एक 'पगली तवायफ़' की वो चुनौती..

विलक्षण संगीतकार और गायक कई बार परले सिरे के झक्की होते हैं. उनमें से एक थीं 1860 के आसपास की बनारस की एक पहलवान गायिका, जिसे स्थानीय लोग ‘पगली रं*’ के नाम से पुकारते थे.

छह फुटा शरीर, बाल मुंडे हुए और परिधान में ढीला कुर्ता तथा लुंगी. रीवा महाराज विश्वनाथ सिंह, उनकी गायकी पर रीझ कर उनको अपनी रियासत में ले आए. जहां ‘पगली’ को सेनिया घराने के उस्ताद प्यारे ख़ां, पखावजी कुदऊ महाराज सरीखे कलाकारों से दुर्लभ संगीत की शिक्षा मिली.

पगली ने उस्ताद बड़े मुहम्मद ख़ां से भी गंडा बंधवाया. कहते हैं कि वो इस सिरफिरी पर अपने बेटों की ही तरह स्नेह बरसाते थे. और तो और, ख़ां साहब उसकी शागिर्दी का महफ़िलों में बड़े गर्व से ज़िक्र भी करते थे.

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स्नेही गुरु और आश्रयदाता महाराज की लगभग आगे-पीछे हुई मौत के बाद पगली वापस बनारस चली गईं. बनारस में उन्होंने प्रसिद्ध गायक उस्ताद हद्दू ख़ां से हाथ मिला कर भरी महफिल में उनको पहलवानी या गायकी में पछाड़ने की चुनौती दे डाली थी.

खेद है इस सनकी गायिका ने न कोई शागिर्द बनाए, न ही किसी ने उनसे सीखने का दुस्साहस किया. अपनी सांगीतिक मालूमात का भंडार यह विलक्षण गायिका अपने साथ ही ले गई.

संगीत के इसी उर्वर युग की अन्य बड़ी गाने वाली थीं रहीमनबाई. रहीमनबाई की संगत कर कई संगीतकारों ने संगीत का असली मर्म सीखा और बहुत बड़े सारंगीनवाज़ तथा तबलानवाज़ बने.

ध्रुपद उस युग का पक्का गाना था और ख़याल गायकी तब घुटनों पर चल रही थी. फिर भी उसकी बढ़ती लोकप्रियता का मोल समझ कर इन तवायफों ने कई बड़े उस्तादों के उलट ये नई विधा सीखी और बहुत लोकप्रिय हुईं.

पेशेवर नाचने-गाने वालियों को लेकर भारतीय समाज के कई पूर्वाग्रह आज गायब हो चुके हैं. पर गाने बजानेवालों की जमात में आम तौर पर इन महिलाओं से संगीतकारों वादकों के रिश्तों को लेकर एक शर्मभरी चुप्पी बहुत समय तक बनी रही.

आज के शास्त्रीय गायन वादन की कितनी महत्वपूर्ण शैलियां, बंदिशें इन तवायफ़ों के योगदान अथवा कलाकारों को लगातार दी गई उनकी उदार मदद के बिना आकार नहीं ले सकती थीं.

नवाब दरगाहकुली खां ने अठ्ठारहवीं सदी के पतनशील दिनों में मुगल बादशाह शाह आलम युग के जानेमाने कलाकार सदारंग की दो पट्ट शिष्याओं धन्नाबाई और पन्नाबाई की चर्चा अपनी किताब में की है.

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धन्नाबाई न सिर्फ बढ़िया गायिका थीं बल्कि उसने खुद भी कई नए राग रचे थे.

यह राग कौन से थे? वे बंदिशें कैसी थीं?

अफ़सोस, हमारे समाज ने इन सब ब्योरों को करीने से बचा कर उस तरह नहीं रखा, जिस तरह उनके गुरु सदारंग की रचनाओं को. यह कहना ग़लत है कि गानेवाली महिलाएं स्वार्थी और लालची होती थीं. अपने काम की वाजिब कीमत कौन नहीं चाहता?

पर अधिकतर बड़े गायक गायिकाओं में आध्यात्मिक रुझान भी होता है. ये उन्हें संगीत के गहरे अमूर्त मर्म की समझ देता है. उन्नीसवीं सदी की ही बड़ी गानेवाली नूरबाई को वृंदावनलाल वर्मा ने भी अपने एक उपन्यास में नायिका के रूप में लिया है.

असाधारण रूपवती नूरबाई भक्तिपरक संगीत भी बहुत सुंदर गाती थी और एक आध्यात्मिक महिला थीं. एक महफ़िल में क्रूर हमलावर नादिरशाह उसका गाना सुन कर इस कदर रीझा कि वह ज़बरदस्ती नूरबाई को हरम में ले गया.

वहां उनका मन कैसे रमता? वह कोई सामान्य देहव्यापारी तो थी नहीं. अंतत: किसी तरह वहां से भाग कर वह वृंदावन चली गई और अंत तक वहीं रही.

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