उत्तराखंड की राजनीति में अब आगे क्या?

इमेज कॉपीरइट ukvidhansabha.uk.gov.in

उत्तराखंड में कांग्रेस और बीजेपी में से किसी एक पार्टी की सरकार बनना निश्चित है.

उत्तराखंड में राजनीतिक संकट तब पैदा हुआ जब विधानसभा में बजट पर वोटिंग के दौरान 9 कांग्रेस विधायक बाग़ी हो गए थे.

कांग्रेस के विधायकों के बाग़ी होने के बाद आरोप-प्रत्यारोप के बीच 28 मार्च को हरीश रावत सरकार को विधानसभा में विश्वास मत हासिल करना था.

लेकिन केंद्र ने एक दिन पहले राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

विधानसभा में कुल 70 में से कांग्रेस के 36 विधायक थे जिनमें से 9 बाग़ी हो चुके हैं, भाजपा के 28 विधायक हैं जिनमें से एक निलंबित है, निर्दलीय तीन, बसपा के दो ओर उत्तराखंड क्रांति दल का एक विधायक है.

बीबीसी ने उत्तराखंड के पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण के साथ बातचीत की है. उनकी राय इस प्रकार है:

इमेज कॉपीरइट highcourtofuttarakhand.gov.in

वहाँ कांग्रेस के पास अब भी सरकार को बचाए रखने की संभावना है क्योंकि उन्होंने 34 विधायकों की सूची राज्यपाल को दी है और उन्हें बीजेपी के एक बाग़ी विधायक का समर्थन भी हासिल है.

यदि कांग्रेस शक्ति परीक्षण में असफ़ल होती है तो बीजेपी को अंतरिम सरकार बनानी ही होगी.

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन की स्थिति में केन्द्र सरकार को 6 महीने के भीतर उसे राज्यसभा में पास कराना होगा, लेकिन वो राज्यसभा में इसे पास नहीं करा सकती, इसलिए बीजेपी को वहाँ एक अंतरिम सरकार बनानी ही होगी.

नैनीताल हाई कोर्ट को वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाने में ख़ामी नज़र आई है, क्योंकि बहुमत साबित करने का अवसर दिए बिना ऐसा करना सही नहीं था.

इमेज कॉपीरइट Shiv Joshi

उन्होंने बताया कि 31 मार्च को वोटिंग में 62 विधायक भाग लेंगे और 9 बाग़ी विधायकों को अलग से वोटिंग करने को कहा जाएगा, क्योंकि उनकी सदस्या रद्द होगी या नहीं इस पर अभी कोर्ट का कोई फ़ैसला नहीं आया है. वो स्पीकर की अनुमति के बगैर सदन में वोटिंग में भाग नहीं ले सकते.

बाग़ी विधायकों की सदस्यता रद्द करने का मामला अभी हाई कोर्ट में लंबित है और इस पर फ़ैसला आने के बाद ही उनके वोट को जोड़ा जाएगा.

उत्तराखंड में मची इस राजनीति उठा-पटक के लिए दोनों ही पक्ष ज़िम्मेदार हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री और बाग़ी विधायक विजय बहुगुणा इस बात से दुखी थे कि उन्हें एक साल पहले क्यों हटाया गया, इसलिए वो मौक़े की तलाश में थे.

विजय बहुगुणा ने बीजेपी के साथ मिलकर षडयंत्र रचा और बजट के दिन बग़ावत कर दी.

इमेज कॉपीरइट SHIV JOSHI

इस मामले में निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत और विधानसभा अध्यक्ष ने भी षडयंत्र रचा.

व्हिप के जिस उल्लंघन के आरोप में 9 विधायकों की सदस्यता समाप्त की गई, वो उल्लंघन असल में हुआ ही नहीं था, क्योंकि वहाँ बजट के दौरान कोई वोट डिविज़न या वोटिंग नहीं हुई थी.

जब सदन में वोट डिविज़न नहीं हुआ, तो व्हिप का उल्लंघन कैसे हो गया?

उत्तराखंड में सरकार किसी की भी बने, वह एक 'लेम डक' सरकार ही होगी और मुद्दा यही होगा कि 2017 जनवरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के प्रचार के लिहाज से कौन सी पार्टी लाभ ले पाती है.

(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल की वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण के साथ बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

http://topcat2.bbc.co.uk/cgi-bin/topcat2/index.pl#

संबंधित समाचार