समय के साथ पहचान खो रहा है 'कुटियट्टम'

दिल्ली में इन दिनों एक नाट्य मंडली अपनी कला से सांस्कृतिक धरोहर बचाने के अभियान पर निकल पड़ी है. और उनका माध्यम बनी है केरल की 2000 साल पुरानी बेहद अनोखी कला, कुटियट्टम.

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Image caption केरल का संस्कृत थिएटर

यूनेस्को ने दो हज़ार साल पुरानी केरल की कला 'कुटियट्टम' को सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए क़दम उठाने को कहा है.

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Image caption तेरहवीं शताब्दी में इस कला की शुरआत हुयी.

ये नाट्य मंडली है जी इंदु की. इसके कलाकार अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ संस्कृत बोलते और नृत्य करते हुए रामलीला का मंचन करते हैं.

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Image caption यदुकृष्णा काम और शौक़ दोनों एक साथ लेकर चलना चाहते हैं

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केरल का कुटियट्टम कालिदास के नाटक शकुंतला से लेकर रामलीला तक के समय के अनुसार कहानी कहने की एक कला है. केरल के कुटियट्टम में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान राम की कथा हो या कोई और कहानी, सबका संस्कृत में मंचन होता है.

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Image caption जी इंदु अपने पति और बेटे के साथ .

दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर केशवानी ने बताया, “कुटियट्टम विश्व की सबसे पुरानी और जीवित थियेटर परंपराओं में से एक है. ये कला आज भी उन्हीं परंपराओं का पूरी तरह से पालन करती है.”

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Image caption मार्गी मधु चटयार रावण के रूप में .

जी इंदु नाटकों की महिला पात्र की भूमिका भी निभाती हैं. वे कहती हैं, “इस परंपरा को आज बचाने की ज़रूरत है क्योंकि अब मनोरंजन के कई साधन हैं.” इंदु के पति और तेरह साल का बेटा श्री हरी भी उनके साथ स्टेज पर अभिनय करते हैं. कलाकारों का मानना है कि ये एक मुश्किल आर्ट है और इसमें बहुत मेहनत लगती है.

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Image caption तेरह साल श्री हरी बचपन से कुटियट्टम सिख रहे हैं .

कुटियट्टम कलाकार मार्गी मधु चटयार बताते हैं कि इस कला में महारत हासिल करने में कम से कम दस साल लगते हैं जबकि इतने पैसे नहीं मिलते.

मार्गी का कहना है कि यही नहीं इस कला की प्रस्तुति करने वाले और प्रस्तुति देखने वाले दोनों में ही संयम का होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि इसकी प्रस्तुति में कई बार तीन से चार घंटे लगते हैं.

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Image caption जी इंदु

कुटियट्टम के कलाकारों को मेकअप करने में तीन घंटे से भी अधिक समय लगता है. मेकअप में सारी हर्बल चीज़ों का ही इस्तेमाल होता है. ये कोई नॉर्मल मेकअप नहीं होता, कपड़े हल्की लकड़ी के बने होते हैं जिनको सजाया जाता है. मार्गी मधु चटयार केरल के अपने घर की चारदीवारी में ही इसका मंचन करते हैं.

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Image caption कुटियट्टम कलाकार मार्गी मधु चटयार.

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प्रोफेसर केशवानी के अनुसार केरल के बाहर बहुत कम लोग इस कला के बारे में जानते हैं. तेरहवीं शताब्दी में इस कला की शुरुआत हुई. मौजूदा दौर में इस कला का बुरा हाल है.

केशवानी ने बताया कि कुटियट्टम के पुरुष कलाकारों की संख्या फिलहाल केवल 50 के लगभग और महिला कलाकार 10 हैं. कुटियट्टम की प्रस्तुति देखने आईं सुनीता अय्यर बताती हैं कि कुटियट्टम देखना मेरे लिए बहुत ख़ास तजुर्बा होता है. वे मानती हैं कि आज के युवा के पास मनोरंजन के कई दूसरे साधन हैं, इसलिए इन कलाओं की ओर उनका ध्यान लाना जरूरी है.

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