बुंदेलखंड भुखमरी की कगार पर: योगेंद्र यादव

स्वराज अभियान से जुड़े आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता योगेंद्र यादव ने कहा है कि बुंदेलखंड भुखमरी की कगार पर है और सूखे से देश के क़रीब 43 करोड़ लोग प्रभावित हैं.

दिल्ली में किसानों के एक सम्मेलन में बोलते हुए योगेंद्र यादव ने कहा, “वहां पीने के पानी का बड़ा संकट है. हमने पांच महीने पहले उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड और तीन महीने पहले मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड का सर्वे किया था. दोनो सर्वे बता रहे हैं कि वहां लोग दाल नहीं खा रहे हैं, बच्चों को दूध नहीं दे पा रहे हैं. सूखे से अकाल की जो यात्रा है, उसमें बुंदेलखंड अकाल के सबसे नज़दीक है. वहां जानवरों के लिए अकाल आ चुका है.”

विभिन्न राज्यों का दौरा करके लौटे योगेंद्र यादव ने कहा, “बुंदेलखंड में खाने की, चारे की, ज़बरदस्त कमी है. एक बड़े क्षेत्र में चारा ख़त्म हो गया है. इसके अलावा किसानों की फ़सले बरबाद हो गई हैं.”

पिछले कुछ महीनों से जारी सूखे से देश के कई बड़े हिस्से जैसे बुंदेलखंड, मराठवाड़ा आदि बुरी तरह प्रभावित हैं और लोग इन इलाक़ों को छोड़कर भाग रहे हैं.

स्वराज अभियान के सदस्य बताते हैं कि किसानों से बात करें तो वो बार-बार सवाल उठाते हैं कि क्या सरकार भीषण सूखे से पैदा हुए हालात को समझ भी पाई है.

बुंदेलखंड के डॉक्टर कुलदीप कुमार दलित हैं. वो कहते हैं कि सूखे से दलित सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं क्योंकि उनके पास न ज़मीन है, न कमाने के साधन.

डॉक्टर कुलदीप कहते हैं, “उस इलाक़े में छुआछूत इस क़दर हावी है कि अगर दलित समाज का एक आदमी आलू उगाए और उसे अपने गांव में बेचे, तो कोई उसका आलू भी नहीं ख़रीद सकता है.”

तेलंगाना से आए एक किसान ने चिंता जताई कि राज्य में बटाई पर काम करने वाले मात्र तीन प्रतिशत किसानों के पास ही पहचान पत्र हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि सूखे से सरकारी मनरेगा कार्यक्रम पर भी असर पड़ा है क्योंकि “ज़मीन सूखकर इतनी कड़ी हो गई है कि ज़्यादा उम्र के लोग ज़मीन को खोद भी नहीं पाते हैं.”

छत्तीसगढ़ के किसान नेता ठाकुर रामगुलाम सिंह ने आरोप लगाया कि वहां किसानों की ज़मीन छीनकर उद्योगपतियों को दी जा रही है और पानी की भी भारी कमी हो गई है.

हरियाणा के किसान रमेश कुमार ने बताया कि राज्य में इस साल पानी बरसा ही नहीं है और राजस्थान से लगे इलाकों, खासकर भिवानी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ में स्थिति बेहद ख़राब है.

रमेश कुमार कहते हैं, “अगर आने वाले एक दो साल यही हालात रहे और अगर सरकार ने कोई क़दम न उठाए तो हरियाणा के हालात महाराष्ट्र के लातूर और यूपी-मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड़ से भी बदतर हो जाएंगे. अगर हरियाणा में ड्रिप सिंचाई व्यवस्था को नहीं अपनाया गया तो वहां खेती करना मुश्किल हो जाएगा.”

लेकिन इस साल हालात इतने ख़राब क्यों हुए हैं?

योगेंद्र यादव ने बताया, “पिछले साल भी सूखा पड़ा, इस साल भी सूखा पड़ा. इन दो सूखों के बीच जो एक अच्छी फ़सल रबी की हो सकती थी, उस समय ओले गिर गए. देश के बड़े इलाक़े में तीन या चार फ़सल बरबाद हो चुकी हैं.”

किसानों को मिलने वाले मुआवज़े पर योगेंद्र यादव ने कहा कि जो फ़सल छह महीने पहले बरबाद हो गई थी, एक दो राज्यों में उसका मुआवज़ा मिलना शुरु हुआ है और “उत्तर प्रदेश में पिछले साल की ओलावृष्टि का भी मुआवज़ा पूरा नहीं दिया जा सका है.”

वरिष्ठ पत्रकार और कृषि पर सालों से लिखते रहे पी साइनाथ ने मीडिया की आलोचना करते हुए कहा कि मीडिया सूखे को किसी “आयोजन” की तरह कवर कर रहा है.

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