भाजपा और कांग्रेस से मांगा जा रहा है हिसाब

असम में विधानसभा का चुनाव वैसा बिलकुल नहीं है जैसा उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनावों के दौरान देखने को मिलता है. लेकिन कुछ इलाकों में कहीं कहीं चुनावी गीत सुनाई पड़ जाते हैं.

यहाँ प्रचार अमूमन रैलियों और जनसम्पर्क के माध्यम से ही ज़्यादा हो रहा है, चाहे वो भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन हो या फिर कांग्रेस का.

शहरी इलाकों में तो थोड़ी चुनावी हलचल ज़रूर है. बड़े नेताओं का आना जाना. मगर ग्रामीण इलाकों में लगता ही नहीं कि चुनाव भी हो रहे हैं. लोग अपने दिनचर्या में मगन नज़र आते हैं.

असम और नगालैंड की सीमा पर स्थित मरियानी में मेरी मुलाक़ात सुचित्रा घोष से हुई जो बहुत अच्छी हिंदी जानती हैं.

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सुचित्रा कहती हैं कि कुछ सालों पहले तक चुनावों के दौरान काफी जोश नज़र आया करता था. मगर इस बार सबकुछ फीका-फीका सा है.

चाय के बागानों से लहलहाते हुए ऊपरी असम के इस इलाक़े में कांग्रेस का ख़ासा दबदबा रहा है.

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असम गण परिषद के राम कुमार कहते हैं कि कांग्रेस ने हमेशा दावा किया है कि उनके साथ आली और कुली हैं यानि सरहद पार से अवैध रूप से आकर बसे लोग और मज़दूर. उनको लगता है कि कांग्रेस का यह वोट बैंक भी अब तेज़ी से खिसक रहा है.

15 साल सरकार चलाना एक बड़ा लंबा अर्सा होता है और अब आम लोग कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से हिसाब भी मांग रहे हैं.

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हिसाब तो भाजपा के नेताओं से भी माँगा जा रहा है उन वायदों का जो उन्होंने लोकसभा के चुनावों के दौरान किए थे.

असम में चुनावी संघर्ष के तीन मुख्य केंद्र हैं. भाजपा का गठबंधन, कांग्रेस और एआईयूडीएफ. मगर इनके बीच में से लाल झंडे ने भी अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाने की कोशिश की है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी असम की 84 सीटों पर लड़ रही है.

जोरहट की सीट से पार्टी के उम्मीदवार एनसी गोगोई कहते हैं कि वो इस चुनावी मैदान में सिर्फ इसलिए मौजूद हैं ताकि मज़दूरों और समाज के कमज़ोर तबके को उनके अधिकारों के बारे में अहसास दिलाया जा सके.

बहरहाल ऊपरी असम से चुनाव लड़ने वालों में राज्य की राजनीति के कम ओ बेश सभी बड़े चहरे हैं.

अब तो यह चार अप्रैल को ही पता चलेगा कि जनता जनार्दन के तराज़ू पर किसका पलड़ा भारी पड़ता है.

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