'चरमपंथी हमलों से ज़्यादा लोग कुत्ते से मरते हैं'

भारत का एक आवारा कुत्ता इमेज कॉपीरइट AFP

भारत के सबसे रईस शहरों में से एक मुंबई ने इस साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पिछले 20 साल में मुंबई में कुत्तों के काटने से जितनी मौतें हुई हैं, उतनी तो 1993 के सीरियल बम धमाकों और 2008 में चरमपंथी हमले में भी नही हुईं.

सुप्रीम कोर्ट में मुंबई नगर निगम की याचिका के मुताबिक़ वर्ष 1994 से 2015 के बीच 434 लोगों की मौत रैबीज़ से हुई. यह एक जानलेवा वायरस है जिससे बचना 100 फ़ीसदी तक संभव है.

इसकी तुलना में ऊपर बताए गए दोनों चरमपंथी हमलों में कुल 422 लोगों की मौत हुई थी.

याचिका के मुताबिक़ 1994 से 2015 के बीच 13 लाख लोगों को कुत्तों ने काटा था.

जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि चरमपंथी हमलों के साथ ये तुलना ख़तरनाक अतिश्योक्ति है. लेकिन सवाल यह है कि जिस देश की अदालतों में 3 करोड़ मामले लंबित हों, वहां की शीर्ष अदालत आवारा कुत्तों और रैबीज़ के मामलों से जूझ रही है.

इसकी वजह साफ़ है. भारत में 3 करोड़ आवारा कुत्ते हैं और 20 हज़ार लोग हर साल रैबीज़ से मर जाते हैं. पिछले साल ग्लोबल अलायंस फ़ॉर रैबीज़ कंट्रोल की ख़बर थी कि भारत में रैबीज़ से मरने वाले इंसानों की दर 35 फ़ीसद है, जो अन्य किसी भी देश से ज़्यादा है.

इनमें से बहुत सी मौतों के लिए आवारा कुत्तों को ज़िम्मेदार माना जाता है. पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को उस आदमी को 40 हज़ार रुपए का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था, जिसकी बीवी की मौत कुत्ते के काटने के बाद रैबीज़ से हुई थी.

अधिकारियों का कहना है कि केरल के 10 लाख कुत्तों में से एक तिहाई आवारा हैं. पिछले साल वहां जिन 23,000 लोगों को इन कुत्तों ने काटा था, उनमें से आधों को रैबीज़ हो गया था.

वहीं भारत प्रशासित कश्मीर के स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार 2008 से 2012 के बीच 50 हज़ार से ज़्यादा स्थानीय लोगों को कुत्तों ने काट लिया. इनमें से एक दर्जन लोगों की रैबीज़ से मौत हो गई.

आदमी और जानवर के बीच संघर्ष बढ़ रहा है. जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि पैसे की कमी से जूझते नगर निगमों और गुस्साए लोग आवारा कुत्तों की आबादी कम करने के लिए उन्हें पीट रहे हैं, डंडों से मार रहे हैं, ज़हर दे रहे हैं, गोली मार रहे हैं और करंट लगा रहे हैं.

पिछले साल केरल और तमिलनाडु में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या से परेशान ग्राम परिषदों ने आवारा कुत्तों को मारने का आदेश दिया. फिर स्थानीय निवासियों ने कुत्ता पकड़ने वालों को बुलाया. वे कुत्तों को पोटेशियम साइनाइड के इंजेक्शन लगाकर मारने लगे.

इमेज कॉपीरइट EPA

वर्ष 2012 में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ने पर पंजाब के एक जनप्रतिनिधि ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि कुत्तों को चीन और उत्तर-पूर्व के राज्यों में भेज दिया जाना चाहिए, जहां कुछ जगह कुत्तों को खाया भी जाता है.

एक संसदीय समिति दरअसल दिल्ली में सांसदों के रिहायशी इलाक़ों में कुत्तों को नियंत्रित किए जाने का विस्तृत अध्ययन कर रही है.

भारत में कुत्तों को मारना वर्ष 2001 से ग़ैरक़ानूनी है. लेकिन यह क़ानून मुंबई और केरल के स्थानीय प्रशासन को आवारा कुत्तों को मारने की सिफ़ारिश करने से नहीं रोक पाया.

वर्ष 2008 में मुंबई हाई कोर्ट ने पालिका अधिकारियों को ऐसी जगह कुत्तों को मारने की इजाज़त दे दी जहां वह 'उत्पात कर रहे थे'. सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस आदेश को निलंबित कर दिया. तब शीर्ष अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों को मारा नहीं जाएगा और बड़े पैमाने पर कुत्तों के बधियाकरण (नपुंसक बनाने) का आदेश दिया.

लेकिन क्या आवारा कुत्ते ही इंसानों को काटने के लिए ज़िम्मेदार हैं?

इसके उदाहरण मिलेजुले हैं. पिछले साल केरल के एक अस्पताल में किए गए अध्ययन से पता चला कि 75 फ़ीसदी लोगों को पालतू कुत्तों ने काटा था और मात्र 25 फ़ीसदी ही आवारा कुत्तों के शिकार बने थे. साल 2013 में तमिलनाडु के 13 स्कूलों के एक अध्ययन में पता चला कि विद्यार्थियों को जिन कुत्तों ने काटा था, उनमें से आधे से ज़्यादा पालतू थे.

इमेज कॉपीरइट AP

लेकिन ज़्यादातर लोगों का मानना है कि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या ही इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार है. मुंबई नगर पालिका की 'कुत्तों के उत्पात'' नाम की रिपोर्ट' में कहा गया है कि उसने वर्ष 1994 से 2015 के बीच आवारा कुत्तों के लोगों को काटने के एक लाख मामले दर्ज किए हैं.

लेकिन दुनिया भर में जानवरों की सुरक्षा के लिए काम करने वले ह्यूमन सोसायटी इंटरनेशनल (एचएसआई) जैसे समूहों का मानना है कि भारत में आवारा कुत्तों के मुद्दे को ज़्यादा ही हवा दी जा रही है.

समूह के अध्यक्ष एंड्रू रोवान कहते हैं, "भारत में 100 लोगों पर आवारा कुत्तों का अनुपात करीब 3.5 है. इसकी तुलना में अमरीका, ब्रिटेन और दक्षइणी अमरीका में 100 लोगों पर 25 कुत्तों का अनुपात है. मैं कहूंगा कि इस हिसाब से भारत में कुत्तों की समस्या दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में काफ़ी कम है."

लेकिन यह भी सच है कि भारत में बहुत से आवारा कुत्तों का कोई मालिक होता है 'जो आमतौर पर उनके लिए खाने-पीने का इंतज़ाम करता है और कई बार तो इलाज भी करवाता है'.

बहुत से भारतीय परिवार आवारा कुत्तों को खाना देते हैं और अपने घरों में ले जाते हैं. कूड़े को आवारा कुत्तों के प्रसार की वजह बताया जाता है.लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कूड़े में 'इतनी कैलौरी नहीं होती' कि उससे आवारा कुत्ते ज़िंदा रह सकें.

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya

यह साफ़ है भारत में आवारा कुत्तों का बधियाकरण कार्यक्रम बहुत शिथिल है. इसके लिए ज़िम्मेदार जटिल अफ़सरशाही, जिसमें कई मंत्रालय शामिल होते हैं और बहुत मामूली सी धनराशि है.

एचएसआई हर महीने हरियाणा में पांच हज़ार कुत्तों के बधियाकरण का कार्यक्रम का संचालित करती है. इसके लिए पैसा स्वास्थ्य विभाग देता है. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. जयपुर में बड़े पैमाने पर बधियाकरण के अच्छे परिणाम मिले हैं.

राज्यों में सिक्किम एक अपवाद है जहां सरकार प्रायोजित सफल बधियाकरण कार्यक्रम के परिणामस्वरूप आवारा कुत्तों को बधिया कर, रैबीज़ मुक्त राज्य बन गया है.

एक कुत्ते के बधियाकरण की लागत एक हजार रुपए है. इसे तेज़ी से करना होता है ताकि उनकी आबादी पर नियंत्रण लगाया जा सके. उदाहरण के लिए मुंबई नगर पालिका का अनुमान है कि शहर के एक लाख से ज़्यादा कुत्तों के बधियाकरण में 13 साल लगेंगे.

स्वास्थ्य अधिकारी नीलम एस कदम कहती हैं, "सिर्फ़ बधियाकरण से ही कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण लगा पाना मुश्किल है."

भारत को आवारा कुत्तों के किफ़ायती वैक्सीनेशन और बधियाकरण की ज़रूरत है.

इमेज कॉपीरइट K V LAKSHMAN

रोवान कहते हैं, "पूरी कुत्ता आबादी में बड़े पैमाने पर रैबीज़ वैक्सीनेशन और मादा कुत्तों का बधियाकरण ही एक मात्र उपाय है".

लंबे समय से भारत में आवारा घूमते कुत्तों पर नियंत्रण के लिए ख़राब ढंग से प्रशिक्षित कर्मचारी उन्हें क्रूरतापूर्वक मारते रहे हैं. ज़्यादातर लोगों का मानना है कि अब यह रुकना चाहिए.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार