कन्हैया, उमर और अनिर्बान पर अभिमान: साईबाबा

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माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप में गिरफ़्तार दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को नागपुर सेंट्रल जेल से ज़मानत पर रिहा कर दिया गया है.

रिहाई के बाद उन्होंने पत्रकारों के साथ विभिन्न मुद्दों पर बात की.

अपने स्वास्थ्य के बारे में.

इस बार नागपुर बेंच ने जब मुझे जेल लौटने कहा तब मुझे लगा नहीं था कि मुझे 110 दिन बिताने पड़ेंगे. लेकिन 3 महीने और 15 दिनों के बाद मेरी तबियत पर बुरा असर पड़ा है. मेरी हेल्थ बुरी हालत में है. मुझे दिल्ली के अस्पताल से उठाकर यहां लाया गया था. आज मेरी प्राथमिकता अपनी मेन्टल ट्रीटमेंट लेना है.

पहले 14 महीनों की कैद से मेरी सेहत पर काफी बुरा असर पड़ा था. 9 मई 2014 के दिन गिरफ़्तारी से पहले मैं सामान्य था. कम से कम 10 लोगों का काम करता था, मिशनरी की तरह काम करता था लोगों के लिए. लेकिन आज शायद मैं अपने परिवार की भी मदद ना कर पाऊं.

आगे की जिंदगी के बारे में.

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Image caption प्रोफेसर साईबाबा पर माओवादियों से संपर्क रखने के आरोप हैं

स्वाभाविक है कि मैं टीचिंग प्रोफेशन में लौटना चाहूंगा. लेकिन, पहले मैं 10 लोगों का काम करता था आज अपने ही परिवार की मदद करने की स्थिति में नहीं हूँ.

जेएनयू छात्रों के बारे में.

डीयू और जेएनयू के सभी छात्र मेरे छात्रों की तरह हैं. कुछ को मैंने पढ़ाया है. कुछ को हो सकता है नहीं पढ़ाया हो. लेकिन जिन जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया और जिन लोगों को परेशान किया गया वो मेरे छात्र की तरह हैं.

कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और बाकी सारे मेरे को-एक्टिविस्ट हैं. मुझे अपने टीचर की तरह मानते हैं और मैं उन्हें अपने शिष्यों की तरह मानता हूँ . मुझे उन पर अभिमान है. देश के विषय में उन्होंने कुछ सही सवाल प्रस्तुत किए हैं. वो ऐसे लोग हैं जो इस देश के लोगों पर प्रेम करते हैं.

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जेएनयू के कुछ छात्रों पर देश विरोधी गतिविधियों के आरोपों के बारे में.

मुझ पर भी देश विरोधी होने के आरोप लगे. सर्वोच्च न्यायालय में भी महाराष्ट्र सरकार ने आक्षेप लिया था कि रिलीज होने के बाद मैं देश विरोधी कामों में जुट जाऊंगा. ये मेरी ज़मानत का विरोध करने के लिए कहा गया था. मेरी मातृभाषा तेलुगू है और उसमें महान कवि गुर्जद अप्पाराव ने एक काफी महत्वपूर्ण कविता लिखी है जिसे सारे देश के लिए जानना जरूरी है. उसमे वो लिखते हैं कि, एक देश कोई माटी नहीं होता. एक देश का मतलब उसके लोग होते हैं. अपने देश पर प्यार करो.

हम अपने देश के लिए काम कर रहे हैं. और देश का मतलब यहां के लोग हैं. अगर हम देश के लोगों से प्यार करते हैं तो राष्ट्रप्रेम और क्या है? आप लोगों की सेवा करो. आज़ादी से पहले ही इंटेलेक्चुअल लोग जुड़े नहीं रहे, जनता से. लेकिन आज के युवा अलग हैं. कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान और रोहित वेमुला - ये अपने लिए काम नहीं कर रहे थे. वो देश के लिए काम कर रहे थे.

क्या उन्होंने आप के साथ काम किया?

दिल्ली के तमाम वर्कर्स ने मेरे साथ काम किया. सभी ने किया . जब कन्हैया कुमार की पहली बार गिरफ़्तारी हुई थी तो वो डिफेंस कमिटी के एक्टिविस्ट थे. वो रैलियों मे होते थे.

केंद्र की मौजूदा सरकार के बारे में.

मैं किसी सरकार के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. अगर देश का मतलब उसके लोग हैं, अगर देश के लोग भूख, सूखा और परेशानी से जूझ रहे हैं, तो हम राष्ट्रवाद पर क्या बात करें?

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समस्याएं तो पहले से ही हैं, फिर आज बीजेपी सत्ता में आते ही ये आंदोलन किस लिए?

जब कांग्रेस सत्ता में थी, यूपीए सरकार ने मुझे गिरफ़्तार कराया था. उन्होंने ऑपरेशन ग्रीन हंट की शुरुआत की जिसका विरोध हुआ. एक्टिविस्ट के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि जनता के लिए आवाज उठाएं.

अपने मुक़दमे के बारे में.

मेरा केस अभी आखिरी मुकाम पर है. उस पर मैं कुछ नहीं कहूंगा. मेरे वकील उसे देखेंगे. जो लोग क़ानून जानते हैं, वो इस मुकाम पर मुक़दमे के विषय में कुछ नहीं कहना चाहेंगे. मैं आशावान हूँ कि अपने ऊपर लगे आरोप ग़लत साबित करने में सफल रहूंगा.

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