कौन उतारेगा चाय बागान मज़दूरों का क़र्ज़

ऊपरी असम के बोकाखात में एक चुनावी सभा के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वो असम की चाय बेचा करते थे और इसलिए उसका 'क़र्ज़' उतारना चाहते हैं.

असम की 126 में से 30 विधान सभा सीटों का फ़ैसला भले ही चाय बागानों के मज़दूर तय करते हों, लेकिन साल दर साल वोट डालते रहने के बावजूद इन मज़दूरों की ज़िंदगी में कुछ भी नहीं बदला है.

बोकाखात के चाय बागान के मज़दूरों के लिए क़र्ज़ एक आम बात है - आठ घंटे की मेहनत के बाद उन्हें मिलती है सिर्फ़ 124 रुपए की दिहाड़ी यानी 868 रुपए प्रति सप्ताह.

बिमल रजवार की कई पुश्तों ने असम के चाय के बागानों में काम किया है. उनके पूर्वज एक शताब्दी पहले झारखंड से यहाँ आए और चाय बगानों में काम में लग गए.

बिमल कहते हैं, "हमारी तो ज़िंदगी ही क़र्ज़ पर चल रही है, ये तो हमें ही उतारना है. चाहे बीमारी हो या फिर शादी-ब्याह. बिना क़र्ज़ लिए हमारी ज़िंदगी नहीं चल पाएगी."

बिमल ख़ुशक़िस्मत हैं कि वो स्थायी मज़दूर हैं और उन्हें राशन और दवाएं कंपनी से मिल जाती हैं.

लेकिन कई सालों से 'टेम्पररी' के तौर पर काम कर रहे इनमें से बहुत सारे मज़दूरों की ज़िंदगी क़र्ज़ के सहारे ही चल रही है.

चाय बागान के मज़दूरों को असम की चाय का असली 'ब्रांड अम्बेसडर' कहा जा सकता है. इनकी रात दिन की मेहनत ने ही असम की चाय को दुनियाभर में लोकप्रियता दिलाई है.

मज़दूर बरसों से न्यूनतम दिहाड़ी 169 रुपए करने की मांग कर रहे हैं. मगर कंपनियों का कहना है कि वो वर्ष 2000 से ही घाटे में चल रही हैं और इसलिए मज़दूरों की मांग फ़ौरन पूरी नहीं की जा सकती है.

चाय बागान के मज़दूरों की सबसे मज़बूत यूनियन 'असम चाय मज़दूर संघ' कांग्रेस से जुड़ी है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ऊपरी असम से 14 सीटें मिली थीं.

विडंबना ये है कि 2014 तक केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार होते हुए भी न्यूनतम मज़दूरी और बुनियादी सुविधाओं का मामला ज्यों का त्यों अटका रहा.

हालांकि 2014 में लोकसभा में मिली हार के बाद कांग्रेस ने मज़दूरी बढ़ाने की पहल तो की, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा है.

तपन कर्मकार, मज़दूर संघ के अध्यक्ष हैं. वो कहते हैं कि न्यूनतम मज़दूरी की मांग केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल के अभाव में ही बरसों लंबित रही है.

वो कहते हैं, "यही वजह है कि न्यूनतम मज़दूरी को लेकर राज्य में कोई क़ानून नहीं बन सका."

कांग्रेस की इस चूक को भारतीय जनता पार्टी चुनावी अवसर के रूप में लपक लेना चाहती है.

जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री का बयान भी इन्हीं मज़दूरों का समर्थन हासिल करने के लिए ही था, क्योंकि असम की सत्ता का रास्ता इन्हीं चाय बागानों से होकर गुज़रता है.

तरुण गोगोई, सर्वानंद सोनोवाल सहित भाजपा, कांग्रेस और असम गण परिषद के लगभग सभी बड़े चेहरे इसी इलाक़े से क़िस्मत आज़मा रहे हैं.

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