ऑनलाइन शॉपिंग में डिस्काउंट के दिन अब गए

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ई-कॉमर्स वेबसाइट पर जल्दी ही जब आप शॉपिंग करने जाएंगे तो जिस डिस्काउंट की आपको आदत-सी पड़ चुकी है वो अब आपको नहीं मिलेगा.

सरकारी पॉलिसी में ये कहा गया है कि जो भी कंपनी 'ऑनलाइन मार्केटप्लेस' चलाएगी, वो "प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामान की कीमतों पर असर नहीं डाल सकती हैं".

ई-कॉमर्स कंपनियों और रिटेल कंपनियों के बीच अब ग्राहकों के लिए लड़ाई और तेज़ होने वाली है. लेकिन नई पॉलिसी के तहत ऑनलाइन कंपनियां अब ग्राहकों के लिए अपनी जेब से डिस्काउंट नहीं दे पाएंगीं.

इस फ़ैसले को रिटेल कंपनियों के लिए जीत की तरह देखा जा रहा है. रिटेल कंपनियां ई-कॉमर्स कंपनियों के डिस्काउंट के ख़िलाफ़ कई सालों से आवाज़ उठा रही थीं.

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नई सरकारी पॉलिसी की घोषणा के बाद अब ई-कॉमर्स कंपनियों को 'ऑनलाइन मार्केटप्लेस' की तरह काम करना होगा. कुछ ई-कॉमर्स कंपनियां अपने पास माल की डिलीवरी लेकर ग्राहकों को डिस्काउंट के ज़रिए लुभाकर बिक्री कर रही थीं.

नई पॉलिसी की मार कैशबैक देने वाली वेबसाइटों पर भी पड़ेगी. गोपैसा डॉट कॉम, कैशकरो डॉट कॉम जैसी वेबसाइटों पर अगर आप लॉग-इन करके ऑनलाइन खरीदारी करते हैं तो आपको कैश डिस्काउंट मिलता है जो आपके बैंक के खाते में भेजा जाता है.

पॉलिसी में बदलाव के बाद विदेशी कंपनियां अब देश की बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों में पूरी हिस्सेदारी खरीद सकती हैं. फ़्लिपकार्ट, स्नैपडील, पेटीएम, शॉपक्लूज़ जैसी कंपनियों में जो विदेशी निवेश है, उन पर अब पूरी तरह विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा हो सकता है.

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नए नियमों के बाद एक कंपनी किसी भी ग्राहक या दूसरी कंपनी को 25 फ़ीसदी से ज़्यादा सामान नहीं बेच सकेगी. कुछ ऑनलाइन कंपनियों ने अपने ब्रांड को बढ़ाने के लिए एक कंपनी की स्थापना की थी लेकिन जिस कंपनी से ग्राहकों को सामान भेजा जाता था उसका कुछ और नाम था. इस तरीके से काम करने में अब बदलाव आ सकता है.

जो भी सामान आपको बेचा जाएगा, उसकी ज़िम्मेदारी बेचने वाली कंपनियों की होगी. एलजी, सैमसंग, सोनी जैसी कंपनियों और ई-कॉमर्स कंपनियों में इस बात पर भी झगड़ा हो रहा था कि चूंकि सामान सस्ते बेचे जा रहे हैं तो उनकी वारंटी और दूसरी सर्विस का खर्च कौन उठाएगा? इससे ग्राहकों को नुक़सान हो रहा था.

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रिटेल कंपनियों की शिकायत थी कि ऑनलाइन कंपनियां निवेशकों से पैसे इकठ्ठा करके उसका इस्तेमाल ग्राहकों को डिस्काउंट देने के काम में कर रही थीं इसलिए बाज़ारों में जिस दाम पर चीज़ें मिल रही थीं उससे सस्ते दामों पर ऑनलाइन कंपनियां उन्हें ग्राहकों को बेच रही थीं.

कुछ कंपनियों ने ऑनलाइन सामान बेचने वालों का बहिष्कार करने की घोषणा भी की थी लेकिन चूंकि उनके सामान ऐसी वेबसाइटों पर बड़ी संख्या में बिक रहे थे इसलिए वो इस बहिष्कार को किसी भी तरह लागू करने में सक्षम नहीं थे.

फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी ने कई बार ई-कॉमर्स कंपनियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी. देश की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी चलाने वाले बियानी ने नयी पॉलिसी का स्वागत किया है. उनका कहना है कि इस पॉलिसी के बाद ई-कॉमर्स और रिटेल कंपनियों के बीच कोई फ़र्क नहीं है, जो कि शुरू से होना चाहिए था.

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