पीलीभीत में क्या हुआ था उस रात?

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सीबीआई की विशेष अदालत ने पीलीभीत फ़र्जी मामले में क़रीब 25 साल बाद 47 पुलिसकर्मियों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.

इस मामले में कुल 57 लोगों पर आरोप लगे थे. लेकिन सुनवाई के दौरान 10 लोगों की मौत हो गई.

क्या था मामला?

जुलाई 1991 में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत ज़िले के तीन अलग-अलग थानों में एक ही रात में तीन एनकाउंटर हुए थे जिसमें 10 सिख मारे गए थे.

पुलिस की इस कार्रवाई की उस समय काफी प्रशंसा हुई लेकिन बाद में पता चला कि ये मुठभेड़ फ़र्जी थे और मारे गए सिख एक बस से तीर्थ यात्रा करके लौटे थे.

12 जुलाई 1991 को हुई इस घटना में पटना साहिब और कुछ अन्य धार्मिक स्थलों से तीर्थ यात्रियों का एक जत्था बस से लौट रहा था. इस बस में 25 यात्री सवार थे.

कछालाघाट पुल के पास पुलिस ने इनमें से 10 यात्रियों को बस से जबरन उतार लिया और एक दिन बाद उन सभी की लाशें तीन अलग-अलग जगहों से मिलीं.

पुलिस की कार्रवाई और उस पर उठे सवाल?

पुलिस ने अपनी एफ़आईआर में इन सभी को चरमपंथी बताते हुए पुलिस पर हमला करने का आरोप लगाया लेकिन बाद में मारे गए लोगों के परिवारजनों ने आरोप लगाया कि मुठभेड़ फ़र्जी था.

इस मामले को सबके सामने लाने वाले पीलीभीत निवासी हरजिंदर बताते हैं कि मरने वालों में कुछ लोग उनके क़रीबी जानने वालों में से थे, इसलिए उन्हें इस एनकाउंटर पर संदेह हुआ और वो इसे लेकर पुलिस के पास गए.

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बकौल हरजिंदर पुलिस ने जब उनकी कोई मदद नहीं की और पुलिस की मंशा भी उन्हें ठीक नहीं लगी तो वो भागकर दिल्ली आए और यहां सिख समुदाय के कुछ नामी-गिरामी लोगों की मदद से मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए.

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सौंपा मामला

15 मई 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए मुठभेड़ की सीबीआई जांच के आदेश दिए. सीबीआई ने इस मामले में 57 पुलिस कर्मियों को अभियुक्त बनाया था जिनमें से दस की मुकदमे की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो गई.

मुकदमे की सीबीआई कोर्ट में लंबी सुनवाई चली और आख़िरकार एक अप्रैल को सीबीआई कोर्ट के विशेष जज लल्लू सिंह ने सभी 47 पुलिसकर्मियों को इस मामले में दोषी क़रार दिया और दो दिन बाद सभी को उम्र क़ैद और जुर्माने की सज़ा सुनाई गई.

कोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिसकर्मियों पर बेहद तल्ख़ टिप्पणी की और कहा कि प्रमोशन और पुरस्कार के लालच में इस घटना को अंजाम दिया गया है.

अदालत ने ये भी सवाल उठाया कि यदि ये युवक चरमपंथी थे तो उनके पास से कोई हथियार क्यों नहीं बरामद हुए और तीन अलग-अलग थाना क्षेत्रों में मुठभेड़ कैसे हुआ?

आगे क्या?

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सीबीआई कोर्ट ने हालांकि 47 पुलिसकर्मियों को उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी है, जिससे पीड़ित परिवारों को संतोष ज़रूर मिला है. लेकिन जानकारों का कहना है कि अभी ये मामला ऊपरी अदालतों में भी जाएगा और अंतिम फ़ैसले तक कितना इंतज़ार करना होगा पता नहीं.

इसके अलावा पीलीभीत के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक आरडी त्रिपाठी को मामले में कोई सज़ा न देने पर भी सवाल उठ रहे हैं. ख़ुद हरजिंदर सिंह ने भी बीबीसी से बातचीत में न सिर्फ़ इस मामले में आरडी त्रिपाठी की भूमिका पर सवाल उठाए हैं बल्कि कई और आरोप भी लगाए हैं.

अभी हैं कई और अनसुलझे मामले

ये घटना उस समय हुई थी जब पंजाब के साथ साथ उत्तर प्रदेश के तराई इलाक़े में भी सिख चरमपंथ पूरे ज़ोर पर था.

जानकारों का कहना है कि उस समय चरमपंथ की आड़ में ऐसी कई घटनाएं हुईं जिनमें कई निर्दोष सिखों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

पीलीभीत निवासी और किसान नेता वीएम सिंह भी मामले की पैरवी से जुड़े रहे. उनके मुताबिक़ 1994 में पीलीभीत जेल के भीतर ही कुछ सिख युवकों की भी हत्या कर दी गई थी.

इस मामले में कई पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ छोटी-मोटी कार्रवाई हुई थी लेकिन बाद में ये मामला भी दबा दिया गया.

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