'घर जलते रहे, बुझाने को पानी नहीं था'

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यूं तो पूरा बुंदेलखंड ही सूखे की वजह से पानी की समस्या से जूझ रहा है. लेकिन उसमें भी कुछ जगह यह संकट कुछ ज़्यादा ही है.

झांसी ज़िले का बोडा गांव शायद सबसे ज़्यादा संकट झेल रहा है. मऊरानीपुर तहसील के बंगरा ब्लॉक का ये गांव है. इस ब्लॉक के तमाम गांवों में मुख्य सड़क से गांव में घुसते ही पानी ढोने के तमाम देसी साधन इस्तेमाल करते हुए लोग दिख जाते हैं.

कोई साइकिल पर आठ दस डिब्बे टांगे हुए है तो कुछ महिलाएं सिर पर तीन चार घड़े रखे हुए हैं या फिर कुछ लोग बैलगाड़ी पर भी पानी से भरे बड़े-बड़े ड्रम लादे हुए दिख जाएंगे.

गांव के लोगों ने बताया कि आसपास के कुछ कुंओं और हैंड पंपों पर पानी मिल जाता है. इससे सबका काम चलता है. लेकिन इस पानी को लाने के लिए दो-दो किमी दूर तक जाना पड़ता है और उसके बाद पानी के लिए लाइन लगानी पड़ती है.

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साइकल पर पानी लाने का काम ज़्यादातर युवा और बच्चे करते हैं. ऐसे में, बच्चों के बारे में मैंने कुछ लोगों से पूछ लिया कि जब दिन का एक बड़ा हिस्सा पानी लाने में ही बीत जाता है तो ये पढ़ाई कब करते होंगे?

मुझे टका सा जवाब मिल गया, "पहले पानी ज़रूरी है या पढ़ाई. पानी भरने से फुर्सत मिले तब तो स्कूल जाएं."

हैंडपंप के किनारे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहीं ममता, उमा, सरोज, मोहित, प्रमोद ये सभी स्कूल जाते हैं. इनका कहना है कि एक तो आठवीं से आगे का स्कूल भी गांव में नहीं है, दूसरे, पानी की समस्या ने पढ़ाई से युवाओं की बेरुख़ी को और बढ़ा दिया है.

बोडा गांव के प्रधान बाबूलाल कुशवाहा बताते हैं, ''सात हज़ार की आबादी वाले हमारे गांव में पांच तालाब हैं, पांचों सूखे पड़े हैं. लगभग 25 हैंडपंप हैं जिनमें सिर्फ़ 2 चल रहे हैं. दो नए लगवाए हैं, वो भी चल रहे हैं.''

पानी के संकट का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जालौन ज़िले के कदौरा क़स्बे में पिछले दिनों आग लग गई लेकिन आग को बुझाने के लिए लोगों के पास पानी नहीं था.

कदौरा में रजिया खातून के कच्चे मकान में पिछले दिनों आग लग गई.

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\लोगों ने घरों में पीने के लिए रखे पानी से आग बुझाने की कोशिश की लेकिन महज़ कुछ बाल्टी पानी आग बुझाने के लिए पर्याप्त नहीं थी. लोग बेबस होकर आग से जलते घर को देखते रहे.

ऐसे ही, हमीरपुर ज़िले के झलोखर गांव में पिछले दिनों एक मकान में आग लग गई.

गांव में फायर ब्रिगेड आ नहीं सकती थी और गांव के लोगों के पास इतना पानी नहीं था कि उसे बुझा पाते. नतीजतन, घर में जो कुछ भी था जलकर ख़ाक हो गया. यही नहीं, आग में झुलसने से महेश वाल्मीकि की मौत हो गई.

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आग लगने और पानी न होने से बुझा पाने की असमर्थता का ये एक उदाहरण है. अप्रैल की शुरुआत से ही बुंदेलखंड इलाक़े में आगजनी की ऐसी कई घटनाएं सुनने में आईं.

खेतों में तो आए दिन आग लग जाती है और जो भी फ़सल किसी तरह से हुई भी है, जलकर ख़ाक हो जाती है.

सूखे के संकट से निपटने के लिए राहत पैकेज तो जारी किए गए और लोगों तक पहुंचाने का दावा भी किया गया, लेकिन लगता है कि जल संकट को तवज्जो नहीं दी गई.

स्थानीय पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि पानी संकट के चलते यहां कई कहावतें मशहूर हैं जिनमें 'गगरी न फूटे चाहे ख़सम मर जाए' सबसे ज़्यादा चर्चित है. बावजूद इसके, इसे दूर करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई.

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वो बताते हैं कि अब जबकि जलस्तर की समस्या आ पड़ी है तब ये इलाक़ा पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है.

हालांकि सत्तर के दशक में अपने समय में एशिया की सबसे बड़ी जल परियोजना के नाम से मशहूर पाठा पेयजल परियोजना शुरू हुई थी. इसमें पाइपलाइन के ज़रिए मानिकपुर तक पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की गई थी.

चित्रकूट के सामाजिक कार्यकर्ता अभिमन्यु बताते हैं कि परियोजना के पूरा होने पर चित्रकूट के अलावा मानिकपुर के दूरदराज इलाके में बसे आदिवासियों के लिए भी पीने का पानी मिलने लगा लेकिन बाद में बदइंतज़ामी के चलते इसका जितना लाभ मिलना चाहिए था, वो नहीं मिल सका.

झांसी के ज़िलाधिकारी अजय शुक्ल कहना है कि प्रशासन समस्याओं से वाकिफ़ है और उसे दूर करने की कोशिशें की जा रही हैं.

उन्होंने दावे के साथ कहा कि इन गांवों में टैंकरों की सप्लाई सुनिश्चित कर दी गई है. मैंने उन्हें अपना अनुभव बताया कि दो दिन के दौरे में मुझे एक भी टैंकर नहीं दिखा, गांव की तो बात ही छोड़िए.

इस पर डीएम साहब मातहतों पर ख़ासे नाराज़ हुए, तुरंत टैंकर भेजने का आदेश दिया, लेकिन पांच दिन बाद जब बोडा गांव में फ़ोन पर कुछेक लोगों से मेरी बात हुई तो पता चला कि टैंकर अब तक नहीं पहुंचा है.

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मऊरानीपुर के ही रहने वाले भारतीय किसान यूनियन के नेता शिवनारायण सिंह परिहार बताते हैं, ''खेत में हुई बोरिंग से पानी भरकर लोगों तक पहुंचाने के लिए पाइप से उसे बाँटा जा रहा है. लोग लंबी लाइनों में लगकर पानी ले रहे हैं. इसे लेकर लोगों में जमकर संघर्ष भी हो रहा है.''

वहीं महोबा ज़िले के कपसा गांव के लोग पानी की दोहरी मार सह रहे हैं. पानी का जो संकट पूरे बुंदेलखंड में है, वह तो है ही, हैंडपंपों से निकलने वाला पानी इतना खारा है कि मुश्किल से ही कोई पी सकता है.

गांव वालों का कहना है कि मजबूरी में यही पानी पीना भी पड़ता है. नहाने के लिए तो लोगों के पास दो ही साधन हैं- या तो कोई बेतवा, यमुना, केन जैसी कोई नदी हो जिसमें पानी हो या फिर कोई तालाब हो जिसमें थोड़ा बहुत पानी बचा हो. छोटी नदियां तो इस क़दर सूखी हुई हैं जैसे उनमें कभी पानी रहा ही न हो.

पानी के अभाव में यहां के लोग पशुपालन भी नहीं कर पा रहे हैं.

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