मौलाना शिरानी या भागवत, नाम में क्या है!

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नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ़ को एक ही चुनौती का सामना करना है. एक हाथ से विकास भी करना है. और दूसरा हाथ नरेंद्र मोदी को आरएसएस और संघ प्रमुख मोहन भागवत और नवाज़ शरीफ़ को इस्लामी नजरियाती काउंसिल के चेयरमैन मौलाना मुहम्मद ख़ान शिरानी के मुंह पर भी रखना है.

मौलाना शिरानी कहते हैं कि अगर औरतें बनाव श्रृंगार ना करें, बिलावजह घर से ना निकलें और अपने शरीर के उन हिस्सों को छुपाकर रखें जिससे पुरुष बेचैन हो जाता है, तो फिर कामी अपराध भी कम होते चले जाएंगे.

मोहन भागवत कहते हैं कि शहरों में पश्चिमी संस्कृति फैलने की वजह से रेप और गैंग रेप की घटनाएं बढ़ी हैं, जबकि ग्रामीण भारत में देसी संस्कारों को अब भी महत्वपूर्ण समझा जाता है. इसलिए वहां इतने भयंकर अपराध नहीं होते.

मौलाना शिरानी कहते हैं मगरबी तहजीब के पीछे अंधाधुंध भागते रहोगे और इस्लामिक संस्कारों को नहीं अपनाओगे तो समाज नंगेपन और बेगैरती के दलदल में धंसता चला जाएगा.

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मुझे तो इन महान बुद्धिजीवियों से कोई शिकायत नहीं. शिकायत है तो शेखर कपूर से, जिन्होंने अब तक बैंडिट क्वीन की वीडियो ना ही मोहन भागवत को भेजी और ना ही मौलाना शिरानी को.

मुझे भारत का तो नहीं मालूम मगर पाकिस्तान में हर साल आठ से दस हज़ार रेप और गैंग रेप के केस रजिस्टर्ड होते हैं.

जो रजिस्टर्ड नहीं होते उनकी संख्या अल्लाह जाने. हर साल ढाई हज़ार के क़रीब औरतें किसी और के साथ शारीरिक संबंधों के शक में अपने बाप-भाई या किसी रिश्तेदार के हाथों कत्ल होती हैं.

और अक्सर ऐसे केसों को थाने तक पहुंचने से पहले ही दबा दिया जाता है.

किसी महिला पर तेजाब फेंकने की सज़ा मौत है. फिर भी पिछले साल सिर्फ पंजाब में मुंह पर तेजाब फेंकने के 31 मामले दर्ज हुए हैं.

इसमें से अस्सी फ़ीसद वारदातें छोटे कस्बों और देहातों में होती हैं. ये उस देश का हाल है जिसकी आबादी बीस करोड़ बताई जाती है.

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भारत की आबादी एक अरब तीस करोड़ तक है. अब आप ख़ुद ही हिसाब लगा लें कि वहां महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की छवि पाकिस्तान से कितनी अलग होगी.

मोहन भागवत हो या मौलाना शिरानी या उनके हज़ारों-लाखों भक्त, एक ही विचारधारा पर खड़ा ये भाईचारा औरत पर ही खत्म नहीं हो जाता.

पाकिस्तान में जैसे ही वैलेंटाइन डे या न्यू ईयर आता है सोशल मीडिया में लाल रंग, गुलाब के फूल, और घर से बाहर निकलने वाली औरतों की निंदा शुरू हो जाती है.

इस साल तो दो-तीन शहरों में सरकारी तौर पर गुलाब बेचने पर ही पाबंदी रही. भारत का तो मुझे नहीं मालूम कि वहां वैलेंटाइन डे या न्यू ईयर पर लाठी डंडा लेकर घूमने वाले जोशिले युवा गैंग क्या-क्या करते होंगे?

तो मुझे लगता है कि दक्षिण एशिया में आम पुरुष हो या महिला, देहाती हो या शहरी, हिंदू हो कि मुसलमान, दोनों तरफ उनका हंसना हराम है, अलबत्ता रोने पर कोई पाबंदी नहीं.

दोनों देशों को एक ही धर्म और संस्कृति की जैकेट पहनाने वालों ने जोड़ तो रखा है.

मौलाना मुहम्मद शिरानी हो या मोहन भागवत नाम में क्या रखा है !

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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