जिसकी लाठी, उसका कोहिनूर

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कोहिनूर के बारे में यह मान्यता है कि वह कृष्णा नदी के पास, कुल्लूर की खदानों में मिला था. यह खदानें आज के आंध्र प्रदेश में स्थित हैं.

1850 में इसके बारे में चर्चा करते हुए ईस्ट इंडिया कम्पनी के डायरेक्टरों ने यह नोट किया कि लोग मानते थे कि यह हीरा कोई 5000 वर्ष पहले, महाभारत काल में, मिला था.

शायद यही उस कथा में चर्चित स्यामंतक मणि था. इस हीरे का वज़न 793 5/8 (पांच बटे आठ) कैरेट बताया जाता था.

ऐतिहासिक जानकारी यह है कि इस हीरे का सबसे पहला ज़िक्र बाबर के आत्मकथानक बाबरनामा में मिलता है. बाबरनामा में वह कहता है कि किस तरह उसके प्यारे बेटे हुमायूं ने उसे यह अभूतपूर्व हीरा भेंट दिया था.

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जब हुमायूं ने इसकी क़ीमत आंकनी चाही तो बाबर ने उस से कहा कि इतने बेशक़ीमती हीरे की क़ीमत एक लट्ठ होती है, जिसके हाथ में भारी लट्ठ होगा उसके हाथ में यह हीरा होगा.

बाबर लिखता है कि पानीपत की लड़ाई में सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर आगरा क़िले की सारी दौलत हुमायूं ने अपने क़ब्ज़े में ले ली. यहां हुमायूं को ग्वालियर के राजा ने एक बहुत बड़ा हीरा दिया. हुमायूं ने उसे अपने पिता को भेंट कर दिया.

सत्रहवीं सदी में बाबर के पड़पोते, शाहजहां ने अपने लिए एक विशेष सिंहासन बनवाया.

इस सिंहासन को बनाने में सैयद गिलानी नाम के शिल्पकार और उसके कारीगरों की टीम को कोई सात वर्ष लगे.

इस सिंहासन में कई किलो सोना मढ़ा गया, इसे अनेकानेक जवाहरातों से सजाया गया.

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इस सिंहासन का नाम रखा गया तख़्त—ए—मुरस्सा. बाद में यह ‘मयूर सिंहासन’ के नाम से जाना जाने लगा.बाबर के हीरे को भी इसमें मढ़ दिया गया.

दुनिया भर के ज़ौहरी इस सिंहासन को देखने आते थे. इन में से एक था वेनिस शहर का होर्टेंसो बोर्ज़िया.

बादशाह औरंगज़ेब ने हीरे की चमक बढ़ाने के लिए इसे बोर्ज़िया को दिया. बोर्ज़िया ने इतने फूहड़पन से काम किया कि उसने हीरे के टुकड़े-टुकड़े कर दिए. यह 793 कैरट की जगह महज़ 186 कैरट का रह गया.

औरंगज़ेब ने बोर्ज़िया से 10,000 रुपये ज़ुर्माना के रूप में वसूल किए.

फिर 1739 में फ़ारस के शाह नादिर ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया. नादिरशाह के सिपाही पूरी दिल्ली में कत्ले—आम कर रहे थे.

इस कत्ले—आम को रोकने के एवज़ में मुग़ल सुल्तान मुहम्मद शाह ने उसे मुग़ल तोशखाने से कोई 2,50,000 जवाहरात दिए. उनमें से एक यह हीरा भी था.

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कहा जाता है कि नादिरशाह ने ही इसे नाम दिया था कोह-ए-नूर यानि रौशनी का पर्वत.

नादिरशाह की हत्या के बाद कोहिनूर अहमद शाह दुर्रानी के क़ब्ज़े में आ गया.

अहमद शाह दुर्रानी का बेटा, शाह शुजा, जब सिखों की हिरासत में लाहौर जेल में था तो कहा जाता है कि सिख महाराजा रणजीत सिंह ने उसके परिवार को तब तक भूखा प्यासा रखा जब तक कि शुजा ने कोहिनूर हीरा रणजीत सिंह के हवाले नहीं कर दिया.

सिखों को हराने पर कोहिनूर हीरा अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथ लगा.

भारत का वायसराय डलहौजी इसे अपनी आसतीन में सिलवा कर लंदन ले गया. वहां उसने कोहिनूर कम्पनी के डायरेक्टरों को भेंट में दे दिया.

कम्पनी के डायरेक्टरों ने तय किया कि चूंकि हीरा अमूल्य था, इसका कम्पनी के लिए कोई इस्तेमाल नहीं था, तो सबसे बेहतर यह रहेगा कि इसे रानी विक्टोरिया को भेंट देकर कुछ सद्भाव ही हासिल कर लिया जाए.

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रानी विक्टोरिया ने इसे अपने ताज में जड़वा लिया. तब से कोहिनूर वहीं है.

आख़िर यह वही समय था जब बरतानवी ताज के हाथ में दुनिया की सबसे ज़्यादा ताक़त थी. और जैसा बाबर ने कहा था कि यह हीरा तो उसी का होगा जिसके हाथ में सबसे बड़ा लट्ठ हो.

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