असम में 'अली-क़ुली-बंगाली' पर सबकी नज़र

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एक समय था जब ‘अली-क़ुली-बंगाली’ असम में सबसे पिछड़े माने जाते थे, लेकिन अब यही जमात तय करती है कि राज्य में किसकी बनेगी सरकार.

‘अली-क़ुली-बंगाली’ को राज्य की प्राकृतिक संपदाओं का फ़ायदा उठाने के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान असम लाया गया था.

इनमें अली बंगाली मुसालमानों को कहा गया है जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने धान और सब्ज़ी की खेती के लिए नदी किनारे बसाया था. वहीं आदिवासियों को क़ुली कहा गया, इन्हें पूर्वी और मध्य भारत क्षेत्र से यहां लाकर चाय बागानों में काम में लगाया गया.

अब तो लोग इन्हें चाय जनजाति या आदिवासी के नाम से ही पुकारने लगे हैं.

जबकि बंगाली हिंदुओं यानी ‘बंगाली’ को ब्रिटिश मुख्य रूप से दफ्तर मे काम करने और ख़ुदरा व्यापार के क्षेत्र में लगाने के लिए यहां लेकर आए थे.

ये संख्या के हिसाब से इस क़दर मज़बूत समुदाय हैं कि 'अली-क़ुली-बंगाली' समुदाय के वोट बैंक पर सभी पार्टी की नज़र है.

एक समय इन तीनों पर कांग्रेस अकेला हक़ जताती थी.

यहां तक कि छात्र आंदोलन के समय जिसके बाद राज्य में प्रफुल्ल कुमार महंत की पार्टी असम गण परिषद भारी मतों से विधानसभा चुनावों में जीती थी, कांग्रेस ने इन समुदायों के बल पर 25 सीटें हासिल की थीं.

इंदिरा गांधी के वफ़ादार रहे देवकांत बरुआ (जो आपातकाल या 1975 से 77 के दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे) ने 'अली-क़ुली-बंगाली' के इस नारे को असम में लोकप्रिय बनाया था.

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ये नारा आज की राजनीति में सटीक बैठ रहा है.

असम की 126 विधानसभा सीटों में से 90 सीटों का परिणाम इन तीनों समुदायों पर निर्भर होता है. राज्य की 40 से अधिक सीटों पर बंगाली मुसलमानों का बोलबाला है. जबकि 30 सीटों का निर्णय चाय आदिवासी और 10 का हिंदू बंगाली करते है.

साल 2005 में इत्र के कारोबार से राजनीति में उतरे मौलाना बदरूद्दीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एआईयूडीएफ़ ने प्रवासी मुस्लिम वोट को अपने पक्ष में कर लिया जो कांग्रेस का एक बड़ा आधार था.

वहीं आदिवासियों और बंगाली हिंदुओं के बीच भाजपा ने अपनी पैठ बना ली. हाल ही में राज्य के दौरे पर आए कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इन्हें एकबार फिर अपनी तरफ खींचने की कोशिश की है. उन्होंने समुदायों के पैठ वाले क्षेत्रों में जनसभाओं का आयोजन किया.

राहुल ने पहली रैली निचले असम के मुस्लिम बहुल बरपेटा जिले में की. दूसरी रैली ऊपरी असम के चाय जनजाति बहुल शिवसागर जिले में और उसके बाद हिंदू बंगाली बहुल सिलचर में.

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इतिहासकार और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मोनिरुल हुसैन ने कहा, “जिन मुसलमानों को बंटवारे से पहले यहां लाया गया था उन्हें परेशानियों के सिवाय कुछ नहीं मिला. बंटवारे के समय काफी मुसलमानों को शरणार्थी बनकर पूर्वी पाकिस्तान जाना पड़ा. फिर जवाहर लाल नेहरू और लियाक़त अली के बीच हुए समझौते के बाद वे लोग वापस आ गए. क्योंकि ये लोग भाषायी अल्पसंखयक के तौर पर बांग्ला बोलते थे, इसलिए असमिया समाज में इन्हें समायोजित होने नहीं दिया गया.”

इन लोगों की नागरिकता का मुद्दा असम गण परिषद ने 1985 में उठाया, फिर उनकी सरकार बनी. लेकिन उनके दस साल सत्ता में रहने के बाद भी इसका कोई हल नहीं निकल पाया.

हालांकि राज्य में लाखों की तादाद में विदेशियों के मौजूद होने की बात करने वाली असम गण परिषद को एक भी विदेशी नहीं मिला.

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फिर कांग्रेस सत्ता में आई लेकिन वह भी इस समस्या का समाधान नहीं कर पाई. बंगाली मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने एआईयूडीएफ़ पर अपना भरोसा जताया लेकिन वह भी इन लोगों की समस्या को लेकर केवल राजनीति ही कर रही है.

लगातार चौथी बार सत्ता में आने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते दिख रहे 81 साल के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अपने मुस्लिम विधायकों को सामने रख कर यह दावा करते हैं कि कांग्रेस ने वास्तव में उन्हें कभी नहीं खोया. लेकिन मौलाना अजमल का कहना है कि कांग्रेस के राजनीतिक खेल को समझ चुके यहां के मुसलमान अब एआईयूडीएफ़ के पक्ष में हैं.

भाजपा का अल्पसंख्यक सेल मुस्लिम क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाने की योजना पर लगातार विचार करता रहा है, लेकिन पार्टी को आदिवासी और बंगाली हिंदु बहुल संसदीय क्षेत्र में अधिक भरोसा है.

पिछले लोकसभा चुनाव में चाय जनजाति बहुल इलाकों की 7 में से 5 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी और दो सीटें हिंदू बंगाली मतदाताओं के कारण पार्टी की झोली में आ गई. भाजपा एक बार फिर इसी गणित के सहारे असम विधानसभा का चुनाव जीतना चाहती है.

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इन दो समुदाय के महत्व को समझ रही भाजपा ने प्रदेश की पांच अन्य जनजातियों के साथ चाय जनजाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया है. वहीं जो धार्मिक उत्पीड़न के तहत बांग्लादेश से भागकर यहां आए है, भाजपा ने ऐसे बंगाली हिंदुओं को शरणार्थी का दर्जा देने की घोषणा की है.

असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर इस बार का विधानसभा चुनाव लड़ रही भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल कहते हैं कि उनकी पार्टी इन मुद्दों को लेकर गंभीर हैं और इस बात का ध्यान भी रख रही है कि जन जातियों को जो लाभ मिल रहा है उसका नुक़सान स्थानीय समुदायों को न उठाना पड़े.

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