बाई न मिली तो छात्रों ने बनाया 'बुक माय बाई'

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बचपन में ही मां-बाप की मृत्यु होने के बाद सोनिया दिवाटे को ना अच्छी शिक्षा मिली, ना परवरिश. रिश्तेदारों के भरोसे बड़ी हो रही सोनिया, बारह साल की थी तब से लोगों के घरों में छोटे मोटे काम करने लगी.

लेकिन ‘बुक माय बाई’ वेबसाइट ने सोनिया की ज़िंदगी बदल दी. आज 25 साल की सोनिया मुंबई में अपने पैरों पर खड़ी है और एक अच्छे घर में बेबी सिटर यानी आया का काम करती है.

सोनिया ने बीबीसी को बताया, “मेरी कमाई मुझ से छीन ली जाती थी, बहुत ज़्यादा काम करवाया जाता था लेकिन मैं और करती भी क्या? वैसे भी काम मिलना आसान नहीं हैं, क्योंकि लोगों को भरोसा नहीं आता. अगर काम मिल भी जाता है तो पैसे कम मिलते हैं. लेकिन अब मुझे यहां से तालीम और नौकरी दोनों मिलीं. एजेंसी के ज़रिए नौकरी मिलने से पगार में कम से कम 30 प्रतिशत का फ़ायदा होता है.”

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सोनिया दूसरे फ़ायदे भी बताती हैं, “अगर काम पर मालिक का बर्ताव बुरा हो, वेतन ठीक से न दिया जाए तो एजेंसी से हमें मदद मिलती है. काम के अलावा अगर कोई व्यक्तिगत समस्या हो तो भी हमें ऑफ़िस से सहायता मिलती है. हमारे कामों में बीमा, मेडिक्लेम या प्रोविडंड फ़ंड, लोन जैसी योजना की तो कल्पना भी नहीं कि जा सकती लेकिन हमें वह लाभ भी मिलते हैं. दूसरी एजेंसी में हमें नौकरी मिलने पर ख़ासा कमीशन देना पड़ता है. जबकि ‘बुक माय बाई’ में हमसे पैसे नहीं लिए जाते.”

‘बुक माय बाई’ वेबसाइट से घर के काम, बेबी सिटिंग, कुकिंग, नर्सिंग वगैरह कामों के लिए बाई ढूंढी जा सकती है. 30 साल के अनुपम सिंहल और 33 साल के विकास चौधरी ने ‘बुक माय बाई’ सर्विसेज शुरू करने के बारे में तब सोचा जब उन्हें अपने घरों के लिए बाई ढूंढने में बहुत दिक्कत हुई.

उन्होंने ऐसी सेवाएं देने वाली एक एजेंसी को संपर्क किया, पैसे जमा किए और फिर जैसे वह एजेंसी गायब हो गई.

अनुपम बताते हैं, “तब हमें लगा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें कॉरपोरेट जैसा व्यवस्था चाहिए. हर घर में बाई की या नौकर की ज़रूरत होती ही है. अगर इस ज़रूरत को सिस्टम में ढाला जाए तो समाज के दो हिस्सों को सहायता हो सकती है. पिछड़े वर्ग के लोगों के साथ होने वाला आर्थिक और सामाजिक भेदभाव भी कम होता है.”

अनुपम और विकास दोनों कम्प्यूटर साइंस के छात्र हैं. दोनों के लिए यह काम बिलकुल अलग था. नौकर रखने वाले और नौकरी करने वाले दोनों वर्गों में भरोसा पैदा करना उनके लिए बड़ा चैलेंज था.

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अनुपम ने कहा, “ये काम करने के इच्छुक लोगों का डेटा बेस तैयार करना और मुश्किल था क्योंकि ज़्यादातर लोगों के पास डॉक्यूमेन्ट्स नहीं होते, वह तकनीक को नहीं समझते और असुरक्षा महसूस करते हैं. काम पर रखने वालों को भी विश्वास होना चाहिए कि हमारी सेवाएं सुरक्षित और विश्वसनीय हैं.”

जुहू की सुष्मिता दालमिया खुद का बिज़नेस संभालती हैं. वह मां बनने वाली थीं और उन्हें एक हेल्पर की ज़रूरत थी.

उन्होंने कहा, “मैंने अब तक ‘बुक माय बाई’ से कुक, हेल्पर और घर के काम के लिए एक बाई को नौकरी पर रखा है. आजकल जिस तरीके से क्राइम बढ़ रहा है मैं नहीं चाहूंगी कि कोई भरोसा का आदमी या औरत ही मेरे घर में आए. घर में लंबे समय तक काम करने वाला व्यक्ति भरोसेमंद होना चाहिए और सुरक्षा के नज़रिए से मैं एजेंसी की मदद लेना ही पसंद करूंगी.”

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एक साल से चल रहे इस सोशल इंपैक्ट स्टार्टअप की सेवाओं के लिए 80,000 लोग पूछताछ कर चुके हैं और उन्होंने 30,000 घरों में बाई को नौकरी दिलवाई है. 2016 के संकल्प ग्लोबल समिट में यह स्टार्ट अप, एवॉर्ड्ज़ के पंद्रह फ़ाइनलिस्ट में से एक था.

इस साल अब तक 1200 बाई को वह अच्छी नौकरी दिलवा चुके हैं और वर्षांत तक और 10,000 को नौकरी दिलवाना चाहते हैं. यह सेवा मुंबई, पूणे, अहमदाबाद और बेंगलुरु में दी जा रही है. स्टार्ट अप चलाने वालों को भरोसा है कि 2018 तक कम से कम एक लाख बाई को रोज़गार दिला पाएंगे.

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