बौद्ध बनने से हिंदू दलितों के दिन फिरे

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युवा दलित अस्मिता के प्रतीक बनकर उभरे हैदराबाद विश्विद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या और कई राज्यों में चुनावों की पृष्ठभूमि में भीमराव आंबेडकर के लिए आरएसएस-भाजपा समेत राजनीतिक दलों के उमड़े प्यार से दलितों का जागरूक तबका खुश नहीं है.

वह परदे के पीछे देख पा रहा है. उसे लगता है कि यह सिर्फ आंबेडकर की फोटो आगे रख कर वोट लेने की चाल है. उनका मानना है कि हिंदू धर्म से निकल कर बौद्ध बनने से तरक्की का रास्ता खुल सकता है क्योंकि देश में नवबौद्धों की हालत हिंदू दलितों के मुकाबले तेजी से सुधर रही है.

पूर्व आईपीएस, आंबेडकर महासभा के पदाधिकारी और दलित चिंतक एसआर दारापुरी का कहना है कि बाबा साहब आंबेडकर का मानना था कि पहले सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन होगा तब राजनीति बदलेगी.

लेकिन दलितों की बसपा जैसी राजनीतिक पार्टियां पहले राजनीतिक परिर्वतन यानि सत्ता पाने के चक्कर में मनुवादियों से हाथ मिलाकर यथास्थितिवादी हो गईं और सामाजिक समरसता की बात करने लगीं. जिसका अर्थ छुआछूत और जातिगत भेदभाव की पुरानी व्यवस्था को जारी रखना है.

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"हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है" का नारा देने वाली मायावती और आरएसएस की सामाजिक समरसता में कोई अंतर नहीं है.

दारापुरी का कहना है कि आरएसएस भाजपा व अपने मूल चरित्र में जातिवादी अन्य दलों को आंबेडकर के दुरुपयोग का रास्ता मायावती, उदित राज, रामविलास पासवान जैसे दलित नेताओं ने ही दिखाया है जो सत्ता की मलाई के लालच में दलितों की हालत बदलने के बजाय सामाजिक समरसता के हामी हो गए.

भाजपा जैसी मनुवाद की पैरोकार पार्टियों ने इनसे यह फार्मूला पा लिया कि जैसे ये आंबेडकर की फोटो लगाकर उनका इस्तेमाल "वोट कैचर" की तरह कर सकते हैं हम भी करेंगे.

इसका नतीजा यह हुआ कि यूपी जैसे बड़े राज्य में जाटव और चमार को छोड़कर अन्य दलित जातियां भाजपा और सपा जैसी पार्टियों के साथ चली गई हैं जिसका नुक़सान मायावती को उठाना पड़ेगा जो अपनी चुनावी संभावना सुधरने के मुगालते में हैं.

आंबेडकर महासभा के एक अन्य पदाधिकारी ने कहा, आरएसएस के आंबेडकर प्रति प्यार दिखाने से दलितों को उन सवालों को उठाने का मौका मिल रहा है जिसे ये अब तक समरसता की आड़ में दबाते आए हैं.

अब उनसे पूछा जा सकता है कि अब तक किसी दलित या महिला को आरएसएस का प्रमुख क्यों नहीं बनाया गया, आरक्षण का विरोध करने वालों के सुर बदल रहे हैं. इस तमाशे में यह सकारात्मक बात है.

दलितों को लगने लगा है कि हिंदू धर्म से बाहर निकलना उनके लिए बेहतर रास्ता हो सकता है क्योंकि बीते सालों में नवबौद्धों की हालत सुधरी है जबकि हिंदू दलितों की जिंदगी वोट बैंक के रूप संगठित होने के बावजूद ज्यादा नहीं बदली है. इस आंबेडकर जयंती पर रोहित वेमुला की मां और भाई ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार किया है.

नवबौद्धों की जीवन स्थितियों पर कई पर्चे लिखने वाले दारापुरी का कहना है कि सन 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में बौद्धों की जनसंख्या अस्सी लाख है जिनमें से अधिकांश नवबौद्ध यानि हिंदू दलितों से धर्म बदल कर बने हैं.

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सबसे अधिक 59 लाख बौद्ध महाराष्ट्र में बने हैं. यूपी में सिर्फ 3 लाख के आसपास नवबौद्ध हैं फिर भी कई इलाकों में उन्होंने हिंदू कर्मकांडों को छोड़ दिया है. पूरे देश में 1991 से 2001 के बीच बौद्धों की आबादी में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

नवबौद्धों में स्त्री-पुरूष अनुपात 953 प्रति हजार है जबकि हिंदू दलितों में 936 है. दूसरे अल्पसंख्कों मुसलमान, सिक्ख और जैनियों की तुलना में यह अनुपात काफी ज्यादा है. छह वर्ष तक के बच्चों में लड़कियों और लड़कों का लिंग अनुपात 942 है जबकि हिंदू दलितों में 935 जिसका मतलब है कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति सुधरी है.

हिंदू से धर्म बदल बौद्ध हुए दलितों में शिक्षा दर 72.7 प्रतिशत है जबकि हिंदू दलितों में सिर्फ 55 प्रतिशत, महिलाओं की शिक्षा दर क्रमशः 62 और 55 प्रतिशत है. अध्ययन के मुताबिक नवबौद्धों में जागरूकता के कारण रोजगार का प्रतिशत भी बेहतर हुआ है और वे अपेक्षाकृत संपन्न हुए हैं.

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