सिंहस्थ में दलितों के अलग से स्नान पर बवाल

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उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ में राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ (आरएसएस) से जुड़े एक संगठन की ओर से आयोजित समरसता और शबरी स्नान को लेकर विवाद पैदा हो गया है.

आरएसएस से जुड़ी संस्था पंडित दीनदयाल विचार प्रकाशन ने 11 मई को समरसता स्नान और शबरी स्नान का आयोजन किया है.

इसका आयोजन कुंभ के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए अलग से किया जा रहा है.

जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती ने भाजपा से पूछा है कि 'समरसता स्नान के ज़रिए पार्टी नौटंकी क्यों कर रही है?'

इस आयोजन में भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के भी शामिल होने की संभावना है.

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लेकिन शंकराचार्य ने कहा, "किसी भी नदी ने कभी किसी की जाति नहीं पूछी है और न ही किसी ने दलितों को इसमें स्नान करने से रोका है."

उन्होंने यह भी कहा, “इतने दिनों से चल रहे सिंहस्थ में दलितों को किसी ने नही रोका, तो फिर भाजपा अध्यक्ष का कुंभ में दलितों के साथ नहाना दिखावा और नौटंकी ही है. इससे भेदभाव ही बढ़ेगा.”

वहीं पंडित दीनदयाल विचार प्रकाशन ने ये कहा है कि इस स्नान के लिए अनुसूचित जाति / जनजाति वर्ग के जनप्रतिनिधि (सरपंच से सांसद तक), सेवानिवृत्त अधिकारी और समाज के साधु-संतों को सूचीबद्ध किया जाए.

वहीं कांग्रेस ने भी इस आयोजन पर आपत्ति जताई है. प्रदेश कांग्रेस के विचार विभाग ने आरोप लगाया है कि दीनदयाल विचार प्रकाशन के ज़रिए भाजपा सिंहस्थ के दौरान राजनीतिकरण और समाज में विषमता फैलाने का प्रयास कर रही है.

प्रदेश कांग्रेस विचार विभाग के प्रदेशाध्यक्ष भूपेंद्र गुप्त ने सरकार से सवाल किया, “क्या दीनदयाल प्रकाशन कोई धार्मिक संस्था है. अगर नहीं तो शासकीय व्यय पर विशिष्ट स्नान आयोजित करने की अनुमति किस आधार पर दी गई.”

उन्होंने यह भी कहा कि जिस देश में “जाति ना पूछो साधु की” का दर्शन युगों से मान्य है, वहां जाति के आधार पर दलित संतों की खोजबीन और अलग से स्नान पूरी तरह से संविधान के ख़िलाफ़ है.

उन्होंने कहा कि यह लोगों को बांटने वाला काम है.

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