समय से पहले ही दहकने लगे हैं जंगल

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उत्तराखंड के जंगलों में इस बार समय से पहले भड़क उठी आग ने लोगों को चिंता में डाल दिया है.

अब तक पांच लोगों की मौत जंगल की आग से हो चुकी है. क़रीब दस लोग विभिन्न जगहों पर आग से झुलस गए हैं जिनका स्थानीय अस्पतालों में इलाज चल रहा है.

केदारनाथ इलाके में एक गांव की गौशाला में ही सात जानवर मारे गए. इस बार आग तेज़ी से फैल रही है और जहां से जानमाल के नुकसान की खबरें आई हैं वहां पता चला है कि आग लोगों के घरों और खेतों के पास तक पहुंचने लगी थी.

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टिहरी में नरेंद्रनगर के पास सेना का एक डिपो भी आग की चपेट में आने से बाल-बाल बचा.

उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक राजेंद्र कुमार का कहना है, “फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया हमारे हेडक्वार्टर को फ़ायर अलर्ट भेज रही है. फ़ायर अलर्ट का मतलब ये है कि जहां आग लगी है उसकी सूचना सैटेलाइट के ज़रिए हमें मिल जाती हैं. हम वो सूचना प्रभागीय वनाधिकारियों को फ़ौरन भेज देते हैं. आग को चिन्हित करने में ये तकनीक बहुत सहायक सिद्ध हो रही है.”

वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल अप्रैल के मध्य से शुरू हुई आग की अब तक 500 से ज़्यादा घटनाएं हो चुकी हैं.

आग से एक हज़ार हेक्टयर क्षेत्रफल का जंगल बरबाद हो चुका है, जिसमें से करीब 400 हेक्टेयर सिविल या वन पंचायत का जंगल है.

23 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण कार्य भी आग की भेंट चढ़ चुका है.

उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक को भेजी गई सूचना में प्रमुख वन संरक्षक बीपी गुप्ता ने ये आंकड़े दिए हैं. चिंता की बात ये है कि अभी गर्मी का मौसम शुरू हुआ ही है, जबकि आमतौर पर आग लगने की घटनाएं जून में देखी जाती हैं.

आग की बढ़ती घटनाओं ने प्रशासन को चिंता मे डाल दिया है. राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा है और शासन की बागडोर राज्यपाल के के पॉल के हाथों में है.

उन्होंने आग बुझाने के लिए किये जा रहे कार्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि इस आपदा पर नियंत्रण के लिए अवैध कटाई में संलिप्त शरारती तत्वों पर शिकंजा कसने के साथ जंगल से सटी आबादी के कूड़ा जलाने, वन क्षेत्र से गुजरने पर जलती बीड़ी, सिगरेट फेंके जाने और अच्छी घास के लालच में जंगल जलाने जैसी गतिविधियों के दुष्परिणामों से जनता को जागरूक करना होगा.

उधर वन विभाग का दावा है कि उसके इंतज़ाम पर्याप्त हैं.

आग बुझाने में हो रही देरी के बारे में राज्य के मुख्य वन संरक्षक राजेंद्र कुमार का कहना है कि “ज़्यादातर जंगल ऊंचे और दूरदराज़ के इलाकों में हैं जहां वाहन से नहीं पैदल ही पहुंचा जा सकता है.”

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इस भयंकर वनाग्नि से निपटने के लिए उत्तराखंड के वन विभाग के संसाधनों पर नज़र डालें तो ये दिखता हैः

राज्य के प्रत्येक वन विभाग का फायर प्लान अनुमोदित किया गया है. जनपद का वरिष्ठ स्तर का अधिकारी नोडल नामित किया जाता है.

रदेश स्तर पर आग की रोकथाम के लिए 40 मास्टर कंट्रोल रूम हैं, क्रू स्टेशन हैं 113, स्थायी सैट हैं 506, मोबाइल सैट हैं 199, हैंडसैट की संख्या है 1582, रिपीटर स्टेशन हैं 35, वॉच टावर हैं 94 और फायर वॉचर गार्डों और श्रमिकों की संख्या हैं करीब 4,500.

राज्य का 65 फीसदी भूभाग वनक्षेत्र है और ऐसे में इन संसाधनों और संख्या से अंदाज़ा लग सकता है कि जंगल की आग का मुहावरा कैसे फैला होगा.

इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जंगलों में भड़की आग पर राज्यपाल को पत्र लिखकर मांग की है कि “आग की घटनाओं से प्रदेश में बनी असामान्य स्थिति को देखते हुए राज्य को अग्नि आपदा पीड़ित घोषित किया जाए.”

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राज्यपाल को लिखे छह बिंदुओं वाले पत्र में रावत ने आग बुझाने वाले ग्रामवासी और दूसरे कर्मचारियों को बीमाकृत कर राज्यकर्मी के तौर पर नुकसान की स्थिति में मुआवज़ा देने, जलस्रोत की सुरक्षा के लिए आपातकालीन योजना बनाकार क्रियान्वित करने और चीड़ की पत्तियों को उठाने का काम युद्ध स्तर पर किए जाने की मांग की है.

इस बीच नैनीताल हाईकोर्ट में बागियों की सदस्यता को लेकर चल रही सुनवाई भी नौ मई तक के लिए टल गई. सूत्रों के मुताबिक बागियों के वकील को लेकर आ रहा हेलीकॉप्टर नैनीताल के जंगलों में लगी आग की वजह से बृहस्पतिवार को निर्धारित समय पर लैंड नहीं कर सका.

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