जब रैंप पर दिखे कपड़े सीते कारीगर

इंडिया फ़ैशन वीक, कारीगर इमेज कॉपीरइट Namit Sirohi

जमाल सिद्दीक़ी एक दशक से ज़्यादा समय से कढ़ाईदार कपड़े सिल रहे हैं लेकिन कुछ समय पहले तक उन्हें यह पता नहीं था कि इन्हें पहनता कौन है.

गुरुवार को वह गर्व से मुस्कुराते हुए अपने कौशल को इंडिया फ़ैशन वीक के रैंप पर चलने वाले लोगों को दिखा रहे थे.

एक हाथ से कटे कपड़े के टुकड़े को इस कुशलता से सीते हुए कि वह थ्रीडी बनावट का लगे, उन्होंने एक महिला को बताया, "मैं एक ख़ूबसूरत ड्रेस बना रहा हूं."

सिद्दीक़ी बिहार से 2006 में दिल्ली आए थे. उनके पास कॉलेज की डिग्री तो नहीं थी लेकिन बारीक कढ़ाई की कला उनके पास थी.

और वो एक दशक बाद भारत के सबसे प्रमुख फ़ैशन वीक के रास्ते पर थे.

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उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं एक छोटे से क़स्बे का हूं और मुझे नहीं पता कि लोग मेरे पेशे का सम्मान करते हैं. मुझे अब भी यक़ीन नहीं जो हुआ है. मैंने मॉडल्स को वह कपड़े पहने देखा है जो मैंने बनाए हैं."

सिद्दीक़ी दिल्ली में काम करने वाली एक डिज़ाइनर और टेक्सटाइल आर्टिस्ट, रिमज़िम दादू, के पास काम करते हैं. ये दादू का ही विचार था कि न सिर्फ़ कपड़ों बल्कि उसे तैयार करने वाले लोगों को भी सामने लाया जाए.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि उन्हें लगा कि उनका शो फ़ैशन की 'मान्यता के ख़िलाफ़' है.

वह कहती हैं, "मैं चाहती हूं कि लोग उन कारीगरों से संवाद करें जो हमारे कपड़े बनाते हैं. मैं चाहती हूं कि ध्यान तैयार उत्पाद से खिसककर इसे तैयार करने की प्रक्रिया पर जाए."

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सिद्दीक़ी और उनके 15 साथियों ने रैंप और दर्शकों के बीच रखे वर्कस्टेशन पर सिलाई की कई तकनीकों का प्रदर्शन किया.

शो स्थल पर आने से पहले दर्शकों को एक निर्देश पुस्तिका दी गई और उन्हें रैंप और नीचे मौजूद कपड़ों के डिज़ाइन को 'छूने' और 'संवाद' करने को प्रोत्साहित किया गया.

दर्शकों में मौजूद मानसी मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया कि यह 'विलक्षण' था कि लोगों को रनवे पर चलने की इजाज़त थी जो आमतौर पर एक पवित्र सी जगह होती है और मॉडल्स और डिज़ाइनर्स के लिए सुरक्षित होती है.

उन्होंने कहा, "मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा. कारीगर दर्शकों को अपनी तकनीकों के बारे में बताने और बात करने को उत्सुक थे."

दादू कहती हैं कि वह ख़ुद अपना कपड़ा और बुनावट तैयार करना पसंद करती हैं. जिसके लिए बहुत बारीक कारीगरी की ज़रूरत पड़ती है.

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"इसीलिए शो शुरू होने से 20 मिनट पहले ही मैंने दरवाज़े खोल दिए थे ताकि लोग हमारी तकनीक को बेहतर ढंग से समझ सकें."

बरेली के चंदन श्रीवास्तव इस शो का हिस्सा बनकर बेहद उत्साहित हैं.

वो कहते हैं, "मैं दिल्ली में एक दशक से ज़्यादा समय से रह रहा हूं और ज़्यादातर वर्कशॉप में ही काम किया है, लेकिन आज मुझे फ़ैशन वीक में लोगों को अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिला. मैं बहुत ख़ुश हूं."

जाफ़र अली नाज़ुक शिफ़ॉन को उम्दा तागे में बदलने की विलक्षण तकनीक पर काम कर रहे हैं. उन्होंने लोगों को बताया कि कई बार सिर्फ़ एक ड्रेस को बनाने में दो से तीन हफ़्ते लग जाते हैं.

वह बताते हैं, "हम शिफ़ॉन के छोटे-छोटे टुकड़े कर देते हैं और उन्हें गूंथकर हल्की कड़ी रस्सी बना देते हैं, जो कपड़ों से सिल दी जाती हैं ताकि एक अलग सी बुनावट मिली."

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दादू कहती हैं कि वह चाहती हैं कि दर्शकों को ऐसा लगे कि वह उनके स्टूडियो में आए हैं.

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