ये चायवाला बदल रहा है गांववालों की ज़िंदगी

केएम यादव, आरटीआई मैन

(यह बीबीसी की ख़ास सिरीज़ "हीरो हिंदुस्तानी" #HeroHindustani #UnsungIndians का नौवां अंक है)

केएम यादव ने सैकड़ों ग्रामीणों को सरकार के बारे में जानकारियां हासिल करने में मदद की है. इन जानकारियों के बल पर लोगों ने सरकार से मिलने वाली सुविधाएं और अपना हक़ हासिल किया.

यादव उत्तर प्रदेश के चौबेपुर गांव में अपनी चाय की दुकान पर बैठे हैं. चाय की यह दुकान उनका दफ़्तर भी है.

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वे लोगों को गरमागरम चाय पिला रहे हैं और उनसे बातें भी कर रहे हैं.

चाय की यह दुकान दूसरी दुकानों से अलग नहीं है. तीन कच्ची दीवारो और फूस की छत के नीचे 10 कुर्सियां और मेज़ हैं.

वहां कई लोग बैठे हुए हैं, जिनके हाथ में काग़ज़ात हैं. वे लोग काफ़ी उत्तेजित भी हैं.

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यादव उन काग़ज़ात को देखते हैं, उनके नोट बनाते हैं और लोगो को कई तरह के सुझाव देते हैं.

यह साफ़ है कि ये लोग अपनी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए यादव के पास आए हुए हैं.

सूचना के अधिकार क़ानून को भारत में ‘ग़रीबों का हथियार’ भी कहा जाता है.

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साल 2005 से ही इस क़ानून ने लोगों को इस लायक बनाया कि वे सरकारी अधिकारियों से सवाल पूछ सकें.

सरकारी विभागों के ग़लत कामकाज और भ्रष्टाचार का खुलासा करने में इससे काफ़ी सहूलियत हुई है और इस वजह से इस क़ानून की काफ़ी तारीफ़ भी हुई है.

पर इस क़ानून की ख़ामियां भी हैं.

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यादव ने बीबीसी से कहा, “गांवों में जो लोग पढ़ लिख नहीं सकते, उनके लिए अर्ज़ी देना मुश्किल है. जो अनपढ़ हैं, उन्हें आवेदन करने की प्रकिया भी मालूम नहीं है.”

वे आगे कहते हैं, “ऐसे में लोगों को मेरी ज़रूरत होती है. मैं उन्हें आरटीआई के ज़रिए सिर्फ़ अपनी आवाज़ उठान में मदद करता हूं. मैं एक बार एक आवेदन करता हूं.”

यादव की चाय की दुकान तमाम गतिविधियों का केंद्र है. चौबेपुर और आसपास के गावों के बाशिंदे यादव को ‘सूचना का सिपाही’ और ‘आधुनिक समय का महात्मा गांधी’ कहते हैं.

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पर वे इससे सहमत नहीं हैं. वे कहते हैं, “मैं महज एक कार्यकर्ता हूं और इन ग्रामीणों को उनकी समस्याओं से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाएं हासिल करने में मदद करता हूं.”

यादव ने पास के कानपुर शहर में नौकरी छोड़ने के बाद साल 2010 में आरटीआई के प्रति जागरुकता बढ़ाने का अभियान शुरू किया था.

उन्होंने जल्द ही यह महसूस किया कि गांव के लोगों को सूचना के अधिकार के क़ानून की अधिक ज़रूरत है.

उन्होंने साल 2013 में किराए पर एक कमरा लिया और चाय की दुकान का इस्तेमाल दफ़्तर की तरह करना शुरू किया.

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उन्होंने उस समय से अब तक 800 आरटीआई आवेदन डाले हैं.

चौबेपुर के बाशिंदे, जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, वह भारत के गांवों के लोगों की समस्याओं का एक उदाहरण भर है.

भूमि विवाद, कर्ज़ की योजनाएं, पेंशन, सड़क निर्माण और स्थानीय स्कूलों के लिए पैसे, ये समस्याएं ज़्यादा प्रमुख हैं.

राज बहादुर सचान आरोप लगाते हैं कि कुछ लोगों ने उनकी ज़मीन छीन ली थी और वे उनसे अपनी ज़मीन वापस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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उन्होंने बीबीसी से कहा कि अदालत ने साल 1994 में ही कह दिया था कि वह ज़मीन उनकी है. दो दशक बाद भी वे वह ज़मीन पाने की कोशिश कर रहे हैं.

वे यादव से पिछले साल मिले. उन्होंने अदालती आदेश की एक प्रति और सरकारी विभागों से सूचना लेने के लिए आरटीआई की अर्ज़ी डाली है.

यादव कहते हैं, "उनके मामले में समय अधिक लग रहा है क्योंकि कई विभाग इससे जुड़े हुए हैं. पर उनके पास वे सब काग़जात हैं, जो नए आवेदन के लिए ज़रूरी हैं."

उधर 70 साल के रमेश चंद्र गुप्ता यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके गांव के लोगों को सरकारी दुकान से सस्ते में अनाज मिले.

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वे कहते हैं, "उस दुकान का ठेकेदार सरकारी दर से ऊंची दर पर अनाज बेच रहा था. मैंने अनाज की वास्तविक क़ीमत जानने के लिए यादव की मदद से आरटीआई आवेदन डाला. ठेकेदार जिस क़ीमत पर अनाज बेचता है, वास्तविक क़ीमत उससे 20 फ़ीसदी कम है."

उन्होंने कहा, "अधिकारियों को कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि मेरे पास सही सूचना है."

यादव ख़ुद भी अर्ज़ी डालते हैं.

वे कहते हैं, "स्कूलों के लिए सरकारी फंड, सड़क बनाने और पीने के पानी के लिए आबंटित पैसे के लिए मैंने ख़ुद 200 अर्जियां दी हैं."

वे इसके आगे जोड़ते हैं, "लगभग सभी मामलों में मैं सरकारी अधिकारियों पर काम करने के लिए दवाब डालने में कामयाब रहा क्योंकि मेरे पास सही जानकारी थी."

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