'हम फ़ाइन आर्ट थोड़े हैं जो घालमेल करें'

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"मिथिला पेंटिंग तो हमारे जीवन का आधार है, यही भ्रष्ट हो जाएगी तो हम गरीब हो जाएगें," 92 साल की कर्पूरी देवी जब ये कहती हैं तो बेचैनी उनकी आवाज के साथ साथ आंखों में भी साफ़ झलकती है.

कर्पूरी देवी मिथिला चित्रकला की कलाकार है. इसी कला के सहारे वो मधुबनी स्थित अपने गांव रांटी से बाहर निकली और दुनिया घूमीं.

लेकिन मिथिला पेंटिंग में हाल के सालों में हो रहे प्रयोग पुराने कलाकारों को परेशान कर रहे है.

राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजी गई ये कलाकार पूछती हैं, “मैं पूरी दुनिया घूम आई, लेकिन कपड़ा पहनने का ढंग नहीं बदला, पति का नाम कभी जुबान पर नहीं आया, फिर मिथिला चित्रकला में बदलाव क्यों?"

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Image caption बऊवा देवी, मिथिला पेटिंग्स की कलाकार

कर्पूरी देवी जैसी ही बेचैनी 73 साल की बउआ देवी में दिखती है. अप्रैल 2015 में अपनी जर्मनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेयर स्टीफ़न शोस्तक को बउआ देवी की पेंटिंग ही उपहार में दी थी. बउआ देवी को इसकी जानकारी बहुत बाद में मिली.

नाग नागिन के अपने पैटर्न के लिए मशहूर बउआ कहती हैं, "हम कोई फ़ाइन आर्ट थोड़े ही ना कर रहे हैं जो घालमेल कर दें. मेरी मिथिला पेंटिंग अलग है, उसे अलग ही रहने दें. अलग रहेगी तभी उसकी पहचान भी रहेगी."

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मिथिला पेंटिंग बिहार के मधुबनी और दरभंगा ज़िलों के अलावा नेपाल के कुछ इलाक़ों की प्रमुख लोक कला है.

पहले इसे घर की महिलाएं दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से इसे बनाती थी. हल्दी और केले के पत्ते, गाय के गोबर, सिन्दूर, पीपल की छाल के इस्तेमाल से रंग बनाए जाते थे.

मिथिला पेंटिंग के विषय राम सीता विवाह, विवाह की रीतियां, देवी देवताओं की तस्वीर, पेड़-पौधे ही होते थे.

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Image caption मिथिल पेंटिग 'नाग नागिन'

पहले सिर्फ ब्राहम्ण और कायस्थ महिलाएं ही ये पेंटिंग किया करती थीं, लेकिन बाद में और जातियों के चित्रकार भी इस विधा से जुड़ते चले गए.

चूंकि पेंटिंग धर्म के इर्द-गिर्द बुनी हुई है, इसलिए हर प्रयोग पर विरोध होना भी तय है.

मीनाक्षा झा बैनर्जी को कुछ ऐसा ही विरोध झेलना पड़ा जब उन्होने यूनीसेफ के प्रोजेक्ट 'वॉटर एंड सैनीटेशन' में मिथिला पेंटिंग का इस्तेमाल किया.

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Image caption पारंपरिक मिथिला पेंटिग 'राम सीता'

मीनाक्षी ने बीबीसी से कहा, "कुछ कलाकारों को इस बात को लेकर परेशानी थी कि स्वच्छता के विषय पर मिथिला आर्ट क्यों? उनका कहना था कि अब इन सबमें भी मिथिला का इस्तेमाल होगा? ऐसा ही विरोध मुझे तब भी झेलना पड़ा जब 1998 में मैनें पहली बार मिथिला पेंटिंग को प्रिंट कराकर ग्रीटिंग कार्ड छपवाया था.”

ऐसा ही विरोध अलका भी झेलना पड़ रहा है. उन्होने गदर आंदोलन को 16 मिथिला पेंटिंग के सहारे चित्रित किया है.

रिसर्चर भैरव लाल दास की किताब 'गदर आंदोलन का इतिहास' के आधार पर बनाई गई इन पेंटिंग्स की प्रदर्शनी साल 2014 में कैलीफोर्निया में भी लग चुकी है.

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Image caption पांरपरिक मिथिला पेंटिग 'काली'

अलका बताती है, "पुराने कलाकार कहते है कि ये गांव की कला है. उसमें गदर या लड़ाई, झगड़ा जैसा विषय नहीं आना चाहिए. उन विषयों पर पेंटिंग को अच्छी नज़रों से वो लोग नहीं देखते.”

पुराने कलाकारों में बेचैनी सिर्फ नवीन प्रयोगों को लेकर ही नहीं, बल्कि मिथिला चित्रकला की हो रही नकल को लेकर भी है.

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शांति देवी पासवान जाति की हैं. वे राजा सहलेस की कहानी को चित्रित करती हैं.

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Image caption मिथिला पेंटिग आधुनिक रूप में- कार पर पेटिंग

वे शिकायती लहेज़े में कहती है, "भारत में आप किसी भी मेले में चले जाएं, मिथिला चित्रकला के पैटर्न की नकल आपको मिल जाएगी. आप हमें यानी मौलिक कलाकार को काम दीजिए. अपना बजट बताइए, हम उसी में आपको काम करके देंगें. लेकिन कोई इसके लिए तैयार नहीं. बस ब्लॉक प्रिंट तैयार कर लिया और हो गई मिथिला कला तैयार."

इन सबके बीच मीनाक्षी झा बीच का रास्ता सुझाती है. वे कहती हैं, "किसी भी विधा में प्रयोग होना ज़रूरी है. बाज़ार में देखें तो खरीददार भी बदलाव चाहता है. लेकिन धरोहर को बचाने का सवाल भी उतना महत्वपूर्ण है. ऐसे में बाजार के साथ तालमेल बैठाने वाले और पारंपरिक कलाकार दोनों ही जरूरी है."

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Image caption पारंपरिक मिथिला पेंटिग्स

रिसर्चर भैरव लाल दास इससे भी आगे जाकर कहते हैं, "मिथिला पेंटिंग में प्रयोग को लेकर हो रहा ये स्यापा बेकार है. ये महिलाएं 1965 के बाद का इतिहास बता रही है जबकि इस पेंटिंग का आधार तिब्बतन थंका पेंटिंग है. 1934 का भी जब भूकंप आया तो उस वक्त भी भूकंप से मची तबाही को मिथिला के सहारे उकेरा गया था."

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