सूफ़ी कॉन्फ्रेंस में मोदी का विरोध क्यों?

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दिल्ली में 17-20 मार्च के बीच होने वाली चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सूफ़ी कॉन्फ्रेंस ऑल इंडिया उलेमा एंड मशरिक बोर्ड कर रहा है.

हज़रत सैयद मोहम्मद अशरफ़ अशरफ़ी के नेतृत्व वाला यह संगठन बरेलवी संप्रदाय से जुड़ा है, जिसका दावा है कि वो इस उपमहाद्वीप के अधिकांश मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करता है. हालांकि कई इससे इनकार करते हैं.

भारी ग़रीबी और अशिक्षा के कारण बरेलवी परंपरागत रूप से वह राजनीतिक मुक़ाम हासिल नहीं कर पाए, जिसका वो दावा करते हैं.

दिल्ली में यह आयोजन कुछ महीनों में पूरे देश में दर्जनों छोटे-छोटे सम्मेलनों के बाद हो रहा है.

देवबंदियों की तरह बरेलवी भी हनफ़ी हैं, पर देवबंदी ज़्यादा संगठित हैं और उनका नेतृत्व अधिक ताक़तवर है.

खुद को 'अहले सुन्नत' कहने वाले बरेलवी हैं, जिनकी स्थापना अल हज़रत अहमद रज़ा ख़ान (1856-1921) ने 20वीं सदी की शुरुआत में की थी.

देवबंदी और बरेलवी दोनों एक ही हनफ़ी फ़िक़ (धर्मग्रंथ) को मानते हैं और दोनों ही सूफ़ी हैं.

बरेलवी पैगंबर के गुणगान पर जोर देते हैं, वो सूफ़ी दरगाहों पर ज़ियारत करने जाते हैं जबकि देवबंदी इसका विरोध करते हैं और इसे बिदत (नई बात) मानते हैं.

दोनों संप्रदाय मस्जिदों और मदरसों पर नियंत्रण की कोशिश करते हैं, क्योंकि इनसे मुस्लिम जनता प्रभावित होती है.

परंपरागत रूप से बरेलवी अराजनीतिक रहे हैं जबकि देवबंदी राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं और ब्रितानी औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ लड़ाई में भी आगे रहे हैं.

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बरेलवी संप्रदाय का एक हिस्सा अब बीजेपी के साथ हाथ मिला चुका है जबकि अधिकांश बरेलवी अभी भी बीजेपी को अति राष्ट्रवादी हिंदू पार्टी मानते हैं, जो मुस्लिमों से बैरभाव रखती है. इसलिए वे उससे दूरी बनाए रखते हैं.

जैसे ही इस सूफ़ी कांफ्रेंस की ख़बर बाहर आई, भारतीय मुस्लिम समुदाय के महत्वपूर्ण नेताओं ने 11 फ़रवरी को एक प्रेस कांफ्रेंस कर सांप्रदायिक लड़ाई में धकेले जाने की साज़िश के ख़िलाफ़ भारतीय मुसलमानों को चेतावनी दी.

संयुक्त बयान में इन नेताओं ने कहा कि जिन लोगों ने अतीत में राजनीतिक फ़ायदे के लिए हिंदुओं-मुस्लिमों को एक दूसरे से लड़ाया है, उन्होंने अब मुस्लिमों को आपस में ही लड़ाने की साज़िश रची है.

नेताओं ने आरोप लगाया कि भारत सरकार इस उद्देश्य के लिए खुले हाथ से फ़ंड मुहैया करा रही है. उन्होंने कहा कि यह नीति न तो देश के लिए फ़ायदेमंद है और न इससे किसी समुदाय को मदद मिलने वाली है.

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उन्होंने कहा कि सूफ़िज़्म के नाम पर आयोजक सांप्रदायिक विभाजन की कोशिश में हैं और गल़त तरीक़े से कुछ मुस्लिम ग्रुपों पर चरमपंथ समर्थक होने का आरोप लगा रहे हैं.

सात मार्च को इस सूफ़ी कांफ्रेंस के आयोजकों ने यह माना कि सरकार उनकी मदद कर रही है. उन्होंने यह कहते हुए इसे सही ठहराया कि इतना बड़ा आयोजन बिना सरकारी मदद के संभव नहीं है.

अगले दिन ही बरेलवी संप्रदाय के प्रभावशाली नेताओं ने आयोजन की निंदा कर दी.

मुंबई में जारी एक बयान में उन्होंने इसके उद्देश्य पर सवाल उठाया. महाराष्ट्र के ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत उलेमा और रज़ा एकेडमी समेत कई संगठनों की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस 'सूफ़ी कॉन्फ्रेंस' को उन कुछ ताक़तों का समर्थन हासिल है, जो भारतीय मुस्लिमों को 'संप्रदाय' और 'विश्वास' के आधार पर बांटना चाहते हैं.

बयान में ख़ासतौर पर आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए जाने का विरोध किया गया था.

बयान में कहा गया कि बरेलवी विद्वानों के तीन अहम धार्मिक केंद्र इस कॉन्फ्रेंस में हिस्सेदारी नहीं कर रहे, जिनमें बरेली शरीफ़, बदायूं शरीफ़ आदि के नेता भी हैं.

आगे कहा गया कि इस "कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने से भारतीय मुस्लिमों को धार्मिक और राजनीतिक नुक़सान हो सकता है. इसी वजह से उलेमा वहां नहीं जा रहे हैं. मुस्लिमों के लिए छिपे ख़तरों से बचने के लिहाज़ से ये फैसला लिया गया."

इस बयान में बरेलवी संप्रदाय के कई प्रभावशाली विद्वानों के नामों का ज़िक्र था, जो कॉन्फ्रेंस में नहीं जा रहे. इनमें बरेली शरीफ़, मारहरा शरीफ़, किच्छोचा शरीफ़ और जामिया अशरफ़िया मुबारकपुर (आज़मगढ़) शामिल हैं.

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मुस्लिम समुदाय को जानने वाले सूफ़ी कॉन्फ्रेंस को बीजेपी की योजना के रूप में देखते हैं, जिसके तहत बीजेपी मुस्लिमों के बीच विभाजन करके उनके बड़े हिस्से में वोट बैंक बनाना चाहती है.

जानकारों को लगता है कि बीजेपी हिंदू-मुस्लिम विभाजन से आगे मुस्लिम-मुस्लिम विभाजन की ओर जा रही है.

कई राज्यों में विधानसभा चुनाव क़रीब हैं. बीजेपी और उसके सहयोगी संगठन सांप्रदायिक आधार पर मतदाताओं में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं.

नई रणनीति की मदद से पार्टी दूसरे मुसलमानों को चरमपंथ समर्थक के रूप में बताकर बरेलवी संप्रदाय के बीच कुछ मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकती है.

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सूफ़ी कॉन्फ्रेंस के आयोजक लगातार अन्य मुस्लिम ग्रुपों पर चरमपंथ समर्थक होने का आरोप लगा रहे हैं. जबकि तथ्य यह है कि भारत के हर मुस्लिम ग्रुप और संगठन ने चरमपंथ की निंदा की है और कई बयान और फ़तवे जारी किए हैं.

भारतीय मुस्लिम समुदाय के नेताओं के इस साफ़ नज़रिए की वजह से ही भारतीय मुस्लिमों के बीच चरमपंथ की समस्या पर लगाम लगा हुआ है.

कॉन्फ्रेंस और बरेलवी नेताओं और मोदी के बीच की नई नई दोस्ती को अन्य मुस्लिम ग्रुप सूफ़ी/बरेलवी को देवबंदी/वहाबी के ख़िलाफ़ खड़ा करने के रूप में देखा जा रहा है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक दिल्ली से प्रकाशित होने वाली अग्रणी मुस्लिम अंग्रेज़ी समाचार मैग्ज़ीन 'मिल्ली गैज़ेट' के संपादक हैं.)

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