जब उस्ताद गायक और राजकुमारी भाग निकले

भारत की यह बड़ी विडंबना रही है कि संगीत साधना उन्हीं पेशेवर गायिकाओं के लिए सुलभ हो पाई, जो तवायफ़ों के परिवारों से जुड़ी हैं.

ऐसे परिवारों में आमतौर पर माँओं का राज चलता था. इनके लिए घर-परिवार और समाज का अर्थ अलग-अलग होता था.

कमाई और तालीम की नज़र से पेशेवर गानेवालियों के सभी समूह बुनियादी तौर से सदा मातृसत्तात्मक ही थे.

राजघरानों और ज़मींदारों की महफ़िलों में गाने और उत्सवों-आयोजनों से अपनी आजीविका कमाना उनका लक्ष्य होता था. लडकी के जन्म पर इन परिवारों में जश्न मनाया जाता था.

तथाकथित 'भले घर' की लड़कियों से उलट इन घरानों की लड़कियों को धंधे की बुनियादी ज़रूरतों के तहत हर उम्र के रईस रसिकों, उस्तादों और साज़िंदों के बीच बेझिझक उठना-बैठना सिखाया जाता था.

इन्हें त्रिया-चरित्र का उपयोग करते हुए बड़े सलीके से ऊँची से ऊँची फ़ीस अपने लिए तय करना बचपन से पढ़ाया जाता था.

डेरेदार तवायफ़ें

इन नृत्य संगीतजीवी परिवारों में डेरेदार तवायफ़ें पहले पायदान पर आती थीं. यह लोग रसूखदार, संपन्न और कला की गहरी जानकार होती थीं.

ये ठसक के साथ अपनी कोठियों में रहती थीं. पुरुषों से उनके अंतरंग रिश्ते उनकी इजाज़त से ही बनते थे.

उनकी मजलिसों में कौन बैठने लायक है, कौन नहीं, किसे कब बाहर का रास्ता दिखाना है, इन सबको वे बड़ी बारीकी से जानती थीं. इनके बीच होड़ भी रहती थी, किंतु डेरेदारनियाँ खुद अपनी जमात को सामान्य नाचने-गानेवालियों से काफ़ी ऊपर मानतीं थीं.

कसबिनें, मिरासनें तथा डोमिनियाँ

उनके नीचे पायदान पर खड़ी कसबिनें, मिरासनें तथा डोमिनियाँ भी गाने से जीती थीं, पर देहव्यापार से पैसा कमाना भी उनकी अनिवार्य नियति थी.

अक्सर केसरबाई या अख़्तरीबाई सरीखी गर्वीली डेरेदार गायिकाएं उनसे हिकारत से बात करती थीं.

ठुमरी की अप्रतिम गायिका रसूलनबाई या गंगूबाई हंगल गाने वाले परिवारों की होते हुए भी जाति से अवर्ण थीं इसलिए ये डेरेदार गायिकाओं की पंक्ति से बाहर रहीं.

शिष्ट समाज की मुख्यधारा में दोनों वर्गों की गायिकाओं के लिये कोई सम्मानित जगह 20वीं सदी के पहले 70-75 साल तक नहीं बन पाई थी.

गुरुजनों से सुनी एक कथा से शुरुआत करती हूँ.

कहते हैं एक दिन बड़ौदा के संगीतानुरागी महाराजा रात को शहर के हालात का गुप्त जायज़ा लेने निकले. शहर के एक मोहल्ले से अब्दुल करीम ख़ां और उनके भाई लतीफ़ का मीठे सुर सुने तो उन्होंने भाइयों को बुलवा भेजा.

राजमहल में राजमाता, महारानी और कुछ ख़ास मेहमानों के सामने उनकी महफ़िल का आयोजन करवाया गया. उनकी आवाज़ और अदब-क़ायदे से ख़ुश महाराजा ने दोनों भाइयों को महल की महिलाओं को तालीम देने के लिए अपने यहां मुलाज़िम रख लिया.

उस ज़माने के लिहाज़ से ठीकठाक सैलेरी की व्यवस्था कर दी गई. महल में कला विभाग के सर्वेसर्वा पहलवान और गायक उस्ताद घिस्से मौलाबख़्श को ये छोकरे गायक कतई पसंद नहीं थे.

पीठ पीछे उनको मिरासी वगैरह कहकर उनकी खिल्ली उड़ाने से बाज़ नहीं आते थे. बहरहाल करीम ख़ां और लतीफ़ ख़ां ने मराठी भजन गा-गाकर राजमाता को इतना ख़ुश कर दिया कि दोनों भाई महाराज के साथ शिकार तक पर जाने लगे.

महाराज को सूझा कि क्यों न बड़ोदा संगीत विद्यालय के लिये इनकी मदद से ताज़ा नोटेशन बनवाए जाएं? दिक़्क़त यह थी कि उस्ताद अब्दुल करीम खां बहुत कम उर्दू लिख-पढ़ पाते थे.

लिहाज़ा राजमाता के भाई सरदार मारुति मान की युवा बेटी ताराबाई को उनकी मदद के लिए साथ बिठा दिया गया. आग और घी का साथ होने से वही हुआ, जो होना था.

एक दिन करीम ख़ां और ताराबाई मीरज भाग गए. ज़मीर वाले लोग थे, ज़िंदगी में फिर दोनों कभी बड़ोदा नहीं गए.

जब 1920 में 'भातखंडे पंडत' की करवाई राष्ट्रस्तरीय बड़ोदा संगीत गोष्ठी का न्योता आया, तब भी नहीं. बाद में गुणग्राही महाराज से क्षमायाचना के बाद राजदरबार और करीम ख़ां के बीच प्रेमभाव तो बन गया, लेकिन पांच बच्चों के पिता बन चुके उस्ताद ने फिर बड़ोदा जाना नम्रता से अस्वीकार कर दिया.

अपने बच्चों के नाम के साथ अलबत्ता उन्होंने कृतज्ञता जताने को 'बड़ोदेकर' उपनाम जुड़वाया. कोयलिया नाम से मशहूर सुरीली गायिका हीराबाई बड़ोदेकर उर्फ़ चंपूताई के नाम का रहस्य यही है.

हीराबाई ने नाटक कंपनी भी खोली, जिसमें उनके अलावा उनके भाई कृष्णराव मैनेजर थे.

अन्य बेटियों में कमलाबाई ने नाट्यसंगीत और सरस्वतीबाई राणे ने मराठी भावसंगीत में अच्छा नाम कमाया.

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