'बहस इतनी लंबी खींचो, कोई फ़ैसला ही न हो'

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संसदीय राजनीति में जब कोई विचार, अवधारणा या गतिविधि असाधारण गति पकड़ ले तो उसे धीमी करने के लिए क्या करें? या किसी पक्ष का बहुमत प्रबल हो जाए तो अल्पमत की रक्षा कैसे की जाए?

दुनियाभर की संसदीय परंपराओं ने ‘फिलिबस्टरिंग’ की अवधारणा विकसित की है. इसे सकारात्मक गतिरोध कह सकते हैं. बहस को इतना लम्बा खींचा जाए कि उस पर कोई फ़ैसला ही न हो सके, या प्रतिरोध ज़ोरदार ढंग से दर्ज हो वगैरह.

संयोग से ये सवाल पिछले कुछ समय से भारतीय संसद में जन्मे गतिरोध के संदर्भ में भी उठ रहे हैं. इसका एक रोचक विवरण दक्षिण कोरिया की संसद में देखने को मिलता है, जो भारत के लिए भी प्रासंगिक है.

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दक्षिण कोरिया की संसद में उत्तर कोरिया की आक्रामक गतिविधियों को देखते हुए आतंक विरोधी विधेयक पेश किया गया. इस विधेयक पर 192 घंटे लम्बी बहस चली. नौ दिनों तक लगातार दिन-रात...

विपक्षी सांसदों का कहना था कि यह विधेयक यदि पास हुआ तो नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता ख़तरे में पड़ जाएगी. इस बिल के ख़िलाफ़ 38 सांसदों ने औसतन पाँच-पाँच घंटे लम्बे वक्तव्य दिए. सबसे लम्बा भाषण साढ़े बारह घंटे का था, बग़ैर रुके.

इतने लंबे भाषण का उद्देश्य केवल यह था कि सरकार इस प्रतिरोध को स्वीकार करके अपने हाथ खींच ले. सरकारी विधेयक फिर भी पास हुआ. अलबत्ता एक रिकॉर्ड क़ायम हुआ. साथ ही विधेयक के नकारात्मक पहलुओं को लेकर जन-चेतना पैदा हुई.

‘फिलिबस्टरिंग’ संसदीय अवधारणा है. पर यह नकारात्मक नहीं सकारात्मक विचार है. तमाम प्रौढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में फिलिबस्टरिंग की मदद ली जाती है.

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दक्षिण कोरिया में यह अब तक का सबसे लम्बा फिलिबस्टर था. इससे पहले कनाडा में सन 2011 में 58 घंटे लम्बा निरंतर फिलिबस्टर चला था.

जून 2013 में अमेरिका के टेक्सास के सीनेट में सिनेटर वेंडी डेविस ने ‘फिलिबस्टर’ के तहत लगातार 11 घंटे तक अपनी बात रखकर उस बिल को पास होने से रुकवा दिया, जिसके तहत 20 हफ्ते के गर्भ के बाद गर्भपात पर पाबंदी होती.

‘फिलिबस्टर’ के तहत, सदन में किसी क़ानून को पारित कराने के लिए हो रही बहस के दौरान यदि कोई सिनेटर उस पर मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहता है, तो इसके लिए उसे 11 घंटे से ज्यादा लगातार बोलना पड़ता है. अमरीका के इतिहास में सबसे लम्बा ‘फिलिबस्टर वक्तव्य’ साउथ कैरलीना के सिनेटर स्टॉर्म टॉमसन ने 1957 में देकर नागरिक अधिकारों से जुड़े एक विधेयक को रुकवाया था. वे लगातार 24 घंटे 18 मिनट तक बोले थे.

भारत में साल 2011 के दिसंबर महीने में लोकपाल विधेयक लोकसभा से पास होकर जब राज्यसभा में आया तब उस पर लम्बी बहस चली. रात के 12 बजने वाले थे. सदन का शीत सत्र उसी रात खत्म होने वाला था. विधेयक में 187 संशोधन पेश हो चुके थे. एक प्रकार से यह अनौपचारिक फिलिबस्टर ही था.

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फिलिबस्टरिंग गतिरोध का सकारात्मक तरीक़ा है. पर जिस जिस संसद में बोलने की समय सीमा है वहाँ इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता. ब्रिटिश संसद में उन्नीसवीं सदी में कुछ सांसदों ने अनौपचारिक रूप से इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया था.

भारतीय संसद में अकसर शोर-गुल होता है, सांसद सदन के फर्श पर बैठ कर पीठासीन अधिकारी के आस-पास नारे लगते हैं. माना जाता है कि शोर भी संसदीय कर्म है. बहस को लम्बा खींचने की फिलिबस्टर की पश्चिमी अवधारणा भारतीय संसदीय बहसों पर लागू नहीं होती.

पन्द्रहवीं लोकसभा के अंतिम सत्र में पेपर स्प्रे का इस्तेमाल हुआ, किसी ने चाकू भी निकाला. टीवी पर प्रसारण रोकना पड़ा. अलबत्ता इन तरीक़ों के मुक़ाबले फिलिबस्टर सकारात्मक तरीक़ा है.

दो साल पहले जानकारी मिली थी कि राज्यसभा में बिहार से सांसद शिव चंद्र झा ने फिलिबस्टर को वैधानिक मान्यता दिलाने के लिए निजी विधेयक पेश किया है. इस विषय में ज्यादा चर्चा भी नहीं हुई. इसलिए गुज़रते समय के साथ भारतीय संसद में गतिरोध को सकारात्मक रूप देने की जरूरत जरूर महसूस की जा रही है.

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राज्यसभा में विपक्ष से हलकान मोदी सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने पिछले साल एक साक्षात्कार में कहा था कि जब एक चुने हुए सदन ने विधेयक पास कर दिए तो राज्यसभा क्यों अड़ंगे लगा रही है?

अवरोध लगाना भी राजनीतिक कर्म है. इसे सकारात्मक रूप देने के लिए फिलिबस्टर जैसी व्यवस्था की जा सकती है.

लोकसभा के साथ राज्यसभा की उपयोगिता बहस को दूर तक ले जाने के लिए भी है. जवाहर लाल नेहरू ने इस सदन की ज़रूरत को बताते हुए लिखा है, "निचली सदन से जल्दबाजी में पास हुए विधेयकों की तेजी, उच्च सदन की ठंडी समझदारी से दुरुस्त हो जाएगी."

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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