सिर्फ़ नीरजा नहीं थी 'अग़वा विमान की हीरो'

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पैन एम 73 के अग़वा होने के 30 साल बाद पहली बार विमान के चालक दल के छह लोगों ने मीडिया से बात की है.

फ़्लाइट अटेंडेंट नुपूर एबरोल ने बीबीसी न्यूज़ को बताया, "मुझे पहले तो लगा कि विंग एक्जि़ट खोल कर कुछ यात्रियों के साथ हवाई जहाज़ से बाहर कूद जाऊं लेकिन तभी मुझे अहसास हुआ कि ये बाक़ी बचे हुए यात्रियों को ख़तरे में डाल देगा."

सुरक्षा बलों ने न्यूयार्क जा रहे विमान को 16 घंटों तक बाहर से नाकेबंदी में रखा. लेकिन फिर भी हादसा पेश आया जिसमें 22 लोगों की मौत हो गई और 150 लोग घायल हुए.

इस घटना ने दुनिया को स्तब्ध कर दिया था, हाल में इस पर एक फ़िल्म नीरजा भी रिलीज़ हुई; लेकिन चालक दल के सदस्यों ने इस पर अब तक चुप्पी साध रखी थी.

हालांकि वो चाहती हैं कि अब दुनिया को इसके बारे में पता चले.

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नुपूर का कहना है, "हाईजैक अब भी मेरे और मेरे सहकर्मियों के लिए ख़त्म नहीं हुआ है. हमारे दल के कुछ सदस्य, क्रू मेंबर और यात्री अब भी अतीत के इस दु:स्वप्न से बाहर निकलने और घटना की गुत्थियों को समझने के लिए संघर्ष कर रहे हैं."

पैन एम 73 मुंबई से कराची और फ्रैंकफ़र्ट होते हुए न्यूयॉर्क जा रही थी. लेकिन फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने 5 सितंबर 1986 को इसे कराची में अग़वा कर लिया.

अग़वा वाले दिन मुंबई से उड़ान भरने के बाद विमान क़रीब छह बजे के आसपास कराची एयरपोर्ट पहुंच गया था. तभी चार बंदूक़धारी एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था तोड़ते, गोली दाग़ते विमान में घुस गए.

तभी नुपूर ने देखा कि एक गोली उसके एक सहकर्मी के पैर के पास आकर लगी. उन्होंने उससे चिल्लाते हुए कहा कि वो गेट बंद कर दें.

फ़्लाइट अटेंडेंट शिरीन पवन जिन्हें चरमपंथी नहीं देख पाए थे, गोली की आवाज़ सुनकर इंटरकॉम तक गई और कॉकपिट में इमरजेंसी नंबर डायल कर दिया.

उनके दूसरी कोशिश पर पायलट ने फ़ोन उठाया और शिरीन ने हाईजैक कोड बोल दिया.

एक दूसरी फ़्लाइट अटेंडेंट सनशाइन वेसुवाला ने तभी देखा कि उनकी सहकर्मी नीरजा भनोट को अपहरणकर्ताओं ने पकड़ लिया है और उनके सिर पर बंदूक़ तान दी है.

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तभी एके 47 और ग्रेनेड से लैस चरमपंथी ने सनशाइन को कहा कि वो उसे कैप्टन के पास ले जाएं. कॉकपिट पूरी तरह से खाली था.

सनशाइन बताती हैं, "मैंने देखा कि बच के बाहर निकलने के उपकरण कॉकपिट में खुले पड़े हैं. कॉकपिट की छत में बाहर निकलने का रास्ता खुला पड़ा था. लेकिन मैं इस तरह से पेश आ रही थी कि मैं इन बातों को नोटिस नहीं कर रही हूं. ऐसा लगता है कि अपहरणकर्ताओं को जहाज़ के बारे में बहुत कुछ पता नहीं था इसलिए वे इसपर ग़ौर नहीं कर पाए."

कई लोगों ने बाद में पायलटों के इस तरह से भागने और यात्रियों को उनके हाल पर छोड़ देने की आलोचना की, लेकिन उनके दूसरे सहकर्मी दिलीप बीड़ी चंदानी इस बात को लेकर पूरी तरह से सहमत है कि पायलटों के निकल जाने से कई लोगों की जान बच पाई.

वो कहते है, "पायलटों के विमान छोड़कर जाने का मतलब था कि हम चरमपंथियों रहमो-करम पर निर्भर नहीं थे. हो सकता था कि पायलट होते तो चरमपंथी उन्हें विमान उड़ाकर किसी इमारत में टक्कर मारने को कहते या हवा में ही जहाज़ को उड़ा देते."

चरमपंथियों की योजना पायलट को मजबूर करके साइप्रस और इसराइल के ऊपर से जहाज़ को उड़ा ले जाने की थी.

साइप्रस और इसराइल में उनके संगठन के दूसरे साथियों को क़ैद करके रखा गया था.

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पैन अमरीकन सर्विस, कराची के डायरेक्टर विराफ डोरोगा ने चरमपंथियों से मेगाफ़ोन पर समझौते की बात शुरू की.

उन्होंने उन चारों बंदूकधारियों के सामने यह कहा कि वे जहां चाहते है पायलट उन्हें ले जाएंगे. इसके लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी पायलट भेजने पर विचार कर रही है.

इसी बीच जहाज़ के अंदर 29 साल के अमरीकी नागरिक राजेश कुमार को चरमपंथियों ने उनकी सीट से खींचकर बाहर निकाला और दरवाजे के पास ले जाकर घुटने के बल बैठाते हुए उनपर बंदूक तान दी.

घंटे भर के अंदर जब कोई पायलट नहीं आया तो उन्होंने राजेश कुमार को गोली मार दी और जहाज़ के बाहर फेंक दिया.

सनशाइन ने बताया, "इसने जहाज़ के अंदर के माहौल को पूरी तरह से बदल दिया. उनकी इस हरकत ने यह जता दिया कि वे निर्दयी हत्यारे हैं."

अग़वा करने के चार घंटे के बाद चरमपंथियों ने जहाज़ में अमरीकियों नागरिकों की तलाश शुरू की. उनका संगठन अबू निदाल ऑर्गेनाइजेशन अमरीका और इसराइल की नीतियों का मध्य पूर्व में विरोध करता था.

सनशाइन, माधवी बहुगुणा और दूसरे फ़्लाइट अटेंडेंट ने सबसे पासपोर्ट लेकर इकट्ठा करना शुरू कर दिया. उन लोगों ने चुपचाप से यह रणनीति अपनाई कि अमरीकी नागरिकों के पासपोर्ट इकट्ठा नहीं करने हैं.

क्रूं मेंबरों में शिरीन और सनशाइन ने सबसे ज्यादा वक्त प्रमुख अपहरणकर्ता ज़ैद हसन अब्द लतीफ़ साफ़ारीनी के साथ बिताए.

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वो जहाज़ के बाहर का जायज़ा लेने के लिए शिरीन और सनशाइन को बंदूक़ की नोक पर ढाल बनाकर इस्तेमाल करता था.

शिरीन बताती हैं, "ऐसे मौक़े पर वो मेरा बाल पकड़कर मेरे चेहरे को खिड़की पर लगाकर पूछता था कि बाहर मैं क्या देख पा रही हूं. वो कहता था कि वो अमरीकी लड़ाकू विमानों की राह देख रहा है."

जहाज़ पर मैकेनिक के तौर पर काम करने वाले 28 साल के मेहेरजी खारस को उन लोगों ने रेडियो पर समझौताकारों से संपर्क करने के लिए मजबूर किया.

उन्हें अब भी लग रहा था कि उन्हें जहाज उड़ाने के लिए कोई पायलट मिल जाएगा.

सनशाइन बताती हैं कि कई बार साफारीनी ने उनके साथ फ्लर्टिंग की और उन्हें अपने साथ साइप्रस चलने का प्रस्ताव रखा.

आख़िरकार चरमपंथियों ने लंबे इंतज़ार के बाद घोषणा की कि अगर पायलट नहीं आए तो हर पंद्रह मिनट में वो एक यात्री को गोली मार देंगे.

मेहेरजी ने साफारीनी को बताया कि जहाज की इमरजेंसी लाइट 15 मिनट में चली जाएगी. जब लाइट गई, तो चरमपंथियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी.

सनशाइन बताती हैं, "वो अपना धैर्य खो चुके थे. उन्होंने भीड़ पर गोलियां चलानी शुरू कर दी."

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शिरीन ने देखा कि मेहेरजी मारे जा चुके थे.

तभी भगदड़ में नुपूर और माधवी जहाज के विंग से बाहर की ओर कूद गईं. 20 फीट की ऊंचाई से कूदने के कारण उनकी हड्डियां टूट गईं.

सनशाइन और दिलीप भी विंग में मौजूद थे लेकिन अंधेरे की वजह से वे कूदने की जगह का अंदाजा नहीं लगा पाए.

इमरजेंसी स्लाइड के माध्यम से क्रू मेंबरों ने फिर सभी यात्रियों को निकालना शुरू किया.

जब सभी यात्री विंग से बाहर आ गए तब क्रू मेंबरों ने एक बहुत ही उल्लेखनीय काम किया. वे वापस जहाज़ में आए. उस वक्त गोलियों की आवाज़ रूक गई थी और वे नहीं जानते थे कि चरमपंथी कहां हैं.

तभी सनशाइन ने जहाज में नीरजा को देखा. नीरजा को कूल्हे पर गोली लगी हुई थी और बहुत खून निकल रहा था लेकिन वो होश में थीं.

सनशाइन ने तब दिलीप को मदद के लिए बुलाया और वे दोनों नीरजा को इमरजेंसी स्लाइड तक ले आए.

उन्होंने पहले उन्हें नीचे धकेला फिर वे पीछे से कूदे. शिरीन और उनके साथ उनकी दूसरी सहयोगी रानी वासवानी आख़िरी दो बंधक थीं जो जहाज़ से निकलीं.

तीनों अपहरणकर्ता जब भाग रहे थे तब एयरपोर्ट के सुरक्षा बलों ने उन्हें पकड़ लिया.

जब पाकिस्तान के सुरक्षा बल विमान में घुसे तो साफारीनी तब तक जहाज़ में ही मौजूद था.

नीरजा के सहकर्मियों का कहना है कि जब नीरजा कराची के जिन्ना अस्पताल में पहुंची थीं तब तक जीवित थीं.

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सनशाइन का कहना है, "नीरजा अब भी जीवित होती अगर उनका दूर ले जाकर सही से इलाज कराया गया होता तो."

दिलीप कहते हैं, "मैंने वहां एयरपोर्ट पर मामूली मेडिकल सुविधा ही देखी. एयरपोर्ट से अस्पताल कई किलोमीटर दूर था. नीरजा को एंबुलेंस में बिना स्ट्रेचर के डाला गया. "

शिरीन कहती हैं कि जब नीरजा अस्पताल पहुंचीं तो वहां अफरातफरी का माहौल था. नीरजा की ज़िंदगी बचाई जा सकती थी अगर अस्पताल में स्थिति बेहतर होती तो.

कुछ दिनों के बाद फ़्लाइट 73 के सभी क्रू मेंबर कुछ सालों के लिए फिर से काम पर लौट आए. वे कभी-कभी उसी फ्लाइट पर साथ काम करते थे लेकिन कभी भी वे हाईजैक का ज़िक्र नहीं करते थे.

बीबीसी के साथ इंटरव्यू में उन लोगों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उस दिन कोई अकेला हीरो नहीं था. जिन क्रू मेंबरों का इंटरव्यू नहीं लिया गया उन लोगों ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई थी.

वे लोगों को बताना चाहते हैं कि वे अपने सहकर्मी नीरजा भनोट और मेहेरजी खारस को बहुत याद करते हैं.

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