तमिलनाडु में 'फ़िल्म और सियासत शादी कर चुके हैं'

तमिलनाडु भारत का ऐसा राज्य है, जहां की राजनीति में फ़िल्मी सितारों का हमेशा से दबदबा रहा है. यहां तक कि बीते 50 साल में इस राज्य में वही मुख्यमंत्री बना, जो तमिल फ़िल्मों का भी चेहरा रहा.

पीएमके पार्टी के नेता अंबुमनि रामदॉस कहते हैं कि इस संस्कृति से राज्य और समाज का बड़ा नुक़सान हुआ है.

राज्य में 16 मई, 2016 को विधानसभा चुनाव है और इस दिन 234 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होगा.

सवाल है कि क्या इस बार भी फ़िल्मों से जुड़ा चेहरा ही सरकार का मुखिया बनेगा.

फ़िल्म इतिहासकार मोहन रमन बताते हैं, ''1967 से आज तक राज्य में केवल फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़ा शख़्स ही मुख्यमंत्री बना है.''

उनका कहना है कि इनमें सबसे मशहूर थे एमजी रामचंद्रन यानी मरुधुरू गोपालन रामचंद्रन, जो एमजीआर के नाम से ज़्यादा जाने जाते थे. उनकी विरासत संभालने वाली जयराम जयललिता इन दिनों मुख्यमंत्री हैं.

जयललिता से पहले राज्य में करुणानिधि का शासन था. उन्होंने अपना करियर तमिल फ़िल्मों में स्क्रीन राइटर के तौर पर किया था और वह 75 से भी ज़्यादा फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिख चुके हैं.

द्रमुक पार्टी के संस्थापक सी. अन्नादुरई भी कई तमिल फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिख चुके थे. 1967 में उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से तमिलनाडु में फ़िल्मी शख्सियतों के शासन का दौर शुरू हुआ, जो आज तक जारी है.

तमिल अभिनेता और कॉमेडियन टी. कार्तिक बताते हैं, ''हमारी संस्कृति ऐसी है कि हम हीरो को पूजते रहे हैं. यह हमारे जीवन का हिस्सा है. हम हर सप्ताह सुपर हीरो चाहते हैं और फ़िल्में हर सप्ताह आती हैं.''

जयललिता की चुनावी रैली में शरीक महिलाएं उनकी जबर्दस्त फैंस नजर आईं. एक ने कहा, ''जयललिता बहुत अच्छी अभिनेत्री रही हैं और मुख्यमंत्री के तौर पर भी अच्छा काम कर रही हैं. हम उन्हें ही वोट देते हैं.''

दूसरी महिला ने कहा, ''हम जयललिता को ख़ूब पसंद करते हैं और एमजीआर के साथ उनकी फ़िल्में भी हमें ख़ूब पसंद हैं.''

जयललिता की अन्नाद्रमुक पार्टी की सीआर सरस्वती राजनीति में आने से पहले अभिनय की दुनिया में ही थीं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''कोई अनजान आदमी अगर लोगों के बीच जाएगा तो उसे सुनने कोई नहीं आएगा. उसे जाकर लोगों को बताना होगा कि वह फलां है, फलानी पार्टी का उम्मीदवार है और उसे वोट चाहिए. लेकिन कोई फ़िल्म और टीवी अभिनेता चुनाव में उतरता है तो लोग उसके पास अपने आप आ जाते हैं.''

हालांकि फ़िल्मी दुनिया से आए लोगों के लिए राजनीति इतनी आसान भी नहीं होती.

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तमिलनाडु में कांग्रेस नेता और अभिनेत्री खुशबू कहती हैं, ''अभिनय से राजनीति में आना आसान है, पर वहां बने रहना और राजनेता बनना मुश्किल है. जब आप राजनीति में आते हैं तो आपको अपना ईगो छोड़ना पड़ता है. सिनेस्टार जैसे नखरे नहीं कर सकते. हमेशा फ़र्स्ट क्लास ट्रीटमेंट की उम्मीद नहीं कर सकते. यहां बैकहैंड कॉल पर 20 लोग नहीं होते हैं. ये सब आप छोड़ने के लिए तैयार हैं, तो स्वागत है.''

फ़िल्म इतिहासकार मोहन रमन तमिलनाडु की राजनीति में फ़िल्मी कलाकारों के इस दबदबे को एमजीआर के जादू से जोड़कर देखते हैं.

उन्होंने बताया, ''एमजीआर फ़िल्मों में सामान्य लोगों की भूमिका निभाते थे. ऐसी भूमिका जिसमें सामान्य लोगों का अपना स्तर बढ़ता नज़र आता था. हर बार उन्होंने आम आदमी के क़द को बढ़ाया.''

पीएमके के अबुमनि रामदॉस कहते हैं, ''दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ कि 50 साल के लंबे इतिहास में फ़िल्मी कलाकार ही शासन कर रहे हैं. मैं समझ नहीं पाता, ऐसा क्यों हैं? कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर सत्ता में क्यों नहीं आ पाता? या फिर कोई शिक्षित व्यक्ति क्यों नहीं? मैं यह जानना चाहता हूँ.''

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तमिल अभिनेता और कॉमेडियन टी. कार्तिक कहते हैं, ''मेरे राज्य की मनोरंजन पसंद करने वाली जनता को देखते हुए मुझे लगता है कि फ़िल्मी कलाकारों का राजनीति में दबदबा बना रहेगा.''

क्या ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा? इस बारे में मोहन रमन कहते हैं, ''तमिलनाडु में फ़िल्म जगत और राजनीति के बीच शादी जैसा बंधन है. तलाक़ अभी तक नहीं हुआ है. फ़िल्मी कलाकारों का दबदबा कब तक राज्य की राजनीति में बना रहेगा, अभी नहीं कहा जा सकता. लेकिन वे रहेंगे ज़रूर.''

मद्रास की सड़क पर एक युवा ने जो कहा, उस पर तो हमें यकीन ही नहीं हुआ. उसने कहा, ''तमिलनाडु में लोग फ़िल्मी कलाकारों को ख़ूब पसंद करते हैं, यहां तक कि अपने माता-पिता से भी ज़्यादा.''

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