'मोदी को सम्मान देंगे तो भारत क्यों रास्ते पर आएगा?'

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तुर्की के शहर इस्तांबुल में इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की बैठक में कश्मीर का मुद्दा उठने पर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि ओआईसी के महासचिव इयाद अमीन मदनी ने अपनी सालाना रिपोर्ट में कश्मीर समस्या का ख़ास तौर से ज़िक्र किया.

अख़बार के मुताबिक़ ओआईसी महासचिव ने कहा कि जिन मुस्लिम देशों के भारत के साथ अच्छे रिश्ते हैं वो भारत पर ज़ोर देंगे कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों का सम्मान करे और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ कश्मीरियों को स्वनिर्धारण का अधिकार दे.

लेकिन अख़बार सवाल करता है कि जब सऊदी अरब भारत के साथ रक्षा समझौते करेगा और मोदी को अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान देगा तो फिर वो भला कश्मीरियों को उनका हक़ देने की राह पर क्यों आएगा.

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‘एक्सप्रेस’ ने ओआईसी सम्मेलन में सऊदी शाह सलमान के इस बयान का ज़िक्र किया है कि ‘हम इस्लामी दुनिया की समस्या का हल निकालने की मांग करते हैं और इसमें कश्मीर और फ़लस्तीनी समस्या का न्यायोचित ढंग से हल निकालना सबसे ज़रूरी है.’

लेकिन अख़बार की राय है कि मुस्लिम देश अपने सभी संसाधनों और मानवशक्ति के बावजूद घरेलू मोर्चे पर पैदा होने वाली समस्याओं को हल करने में नाकाम दिखाई दे रहे हैं.

अख़बार कहता है कि सारिया, लीबिया, यमन, इराक़ और फ़लस्तीन की समस्याओं को हल करने के मामले में मुसलमान देश कहीं भी एकजुट नज़र नहीं आ रहे हैं.

‘इंसाफ़’ लिखता है कि ये पहला मौक़ा है जब ओआईसी ने कश्मीरियों के अधिकारों पर खुलकर आवाज़ उठाई है.

अख़बार कहता है कि बदक़िस्मती से पाकिस्तानी और दूसरे मुस्लिम देशों के शासक अपने अपने फ़ायदे की सोचते हैं और ऐश परस्ती का शिकार हैं जबकि इन देशों की जनता कश्मीरियों के हक़ के लिए आए दिन आवाज़ बुलंद करती रहती है और प्रदर्शन करती रही है.

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वहीं ‘जंग’ के एक संपादकीय का शीर्षक है – भारतीय और अफ़ग़ान ख़ुफ़िया एजेंसियों का गठजोड़.

अख़बार का कहना है कि भारत का इस वक़्त सबसे बड़ा मक़सद पाकिस्तान चीन आर्थिक कॉरिडोर योजना को निष्फल करना है और इस सिलसिले में रॉ के हेडक्वार्टर में विशेष सेल क़ायम की जा चुकी हैं.

अख़बार कहता है कि भारत और अफ़ग़ान एजेंसियों की एक के बाद एक हालिया सरगर्मियां उनके बीच गठजोड़ के सबूत पेश करती हैं.

वहीं रोज़नामा ‘दुनिया’ में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ का ये बयान है कि किसी को भी पाकिस्तान की तरक़्क़ी में रोड़ा अटकाने नहीं देंगे.

अख़बार के मुताबिक़ आर्मी चीफ़ का ये कहना सही है कि देश विरोधी ताक़तें पाकिस्तान को अस्थिर करने में लगी हैं, लेकिन सरकार की तरफ़ से ऐसी बातें कही तक नहीं जाती, क़दम उठाने की बारी तो उसके बाद आती है.

अख़बार ने सरकार पर पूरी तरह से निष्क्रिय होने का आरोप लगाते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि सरकार का कोई वजूद ही नहीं है और सारी ज़िम्मेदारी फ़ौज के कंधों पर डाल दी गई है.

रुख़ भारत का करें तो रोज़नामा ‘सहाफ़त’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘अचानक’ दिए जाने पर हैरानी जताई है.

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अख़बार कहता है कि क्या सऊदी अरब के शासक इस बात से बेख़बर हैं कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 2002 में वहां मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम हुआ था और वहां की मोदी सरकार ने मुसलमानों को बचाने की कोशिश भी नहीं की थी.

अख़बार लिखता है कि सच तो ये है कि सऊदी अरब को भारतीय मुसलमानों की क्या, बल्कि किसी भी देश के ज़ुल्म के शिकार मुसलमानों में कोई दिलचस्पी नहीं है.

वहीं ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने भारत और अमरीका के बीच हुए एक हालिया समझौते को ख़तरनाक बताया है जिसके तहत अमरीका को रक्षा उद्देश्यों के लिए भारतीय हवाई पट्टियों के इस्तेमाल की इजाज़त दी गई है.

अख़बार कहता है कि इस समझौते के तहत अमरीकी अधिकारी और सैन्य अफ़सर भारत के किसी भी फ़ौजी अड्डे का मुआयना कर सकेंगे.

अख़बार की राय है कि इस तरह के समझौते से अमरीका भारत के युद्धक और सैन्य अड्डों के साथ साथ सैन्य उपकरणों का भी आसानी से पता लगा लेगा और जब चाहे भारत को झटका देने के लिए उन्हें तबाह भी कर सकता है.

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