क्या कन्हैया का समर्थन घट रहा है जेएनयू में?

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क्या जेएनयू छात्र संघ के भीतर बुधवार रात से शुरू हुए अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल को लेकर मतभेद थे?

और क्या संघ अध्यक्ष कन्हैया के कुछ साथियों को लगता है कि उनका ध्यान विश्वविद्यालय के मुद्दों से हट रहा है?

नाम न लेने की शर्त पर भूख हड़ताल कर रहे एक छात्र ने बीबीसी से कहा कि कन्हैया शुरुआत में अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल के पक्ष में नहीं थे. वह उसके नतीजों को लेकर आशंकित थे और उन्हें शामिल करने के लिए मनाना पड़ा, जिसके बाद वह राज़ी हुए.

छात्र का कहना था, ''कन्हैया कुमार को लोग जानते हैं इसलिए यह ज़रूरी था कि वह इस भूख हड़ताल से जुड़ें.''

साथ ही इस छात्र का दावा था कि पिछले कुछ दिनों से कन्हैया का ध्यान विश्वविद्यालय के मामलों से हट गया है. बुधवार को भी कन्हैया के नज़दीकी एक अन्य छात्र ने बीबीसी से कहा था कि कन्हैया भूख हड़ताल में शामिल नहीं हैं लेकिन गुरुवार को कन्हैया ने कहा कि वह बिल्कुल भूख-हड़ताल में शामिल हैं.

उन्होंने कहा, ''भूख हड़ताल प्रदर्शन करने का ज़ोरदार तरीका है. मेरा कहना था कि अगर सभी लोग अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर चले जाएंगे तो लोगों को इकट्ठा करने में दिक़्क़त होगी. मेरा कहना था कि कुछ लोग अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर रहें और कुछ लोग रिले (एक निश्चित समय के लिए) पर रहें.''

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बुधवार रात 12 बजे से विश्वविद्यालय छात्र संघ के 20 सदस्य प्रशासन की कार्रवाई के ख़िलाफ़ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं.

नौ फ़रवरी को विवादास्पद नारेबाज़ी मामले में जेएनयू प्रशासन ने उमर ख़ालिद को एक सेमेस्टर के लिए, मुजीब गट्टू को दो सेमेस्टर के लिए निलंबित कर दिया है.

प्रशासन ने अनिर्बान को 15 जुलाई तक निलंबित किया था लेकिन 25 जुलाई के बाद उन पर अगले पांच साल तक जेएनयू में कोई कोर्स करने पर पाबंदी लगा दी गई. इसके अलावा ऐश्वर्य, रामा नागा, अनंत और गार्गी पर भी 20-20 हज़ार का जुर्माना लगाया गया था. कन्हैया कुमार पर 10 हज़ार का जुर्माना लगा था.

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जिस जगह ये 20 छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं, उनके बगल में संघ के संयुक्त सचिव और एबीवीपी छात्र नेता सौरभ शर्मा भी अपने ऊपर 10 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाए जाने पर भूख हड़ताल कर रहे हैं. सौरभ पर आरोप है कि उन्होंने विवादास्पद नारों का ''विरोध किया था.''

छात्रसंघ ने प्रशासन के फ़ैसले को बदले की भावना से प्रेरित बताया था.

हड़ताल को लेकर कथित मतभेद पर कन्हैया कुमार ने कहा, ''अभी छात्रों की परीक्षा है. छात्र छुट्टी में घर भी जा सकते हैं. इस आंदोलन को जारी रखना एक चुनौती है. इसलिए रणनीतिक वजह से हम कह रहे थे कि अनिश्चितकालीन हड़ताल पर कम लोग बैठें, रिले पर ज़्यादा लोग बैठें ताकि इस आंदोलन को जारी रखा जा सके.''

कन्हैया कुमार को उम्मीद है कि परीक्षा खत्म होने के बाद भूख हड़ताल में छात्रों की हिस्सेदारी बढ़ेगी.

वह कहते हैं, ''जिनकी तबियत ख़राब होगी, उन्हें हम बदल देंगे. दूसरे साथी उनकी जगह बैठ जाएंगे.''

कन्हैया उन दावों को भी ख़ारिज करते हैं कि उनका ध्यान विश्वविद्यालय के मुद्दों से हटता हुआ लग रहा है.

वे कहते हैं, ''सिर्फ़ जेएनयू में इस आंदोलन को नहीं लड़ा जा सकता. इसके लिए एक राष्ट्रवादी गठबंधन ज़रूरी है. इसलिए हम बाहर जा रहे हैं और जेएनयू के लिए ही जा रहे हैं.''

40 डिग्री से ज़्यादा की दिल्ली की भीषण गर्मी में जेएनयू प्रशासनिक ब्लॉक के बाहर बैठे छात्रों के लिए भूख हड़ताल जारी रखना किसी चुनौती से कम नहीं होगा.

उमर ख़ालिद भूख हड़ताल को जेएनयू बचाने की लड़ाई कहते हैं और कहते हैं कि जब तक प्रशासन फ़ैसले को वापस नहीं ले लेता, तब तक भूख हड़ताल जारी रहेगी.

वे कहते हैं, ''हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. जांच समिति के नतीजे पहले से ही बने थे. ये नतीजे झंडेवाला, नागपुर में बने थे. छात्रों को सुनने का मौक़ा नहीं दिया गया. हमें जेल में ही चिट्ठी पकड़ा दी गई कि आपको दोषी पाया गया है, आपके खिलाफ़ कार्रवाई होगी और आपके खिलाफ़ कार्रवाई क्यों न हो.''

उमर कहते हैं उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया और ''राजनीतिक विचार रखना कोई ग़लत काम नहीं. यह जेएनयू को बचाने की लड़ाई है.''

उधर, छात्र संघ के संयुक्त सचिव और एबीवीपी नेता अपने ख़िलाफ़ कार्रवाई से नाराज़ हैं.

वह कहते हैं, ''देशविरोधी नारों के विरोध में खड़ा होना क्या ग़लत है? जेएनयू प्रशासन ने फिर सिद्ध कर दिया है. जेएनयू प्रशासन ने फिर सिद्ध कर दिया कि जेएनयू देश विरोधियों के लिए जैसा पहले से माना जाता था, वैसा है.''

इस बाबत हमने जेएनयू के वाइस चांसलर प्रो. एम जगदीश कुमार से विभिन्न छात्रों पर हुई कार्रवाई के कारणों को जानने की कोशिश की, मगर उनसे संपर्क नहीं हो सका.

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