ग़ालिब को समझना है, फ़ेसबुक पर बाबर से मिलें

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मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के सबसे बड़े और मशहूर शायरों में से एक माने जाते हैं. अब उनकी शायरी को सोशल मीडिया के ज़रिए आम आदमी तक पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं पटना के सैयद बाबर इमाम.

शहर के सब्ज़ीबाग इलाक़े में रहने वाले करीब 40 वर्षीय बाबर कहते हैं, ‘‘मैं चाहता हूं कि आम आदमी भी ग़ालिब को पसंद करे, उन्हें समझ सके.’’

पेशे से सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल बाबर 2007 में फ़ेसबुक पर मिर्ज़ा ग़ालिब पर बने एक ग्रुप से जुड़े. ग़ालिब की शायरी पसंद करने के बावजूद इस ग्रुप से जुड़ने के बाद ही उन्होंने ग़ालिब की शायरी को समझना और उस पर लिखना शुरू किया.

ग्रुप में बाबर की सक्रियता और उनके जुनून को देखते हुए एडमिनिस्ट्रेटर फ़ायज़ अब्दुल अज़ीज़ (जो पाकिस्तान से हैं) ने बाबर को भी 2011 में ग्रुप का एडमिनिस्ट्रेटर बना दिया.

फिलहाल ग्रुप के तीन एडमिनिस्ट्रेटर हैं, लेकिन बाबर के मुताबिक़ लगभग सारा दारोमदार उनके कंधों पर ही है. ग़ालिब के आठ हज़ार से अधिक चाहने वाले वाले अभी इस क्लोज़्ड ग्रुप के मेंबर हैं.

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एडमिनिस्ट्रेटर बनने के बाद बाबर ने फ़ेसबुक पर मिर्ज़ा ग़ालिब नाम से ही एक पेज भी बनाया. आज करीब साढ़े तीन लाख लोग इसे फॉलो करते हैं.

ग्रुप में ग़ालिब पर चर्चा का तरीक़ा आम तौर पर ये होता है कि बाबर आसान लफ़्जों में तशरीह (व्याख्या) करते हुए ग़ालिब का एक शेर पोस्ट करते हैं. इसके बाद वे ग्रुप के सदस्यों से उस शेर की और भी गिरहें खोलने को कहते हैं.

इसके अलावा कई सदस्य खुद भी ग़ालिब के किसी शेर के बारे में पूछते हैं. ऐसे में अगर बाबर उस शेर की मुक़म्मल समझ रखते हैं तो उस पर टिप्पणी करते हैं वरना उस पर ग्रुप को चर्चा करने को कहते हैं.

इस कोशिश से ग़ालिब में दिलचस्पी रखने वालों को मदद मिल रही है. ग्रुप के सदस्य और पटना के रहने वाले मार्केटिंग प्रोफेशनल असग़र हुसैन बताते हैं, ‘‘ग्रुप से जुड़ने से पहले हम सिर्फ ग़ालिब की आसान शायरी समझते थे. लेकिन अब ग़ालिब की क्लासिक शायरी भी हम समझते हैं.’’

इस सब के बाद भी अगर कोई ग़ालिब को और ज्यादा समझने की ललक रखता है तो वह बाबर को इंटरनेट और फोन के ज़रिए संपर्क करते हैं.

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बाबर के मुताबिक़ ऐसे करीब दर्जन भर सवाल उनके पास हर रोज़ आ ही जाते हैं. वे लगभग रोज़ चार-पांच घंटे निकालकर ग़ालिब को समझने-समझाने का काम करते हैं.

ग्रुप में ज़्यादा तादाद बीस से तीस साल के उम्र वालों की है जिनमें करीब 80 फ़ीसदी लोग हिंदुस्तान और पाकिस्तान से हैं. बाकी बचे ग़ालिब के दीवाने ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, अमरीका, बांग्लादेश, मध्य पूर्व जैसे देशों में हैं.

बाबर नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे थे. वहां पहुंचते ही उर्दू प्रेमी उनके पिता सैयद अशरफ़ इमाम ने उनसे साफ़ कह दिया था कि उर्दू में ख़त लिखने पर ही जवाब मिलेगा.

बाबर बताते हैं, ‘‘बाहर पढ़ने के कारण पैसों की ज़रूरत पड़ती थी इसलिए टूटी-फूटी उर्दू में मैं घर खत लिखने लगा. और जवाबी डाक में मेरा ख़त करेक्शन के साथ वापस भी आता था.’’

इस तरह ख़त लिखते हुए और फिर जासूसी दुनिया जैसे उर्दू की लोकप्रिय किताबों को पढ़कर बाबर ने अपनी उर्दू को दुरुस्त किया.

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साथ ही बाद में ग़ालिब को समझने के लिए उन्होंने 2010 में पटना के बशरुद्दीन ख़ान से फ़ारसी सीखी. ऐसा इसलिए क्योंकि मिर्ज़ा ग़ालिब के उर्दू में जहां करीब चार हज़ार शेर हैं वहीं फ़ारसी में दस हज़ार से ज्यादा.

ग़ालिब की शायरी की फ़िलॉसफी (दर्शन) समझाने के लिए 2015 में बाबर ने ग्रुप में एक सिरीज़ शुरू की है ‘गुफ़्ता-ए-ग़ालिब’. इसके तहत पांच सिरीज़ वे फ़ेसबुक पर ही पब्लिश कर चुके हैं. बाबर खुद भी अब थोड़ी-बहुत शेरो-शायरी करते हैं. उनकी कुछ ग़ज़लों को गाया भी गया है.

वैसे अपने लिखने के सवाल पर वे मुस्कुरा कर ये कहते हैं, ‘‘ग़ालिब ने दूसरों के लिए कुछ छोड़ा हो तो कोई कुछ लिखे.’’

क़ादिरनामा ग़ालिब की लिखी हिंदी-फ़ारसी की डिक्शनरी है जो लगभग गुमनाम है. इसे ग़ालिब ने अपने गोद लिए बेटे आरिफ़ के बच्चों के लिए लिखा था.

इसमें नज़्मों और दो ग़ज़लों के ज़रिए हिंदी और फ़ारसी के अल्फ़ाज़ सिखाए गए हैं. जैसे कि, ‘‘तेग की हिंदी अगर तलवार है, फ़ारसी पगड़ी की भी दस्तार है. नेवला रासू है और ताउस मोर, कब्क को हिंदी में कहते हैं चकोर.’’

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बाबर का एक बड़ा काम यह है कि उन्होंने पूरा क़ादिरनामा रोमन में लिखकर फ़ेसबुक पर पब्लिश किया है जिससे कि उर्दू न जानने वाले भी क़ादिरनामा के ज़रिए ग़ालिब को समझ सकें. उनकी ख्वाहिश क़ादिरनामा को एक साथ हिंदी और अंग्रेज़ी में छपवाने की भी है.

बाबर की इस कोशिश को पाकिस्तान के बिकन हाउस स्कूल सिस्टम का भी साथ मिलने की पूरी संभावाना है. बिकन हाउस स्कूल में पाकिस्तान सहित कई देशों में हैं जिसमें करीब ढाई लाख बच्चे पढ़ते हैं. पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद की पत्नी नसरीन इस संस्था की प्रमुख हैं.

बिकन हाउस की योजना क़ादिरनामा को मूल रूप में ही सिलेबस में शामिल करने की है. इसकी प्रस्तावना बाबर इमाम ने लिखी है.

ग़ालिब को समझने-समझाने के लिए बाबर जो कुछ भी कर रहे हैं उसके बीच यह जानना भी दिलचस्प होगा कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने पटना (तब अज़ीमाबाद) के अब्दुल कादिर बेदिल अज़ीमाबादी को अपना गायबाना उस्ताद माना है.

और अब दशकों साल बाद बाबर इमाम के ज़रिए एक बार फिर ग़ालिब और पटना के बीच रिश्ता क़ायम हुआ है.

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