडरसन ने 'द इंपेरर्स न्यू क्लोद्स' शीर्षक से कहानी लिखी थी.

यह एक ऐसे शासक की कहानी थी जो खुद के पहनावे को लेकर आत्ममुग्ध था और हर दिन हर घंटे पहनने के लिए उनके पास अलग-अलग परिधान होते थे.

एक दिन दो ठग शहर में पहुंचे और उन्होंने राजा को इस बात का भरोसा दिलाया कि वे एक ऐसा कपड़ा बुनेंगे जिसमें जादुई शक्ति होगी.

यह कपड़ा उसी को दिखेगा जो दिल और आत्मा से पूरी तरह से शुद्ध होगा.

राजा प्रभावित हुआ और उसने उन दोनों को तुरंत काम पर रख लिया. ठगों को मानवीय स्वभाव की अच्छी समझ थी. उन्होंने खाली करघे पर काम करने का बहाना करना शुरू कर दिया.

राजा के मंत्री बारी-बारी से नए कपड़े को देखने जाते और करघे पर बुने जा रहे कपड़े की तारीफ करते हुए लौटते. हालांकि किसी को कुछ दिखता नहीं था.

आख़िरकार इस नई पोशाक को प्रदर्शित करने की एक योजना बनाई गई. राजा ने जब कपड़ा देखा तो यह देखकर दंग रह गया कि कुछ है ही नहीं. लेकिन उसने कपड़े की तारीफ करने का नाटक किया और उसे बड़े चाव से देखा. फिर इसके बाद इसे सावधानीपूर्वक पहनने का स्वांग किया.

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एक शाही मंडप के नीचे इसे लोगों के सामने पहनकर वो प्रदर्शित करने के लिए बैठ गया. सभी ने कपड़े की ताली बजाकर खूब तारीफ की क्योंकि ये बात पहले ही चर्चित हो गई थी कि जो दिल और आत्मा से शुद्ध नहीं होगा उसे कपड़ा नहीं दिखेगा.

इसका भंडाफोड़ तब हुआ जब एक बच्चे ने मासूमियत के साथ चिल्लाते हुए कहा- 'राजा ने तो कुछ पहना ही नहीं है. वो नंगे हैं.'

यह कहानी काफी हद तक कांग्रेस की ख़राब चुनावी हार के बाद पार्टी के माहौल पर लागू होती है.

दुर्भाग्य से इस कहानी की तरह लाखों कांग्रेसियों के बीच कोई मासूम बच्चा नहीं है जो यह कह सके कि सोनिया और राहुल गांधी ग़लत हैं और इससे कुछ हासिल नहीं होगा.

क्या प्रशांत किशोर यह संदेश गांधी परिवार तक, उनके अहंकार को चोट पहुंचाए बिना पहुँचा सकते हैं?

क्या कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की प्रशांत किशोर की रणनीति यही होगी? इसका जवाब आने वाले कुछ समय में ही मिलेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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