इलाहाबाद विश्वविद्यालय में चढ़ा सियासी पारा

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एक ज़माने में पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहा जाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय आज लगभग उन्हीं कारणों से चर्चा में है जिनकी वजह से हैदराबाद विश्वविद्यालय और जेएनयू पिछले दिनों सुर्खियों में रहे हैं.

आज़ादी के बाद विश्वविद्यालय में पहली बार छात्र संघ अध्यक्ष बनीं एक महिला ऋचा सिंह के प्रवेश की वैधता को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन सुर्खियों में है.

ऋचा सिंह ग्लोबल एंड डेवलपमेंट विभाग से डॉक्टरेट यानी डी.फ़िल कर रही हैं. आरोप है कि उनका प्रवेश नियमों को ताक पर रखकर किया गया है.

लेकिन ऋचा सिंह कहती हैं, "मेरा प्रवेश नियमों के तहत हुआ है और यदि नहीं हुआ था तो दो साल बाद उस पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?"

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Image caption इलाहाबाद यूनिवर्सिटी छात्र संघ अध्यक्ष ऋचा सिंह

बताया जा रहा है कि मामला सिर्फ़ ऋचा सिंह के डी.फिल. में प्रवेश का ही नहीं है बल्कि ये छात्रसंघ में दो विचारधाराओं के टकराव का मामला है.

बकौल ऋचा सिंह, “इसकी शुरुआत तभी से हुई जब मैंने विश्वविद्यालय में भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ को आने से रोका था. तभी से मुझे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के इशारे पर विश्वविद्यालय प्रशासन किसी न किसी बहाने परेशान कर रहा है.”

पिछले साल सितंबर महीने में हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष पद को छोड़कर अन्य सभी सीटें भारतीय जनता पार्टी समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जीती थीं.

अध्यक्ष ऋचा सिंह जीती तो निर्दलीय थीं लेकिन उन्हें वामपंथी विचारधारा और समाजवादी पार्टी से जुड़ा हुआ बताया जाता है.

उसके बाद से ही एबीवीपी और ऋचा सिंह के समर्थक कई बार आमने-सामने आ चुके हैं.

चाहे वह ऋचा सिंह की ओर से योगी आदित्यनाथ के विरोध का मामला हो या फिर एबीवीपी का पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन का विरोध करना.

एबीवीपी से जुड़े विश्वविद्यालय छात्र संघ के महामंत्री सिद्धार्थ सिंह कहते हैं, "ऋचा सिंह छात्रों के हितों में कुछ नहीं करतीं सिर्फ़ लखनऊ और दिल्ली जाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रही हैं."

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Image caption इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति रतनलाल हांगलू

ऋचा सिंह विश्वविद्यालय प्रशासन पर भी मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगा रही हैं और इसे सीधे तौर पर रोहित वेमुला और कन्हैया कुमार से जोड़ रही हैं.

लेकिन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रतनलाल हांगलू कहते हैं कि न तो उनको कोई नोटिस दिया गया है और न ही अभी उनका एडमिशन निरस्त किया गया है. ऐसे में उत्पीड़न का आरोप लगाना ठीक नहीं है?

बीबीसी से बातचीत में प्रोफ़ेसर हांगलू कहते हैं, “ऋचा के प्रवेश में आरक्षण नियमों की अनदेखी की शिकायतें मिली थीं. हमने डीन प्रोफ़ेसर सत्यनारायण से इसकी जांच कराई जिसमें इस बात की पुष्टि हुई है. अब पांच सदस्यों की एक कमेटी दोबारा बनाई गई है जो ये देखेगी कि ग़लती किस स्तर पर हुई है.”

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जहां तक मामले को हैदराबाद विश्वविद्यालय और जेएनयू से जोड़ने का सवाल है तो इसे लेकर विश्वविद्यालय के तमाम छात्रों, प्राध्यापकों और कुछ पूर्व छात्रों की अलग-अलग राय है, लेकिन एक बात को लेकर ज़्यादातर एकमत हैं कि इन सबसे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल हो रही है.

छात्र संघ के कुछ पूर्व अध्यक्षों से इस बारे में जब बात की गई तो उनका कहना था कि अलग विचारधारा का छात्रसंघ कोई पहली बार नहीं बना है, लेकिन छात्र हितों के मुद्दे पर आवाज़ एक होती थी. अब ऐसा नहीं हो रहा है.

विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष संजय तिवारी छात्र संघ पदाधिकारियों के इस झगड़े के पीछे राजनीति को कम लिंगदोह कमेटी को ज़्यादा दोष देते हैं.

उनका कहना है कि इस कमेटी के लागू होने के बाद छात्र संघ की राजनीति में अपरिपक्व छात्र आने लगे हैं जिन्हें तमाम चीजों का अनुभव नहीं होता और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बड़ी जल्दी परवान चढ़ने लगती है.

यही नहीं, ऋचा सिंह का मामला अब छात्र राजनीति से आगे बढ़कर दलीय राजनीति तक पहुंच गया है.

पिछले दिनों न सिर्फ़ राज्यसभा में इसकी गूंज सुनाई दी, बल्कि पूर्व मुख्य मंत्री मायावती ने ऋचा को सुरक्षा देने की मांग की और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो महिला दिवस पर उन्हें आनन-फानन में बुलाकर सम्मानित किया.

लेकिन मामले के राजनीतिकरण पर विश्वविद्यालय के आम छात्रों में काफी रोष है. छात्रों का कहना है कि जिस विश्वविद्यालय की पहचान उसकी अकादमिक और राजनीतिक गुणवत्ता के लिए होती थी, वह अब ‘ग़लत’ वजहों से चर्चा में है.

जहां तक ऋचा सिंह के प्रवेश का मामला है, तो अब सबकी निग़ाहें कुलपति की ओर से गठित उस पांच सदस्यीय कमेटी पर हैं जो तय करेगी कि ऋचा सिंह के एडमिशन में ग़लती किसने की और क्यों की? लेकिन ये सवाल बना हुआ है कि दो साल पहले की कथित ग़लती अचानक अब क्यों चर्चा में है?

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