संघ की ड्रेस से कैसे ग़ायब हुआ खाक़ी?

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी यूनिफ़ॉर्म में बदलाव करते हुए ख़ाकी रंग की हाफ़ पैंट की जगह भूरे रंग की फ़ुल पैंट शामिल की है.

इसे संघ के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है, लेकिन यह कोई पहला मौका नहीं, जब संघ ने अपनी यूनिफ़ॉर्म बदली है.

संघ ने कब-कब अपनी इस यूनिफ़ॉर्म में बदलाव किया है, उससे पहले यह जानना भी बेहद दिलचस्प है कि शुरुआती दिनों में संघ की यूनिफ़ॉर्म क्या थी?

क्या थी पहली यूनिफ़ॉर्म?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना नागपुर में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के घर पर विजयादशमी के दिन 1925 में हुई थी. संघ की वेबसाइट के मुताबिक़ स्थापना के वक़्त संघ की यूनिफ़ॉर्म थी-खाक़ी शर्ट, खाक़ी निकर और ख़ाकी टोपी.

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वेबसाइट पर संघ की स्थापना के समय बूट का ज़िक्र नहीं मिलता. वैसे दिलचस्प यह है कि संघ की स्थापना से बहुत पहले ही हेडगेवार अपने समर्थकों के लिए यूनिफ़ॉर्म तय कर चुके थे.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नामचीन कार्यकर्ता एचवी शेषाद्री ने हेडगेवार की जीवनी में लिखा है, ''जनवरी 1920 में एलवी पराजंपे ने भारत स्वयंसेवक मंडल की स्थापना की थी. हेडगेवार उनके प्रमुख सहयोगी थे. जुलाई के महीने में कोशिश की गई कि स्वंयसेवक मंडल के 1000-1500 स्वयंसेवियों को तैयार किया जाए. इन्हें नागुपर में होने वाली कांग्रेस की सालाना बैठक में योगदान देने के लिए तैयार करना था. डॉ. हेडगेवार ने इस काम में अपना दिल और आत्मा दोनों झोंक दी.''

क्यों बनी यूनिफ़ॉर्म?

हेडगेवार चाहते थे कि कांग्रेस के अधिवेशन में मंडल के सदस्य दूर से ही पहचान में आएं और अनुशासित भी दिखें. इसके लिए उन्होंने मंडल सदस्यों के लिए खाक़ी शर्ट, खाक़ी निकर, खाक़ी टोपी, लंबे मोज़े और जूतों का ड्रेस कोड तैयार किया था. उन्होंने ऐसी ड्रेस किन वजहों से तैयार की, इसे लेकर कई तरह के आकलन हैं.

एक तो यही है कि उन पर अपने गुरु बीएस मुंजे का काफ़ी असर था. मुंजे हिंदू महासभा के नेता थे और मुसोलिनी से मिल चुके थे और उनसे प्रभावित भी थे. मुसोलिनी की सेना से भी वे प्रभावित थे.

ऐसे में बहुत संभव है कि उसका असर हेडगेवार की यूनिफ़ार्म में नज़र आया हो. निकर का चयन संभव शारीरिक कसरत को ध्यान में रखकर किया गया होगा.

चूंकि हेडगेवार ने कांग्रेस की बैठक के लिए पहली बार ड्रेस तैयार की थी और तब गांधी टोपी का चलन भी ख़ूब था. ऐसे में इस टोपी पर गांधी टोपी का भी असर हो सकता है.

बहरहाल, सच यही है कि संघ की स्थापना से पांच साल पहले ही हेडगेवार संघ की यूनिफ़ॉर्म तय कर चुके थे.

कब बदला टोपी का रंग?

मगर टोपी में सबसे पहला बदलाव संघ की स्थापना के पांच साल बाद ही हो गया.

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1930 में खाक़ी टोपी के बदले काली टोपी चुनी गई. यह बदलाव क्यों हुआ, इसकी कोई विश्वसनीय जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है, लेकिन मुसोलिनी की सेना काली टोपी इस्तेमाल करती थी. तो बहुत संभव है कि टोपी का रंग वहां से प्रभावित होकर बदला गया हो.

1939 में संघ ने अपनी शर्ट का रंग बदलकर खाक़ी से सफ़ेद किया. यह बदलाव इसलिए किया गया क्योंकि ब्रिटिश सेना ने संघ की ड्रेस और उनके शारीरिक अभ्यास के ड्रिल पर पाबंदी लगा दी थी. संघ के सदस्यों को पूरी खाक़ी ड्रेस में देखने से उनके ब्रिटिश राज के सैनिकों के होने का भ्रम हो सकता था, इसलिए संघ ने खाक़ी कमीज़ की जगह सफ़ेद कमीज़ का इस्तेमाल शुरू किया.

इसके बाद 1973 में सेना के चमरौंधे बूट और लंबे मोज़ों की जगह सामान्य जूते और मोज़े शामिल किए गए.

खाक़ी हुई ग़ायब
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इसके बाद 2010 में संघ ने चमड़े की बेल्ट की जगह कैनवस बेल्ट का इस्तेमाल किया. तब कहा गया कि सब जगह चमड़े की उपलब्धता न होने के चलते ऐसा किया गया है, लेकिन उसके पीछे जैन मुनि तरुण सागर की सलाह का अहम योगदान था.

उन्होंने संघ नेतृत्व के सामने चमड़े का इस्तेमाल और अहिंसा के संदेश के बीच विरोधाभास बताया था. इसी नज़रिए से कैनवस जूतों का इस्तेमाल भी शुरू हुआ.

संघ के सफ़र में धीरे-धीरे ही सही पर खाक़ी पूरी तरह ग़ायब हो गई. संघ की ओर से यही कहा जाता रहा है कि यह बदलाव समय की मांग और परिस्थितियों के मुताबिक़ किए गए हैं.

हक़ीकत ये है कि संघ की शुरुआती यूनिफ़ॉर्म अब पूरी तरह बदल चुकी है.

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