विजय माल्या कैसे बने 'किंग ऑफ़ बैड टाइम्स'

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Image caption किंगफ़िशर एयरलाइन्स के अध्यक्ष विजय माल्या

शराब उद्योग को भारत में एक नया आयाम देने वाले विजय माल्या बैंक उद्योग के 'नन परफॉर्मिंग एसेट' संकट के प्रतीक बन गए हैं.

विजय माल्या को 'किंग ऑफ़ गुड टाइम्स' कहा जाता था, पर आज यह एक मज़ाक बन चुका है.

जीवन भर माल्या की कोशिश ये रही है कि वे अपने कारोबार का दायरा बढ़ा कर अलग अलग व्यवसायों को इसमें शामिल करें, ताकि उन्हें महज़ शराब उद्योग के दिग्गज के तौर पर नहीं, एक उद्योगपति के रूप में देखा जाए.

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शराब का व्यवसाय उन्हें पिता विट्ठल माल्या से विरासत में मिला था. उन्होंने देश के प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थानों से लोगों को चुना और इस शराब उद्योग को एक कार्पोरेट रूप दिया.

लेकिन झटके में नई कंपनियां ख़रीदने की उनकी आदत और कई बार तो बिना बही-खाते की जांच के ही फ़ैसला लेने की वजह से विजय माल्या की यह हालत हो गई है.

के. गिरिप्रकाश ने विजय माल्या पर 'द विजय माल्या स्टोरी', नाम से एक किताब लिखी है.

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गिरिप्रकाश ने बीबीसी से कहा, "भारत में शराब व्यवसाय को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता. माल्या चाहते थे कि लोग उन्हें शराब के बड़े व्यवसायी नहीं, बल्कि एक उद्योगपति के रूप में जानें."

गिरिप्रकाश ने आगे जोड़ा, "वे इस ठप्पे से पीछा छुड़ाना चाहते थे. इसलिए माल्या ने इंजीनियरिंग, उर्वरक, टेलीविज़न और चार्टर विमान सेवा की कंपनियों में पैसे लगाए."

यह सबको पता है कि शराब के व्यवसाय में 40 से 45 फ़ीसदी तक का मुनाफ़ा होता है. लेकिन माल्या ने किंगफ़िशर एयरलाइंस शुरू करने का फ़ैसला किया. इस क्षेत्र में पैसे कमाना मुश्किल होता है और अगर मुनाफ़ा होता भी है तो एक या दो प्रतिशत.

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Image caption एफ़ वन ड्राइवर सर्गियो पेरेज़ के साथ विजय माल्या

गिरिप्रकाश ने बीबीसी को बताया, "जब एयरलाइन शुरु हो गई तो माल्या ने खूब पैसे उड़ाए. किसी यात्री की उड़ान छूट जाने पर वे उसे उसके गंतव्य स्थान तक दूसरी एयरलाइन से भेजते थे. उन्होंने यह मान लिया कि लोग उनके फ्लाइंग फ़ाइव स्टार होटल पर टूट पड़ेंगे."

वे कहते हैं, "यात्रियों के लिए उन्होंने मंहगी विदेशी पत्र-पत्रिकाएं मंगवाई, पर शायद वे कभी गोदाम से बाहर निकल ही नही पाईं. कंपनी के मुनाफ़े पर इन बातों का बुरा असर पड़ना ही था."

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हालांकि माल्या ये कहते रहे हैं कि किंगफिशर एयरलाइंस, एसबीआई कैपिटल मार्केट्स और एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय विमानन सलाहकार से सलाह मशविरा के शुरू की गई थी. अर्थव्यवस्था में उस समय उपजी स्थिति और सरकारी नीतियां कंपनी की बदहाली की वजहें रहीं.

विजय माल्या ने एक बयान में कहा, "व्यक्तिगत तौर पर मैंने कर्ज नहीं लिए हैं और न ही मैं डिफॉल्टर हूं."

और इसी वजह से वे एनपीए संकट के प्रतीक बन गए हैं.

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़, बेंगलुरू के प्रोफ़ेसर नरेंद्र पाणि कहते हैं, "इस तरह के बहुत सारे क़र्ज़ कंपनी को सामने रख कर लिए जाते हैं. कंपनियाँ तो नाकाम हो जााती हैं, पर मालिक अच्छी स्थिति में बने रहते हैं. पूरी व्यवस्था इसी तरह चरमराती है."

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पाणि के मुताबिक़, "फिलहाल जारी व्यवस्था में आप उन दो लोगों में फ़र्क़ नहीं कर सकते हैं जो पैसे लेकर रफूचक्कर हो रहा है और जिसका बिज़नेस वाकई मुनाफ़ा नहीं कमा सका. विजय माल्या एक काफ़ी बड़ी समस्या के प्रतीक बन गए हैं. बैंक तो थोड़ा बहुत जोखिम उठाते ही हैं. लेकिन अगर इस बात में अंतर नहीं किया जा सका कि कोई कंपनी फेल हो गई है या कर्ज़दार पैसे लेकर चंपत हो गया है, तो पूरी व्यवस्था ही बैठ जाएगी."

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Image caption कैप्टन जीआर गोपीनाथ

यह तो सबको पता है कि किंगफ़िशर एयरलाइन को अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी बनाने के लिए माल्या ने कैप्टेन गोपीनाथ की कंपनी एयर डेकन ख़रीदी थी.

गिरिप्रकाश कहते हैं, "माल्या ने अपने यॉट से गोपीनाथ को फ़ोन किया कि वो एयर डेकन ख़रीदना चाहते हैं. गोपीनाथ ने कहा, एक हज़ार करोड़ रुपए. माल्या ने एयर डेकन की बैलेंस शीट तक नहीं देखी और गोपीनाथ को डिमांड ड्राफ़्ट भिजवा दिया."

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