ब्रसेल्स में दिखी चरमपंथियों की पहुँच

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ब्रसेल्स के हमले को उस शख़्स की गिरफ़्तारी के साथ जोड़कर देखना चाहिए, जो पेरिस हमलों में शामिल था.

पेरिस हमले के आरोपी सालेह अब्देसलाम को बेल्जियम से गिरफ़्तार किया गया. वह बड़ी उपलब्धि मानी जा रही थी.

जताया जा रहा था कि इस गिरफ़्तारी और तफ़्तीश से इस्लामिक स्टेट और दूसरे चरमपंथी संगठनों के बहुत से नेटवर्क तोड़ने में मदद मिलेगी.

मगर लगता है कि चरमपंथी गुटों ने फिर से अपनी पहुँच और ताक़त का प्रदर्शन कर दिया है.

गिरफ़्तारी के बाद बड़ा हमला जैसे और जितनी जल्दी किया गया, उससे ख़तरे की घंटियां बजनी ही चाहिए.

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सरकारी तंत्र के लिए अब ये लाज़िमी होगा कि वो आपसी तालमेल, इंटेलिजेंस शेयरिंग, सर्वेलांस और मॉनीटरिंग बढ़ाएं.

इससे अभिव्यक्ति की आज़ादी, स्वतंत्रता और निजता में सेंध जैसे सवाल भी खड़े होंगे.

इसके अलावा यूरोप के भीतर बड़ा सवाल यह भी होगा कि मल्टी कल्चरलिज़्म और लिबरलिज़्म की नीति क्या चरमपंथ के साए में बच पाएगी.

इससे शायद यूरोप में सभी जगह दक्षिणपंथी पार्टियों की ताक़त भी बढ़ेगी.

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मेरे ख़्याल से यूरोप में शरणार्थी संकट से कैसे निपटा जाए, इस पर यूरोप को नए सिरे से ध्यान देना होगा.

भारतीय प्रधानमंत्री 30 मार्च को बेल्जियम के दौरे पर जा रहे हैं. उन्हें ब्रसेल्स में भारतीय सुमदाय को भी संबोधित करना था.

उनके इस कार्यक्रम पर थोड़ा असर तो पड़ेगा. ख़ासकर ऐसे आयोजन जिस चमक-दमक के साथ होते हैं, उसे देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए जाएंगे.

एक और बात होगी, नरेंद्र मोदी के दौरे पर भारत और यूरोपियन यूनियन के साथ तमाम मुद्दों पर बातचीत होगी, पर उसमें आतंकवाद का मुद्दा सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरेगा.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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