अब कोई पेड़ नहीं काटता कलावती के गांव में

(यह बीबीसी की ख़ास सिरीज़ "हीरो हिंदुस्तानी" #HeroHindustani #UnsungIndians का आठवां अंक है)

1980 के दशक के शुरुआती साल थे. कलावती देवी रावत शादी के बाद अपने पति के घर चमोली ज़िले के बाचेर गांव में रहने आई थीं.

तब गांव में बिजली नहीं थी. पहाड़ियों पर अंधेरे में जीवनयापन काफ़ी मुश्किल था.

एक दिन वह गांव की महिलाओं के साथ ज़िले की तहसील गोपेश्वर में सरकारी अधिकारियों से मिलने पहुँची. इन्होंने अधिकारियों से गांव में बिजली देने की मांग की, पर अधिकारियों पर कोई असर नहीं हुआ.

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वापसी में इन महिलाओं को कुछ बिजली के पोल दिखे, जिनका इस्तेमाल किसी आधिकारिक कार्यक्रम में बिजली मुहैया कराने के लिए होना था.

कलावती और अन्य महिलाओं ने इन्हें उठा ले चलने को कहा. महिलाओं ने अपने कंधे पर पोल और तार उठाने शुरू कर दिए. इससे अधिकारी नाराज़ हो गए.

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अफ़सरों ने महिलाओं पर केस दर्ज कराने की धमकी दी. मगर एक के बाद एक महिलाएं आती गईं और जेल भेजने की मांग करती रहीं.

इसके बाद अधिकारियों को गांव को पावर ग्रिड से जोड़ने का फ़ैसला करना पड़ा. कलावती की यह पहली जीत थी.

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बीते तीन दशक में उन्होंने जंगल काटने वाले माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ अभियान चलाया और फिर अपने गांव में शराबबंदी की मुहिम चलाई.

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कलावती देवी रावत ने बीबीसी से कहा, ''गांव में मेरे पति सहित दूसरे लोग शराब पीते थे और इसका फ़ायदा लकड़ी काटने वाले माफ़िया उठाते थे. एक सुबह मैं दूसरी महिलाओं के साथ जंगल में मवेशी चराने गई तो वहां मैंने देखा कि पेड़ों पर सफ़ेद चॉक के निशान लगे थे, जिन्हें बाद में काटा जाना था.''

''हमें लगा कि पेड़ बचाने के लिए कुछ करने की जरूरत है. पेड़ों के साथ हमारे गांव के लिए जीविका के इकलौते सहारे तांतरी जंगल को बचाना भी ज़रूरी था.''

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उन्होंने चिपको आंदोलन की तर्ज़ पर महिलाओं को एकजुट किया. 1970 के दशक के चिपको आंदोलन के दौरान उत्तराखंड के लोग पेड़ों से चिपककर उसे काटने का विरोध करते थे.

कलावती बताती हैं, ''पहले तो उन लोगों ने हमें रिश्वत देने की कोशिश की. फिर उन्होंने हमें धमकी दी. हमने ज़िला अधिकारियों के सामने भी प्रदर्शन किया. इसके बाद अधिकारियों ने पेड़ न काटने का निर्देश जारी किया.''

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फिर कलावती ने गांव की महिलाओं का छोटा सा समूह बनाया, जिसे महिला मंगल दल कहते हैं. यह दल पेड़ों पर नज़र रखता है. समूह की महिलाओं ने स्थानीय तौर पर अवैध शराब की फ़ैक्ट्रियां भी नष्ट की हैं.

जंगल और पेड़ बचाने के साथ-साथ इन महिलाओं ने पुरुष प्रधान ग्राम पंचायतों के चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया.

कलावती बताती हैं, ''ये आसान काम नहीं था. हमें समाज और प्रशासन दोनों का प्रतिरोध झेलना पड़ा. ये लोग चाहते थे कि महिलाएं घरों में रहें और घरेलू काम देखें. मेरे पति ने भी मेरा विरोध किया. एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं क्या करती रहती हूँ.''

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कलावती बताती हैं कि उन्होंने अपने पति को समझाने की कोशिश की, कि इससे अपने लोगों का ही फ़ायदा है.

वे बताती हैं, ''लेकिन मेरे पति पर कोई असर नहीं हुआ. आख़िर हमने अलग होने का फ़ैसला ले लिया.''

तब पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी पर कलावती रावत ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने की मुहिम चला रही थीं. इसके लिए उन्हें 1986 में इंदिरा प्रियदर्शिनी अवार्ड दिया गया. फिर उन्हें ढेरों सम्मान मिले.

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मगर उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह है, जो उन्हें अपने गांव वालों से मिला.

ग्राम परिषद सदस्य राधा देवी बताती हैं, ''अब हम जो फ़ैसले लेते हैं, वो सबको स्वीकार होते हैं.''

राधा देवी कहती हैं, ''हमने शराब के चुंगल से कई को बचाया. कई परिवार इससे तबाह होने से बचे. कोई पेड़ नहीं काटता. गांव के लोगों को जंगल से कहीं ज़्यादा फल-फूल मिलते हैं.''

कलावती देवी रावत को शिक्षा नहीं मिली पर वे सालों से अपने गांव की महिलाओं के लिए रोल मॉडल सरीखी हैं. उनका पुरुष भी सम्मान करते हैं.

गौतम पंवार कहते हैं, ''आज हमें जंगल के उत्पादों का फ़ायदा मिलता है. यह हमारी आमदनी का सबसे बड़ा साधन है.''

वहीं विनोद कपरवान कहते हैं, ''अगर उन्होंने कोशिश न की होती, तो हमारे जंगल ख़त्म हो चुके होते और लोग शराब के चक्कर में बर्बाद हो रहे होते.''

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