ब्लॉग: 'पाकिस्तान का है आज़ादी के नारों से नाता'

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अब यह बहस छिड़ गई है कि कन्हैया कुमार जेएनयू में 'सब मिलकर बोलो आज़ादी' सिरीज़ के जो नारे लगवा रहा है उसकी ओरिजिन क्या है?

अक्सर भारतीय समझते हैं कि ये नारा कश्मीरी आंदोलन से जुड़ा है. दक्षिण एशिया में महिला संगठनों के संघर्ष में कमला भसीन का नाम बहुत आदर से लिया जाता है. वो कहती हैं कि उन्होंने यह नारा 1991 में लगाया था कि 'सब बहने मांगे आज़ादी' और यह नारा कमला भसीन ने पाकिस्तानी महिलाओं से सुना था.

मगर पाकिस्तानी महिलाओं ने भी तो यह नारा कहीं से सुना होगा. मुझे याद पड़ता है कि 1968 में अयूब खां की डिक्टेटरशिप के विरोधी छात्रों ने भी रावलपिंडी से कराची तक की सड़कों पर ये नारा खूब लगाया.

और यह नारा लगाने वालों में सबसे आगे-आगे कम्युनिस्ट मूवमेंट से जुड़े नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन के छात्र थे.

उसके बाद आज़ादी मांगो सिरीज का पेटेंट आम होता गया और इतना आम हो गया कि जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा छात्र संगठन इस्लामी जमीएत-ए-तलबा 'सबसे बड़ा आज़ादी मांगो गुट' हो गया.

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और तो और इस्लामी-जमीएत ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को भी कम्युनिस्टों से छीनकर उन पर इस्लामी हरा रंग फेर दिया.

फिर हर तरह का मौलवी 'लाज़िम है कि हम भी देखेंगे' गाने लगा. और आज जेएनयू को देखकर तो ऐसा लगता है कि फ़ैज़ साहब पैदा ही इसी कैम्पस में हुए थे.

भारतीय क्रांतिकारी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के ज़माने में क्या नारे लगाते थे, हमें नहीं मालूम.

बॉलीवुड की पुरानी फिल्मों के माध्यम से पाकिस्तानियों को बस एक ही नारा सुनाई देता था कि कुछ मजदूर दिलीप कुमार या अमिताभ बच्चन जैसे मजदूर नेता की लीडरी में बड़ी मरियल सी आवाज़ में नारा लगा रहे हैं, "हमारी मांगे पूरी करो."

बताइए ये भी कोई नारा हुआ. चूंकि आज़ादी के बाद पाकिस्तानियों का मार खाने का तजुर्बा सीमा पार के क्रांतिकारियों से ज्यादा है, इसलिए नारे भी एक के बाद एक, और अनेक बनते चले गए.

पाकिस्तानी आंदोलनकारियों की खुशकिस्मती यह रही कि फ़ैज़ साहब का 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे' हाइजैक हुआ तो हबीब जालीब सामने आ गए और उन्होंने हम जैसे शरारती बच्चों को, "कहां क़ातिल बदलते हैं, फक़त चेहरे बदलते हैं" जैसा नारा दे दिया.

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फिर अहमद फ़राज़ आ गए, 'पेशेवर क़ातिलों तुम सिपाही नहीं'.... जब जिया उल हक का जमाना आसमान पर था तब सिवाए कराची प्रेस क्लब और कराची यूनिवर्सिटी के, हर तरफ सन्नाटा था.

और इस सन्नाटे में जब हज़ारों लड़के-लड़कियां एक आवाज़ में नारा लगाते थे कि 'ज़िया उल हक़ को कुत्ता कहना कुत्ते की तौहीन है' तो गुप्तचर संस्थाओं के लिए रिपोर्ट बनाने वाले ही नहीं दरो-दीवार भी हिलकर रह जाते थे.

अगर जेएनयू वाले किसी भी पाकिस्तानी नारे का इस्तेमाल करना चाहें तो हम पेटेंट का दावा नहीं करेंगे.

हम तो बस इतना ही जानते हैं कि 'जब कोई रखता ना हो पड़ोसी का ख्याल, फ़ायदा क्या है ये दीवार मिला रखने से?'

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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