अगर ये 5 हों तो सूखा क्यों हो

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भारत के कई इलाक़े सूखे की चपेट में हैं जिससे फ़सल ही नहीं जान-माल का भी नुकसान हो रहा है.

हालांकि बारिश पर तो प्रकृति का ही बस है लेकिन जानकारों के अनुसार जलवायु परिवर्तन भी इसका एक अहम कारण बनता जा रहा है.

कुछ लोगों की राय ये भी हैं कि भारत में पानी के संरक्षण को लेकर जागरूकता पहले के मुक़ाबले कम हुई है.

लेकिन भारत में कुछ ऐसे लोग और योजनाएं रहीं हैं जिन्होंने पानी के संरक्षण के लिए दुनिया भर में नाम कमाया है.

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1. राजेंद्र सिंह: वॉटर कन्सर्वेशन या पानी के संरक्षण के मामले में महत्वपूर्ण काम करने वालों में राजेंद्र सिंह का नाम हमेशा शीर्ष पर रहा है. 'वॉटरमैन' या 'जलपुरूष' के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह ने पानी के संरक्षण का काम राजस्थान की थानागाजी तहसील से 1975 में शुरू किया और थार रेगिस्तान में भी गाँवों को पानी के प्रबंधन में सक्षम बनाया. स्थानीय समुदाय द्वारा शुर हुई इन मुहिमों के लिए राजेंद्र सिंह को मैगसेसे पुरस्कार भी मिला और बाद में उन्होंने स्टॉकहोम वाटर प्राइज़ भी जीता, जिसे पानी का नोबेल पुरस्कार कहते हैं. इनके एनजीओ ने बारिश के पानी को बचाने, चेक डैम्स बनाने में प्राचीन परम्पराओं के अलावा नई तकनीक भी इस्तेमाल की.

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2. अनुपम मिश्रा: 'आज भी खड़े हैं तालाब' और 'राजस्थान की रजत बूँदें' जैसी लोकप्रिय किताबों के लेखक अनुपम मिश्रा ने पिछले चार दशकों से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में पानी के संरक्षण पर काम किया है. अनुपम ने उत्तराखंड में 1970 के दशक में हुए चिपको आंदोलन में चंडी प्रसाद भट के साथ काम किया और फिर उसके बाद अपना ध्यान पानी को सरंक्षित रखने के परंपरागत तरीकों पर लगा दिया. इनका मानना रहा है कि पानी बचाने के प्राचीन और मध्यकालीन तरीके आज भी कारगर हैं और इन्हे संरक्षित करने की जरूरत है. इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार जीतने के बाद अनुपम मिश्रा विदेशों में भी जाकर पानी के संरक्षण के तौर तरीकों पर काम करते रहे हैं.

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3. बलबीर सिंह सीचेवाल: पंजाब के सबसे नामचीन पर्यावरण कार्यकर्ताओं में से एक नाम हैं बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल का. इन्होंने नदी के पानी को प्रदूषण मुक्त करने की एक ऐसी मुहिम चलाई जिसकी मिसालें विदेशों में भी दी जाती है. पंजाब में करीब 200 किलोमीटर लंबी काली बेन नदी की सफाई का प्रोजेक्ट इन्होंने 2007 में शुरू किया था. तब ये नदी या छोटी नहर एक सूखे हुए नाले की शक्ल में थी. लेकिन इनके प्रयासों के चलते जागरूकता बढ़ने पर समाज के सभी वर्ग के लोग इनकी मुहिम में शामिल हुए और आज नदी की शक्ल बदल चुकी है. भारत में इनकी तरह का बीड़ा उठने वालों की संख्या अब बढ़ रही है.

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4. 1970 की वॉटरशेड योजनाएं: इस दशक में भारत सरकार ने कम से कम पांच ऐसी योजनाएं शुरू की जो मूल रूप से सिंचाई और कृषि पर सम्पूर्ण ध्यान देने के लिए बनाई गई थीं. इनमें से 1973 में पहली बार बड़े पैमाने के सूखे से निपटने के लिए एक ऐसा मिशन शुरू किया गया जिसमें न सिर्फ़ बारिश के पानी को बचाने पर ज़ोर दिया गया बल्कि ग्राउंडवॉटर के संरंक्षण के लिए भी काम शुरू हुआ.

5.कपार्ट योजना: भारत सरकार की इस योजना को 1986 में शुरू किया गया, जब ऐसा लगा कि ग्रामीण विकास की योजनाओं में पानी के संरक्षण जैसी मूलभूत बातों को ज़्यादा तरजीह नहीं मिल पा रही है. कपार्ट के तहत गैर सरकारी संगठनों के ज़रिए लागू कराई जा रही हर स्कीम को राज्य सरकार और जिला प्रशासन के ज़रिए लागू कराया जाने लगा. ये वो योजना थी जिसमें पहली बार रूफ टॉप रेन वॉटर हारवेस्टिंग यानि छत के ज़रिए बारिश के पानी को इकठ्ठा करने के तरीकों पर काम शुरू हुआ.

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