निर्भया से कितनी अलग है 'जीशा' की कहानी

केरल की वो दलित महिला जिसके शरीर पर 'निर्भया' जैसी यातनाओं और बर्बरता के सबूत मिले हैं, उसके मन का एक हिस्सा तो इस हिंसक हमले के पहले ही घायल हो गया था.

केरल के पेरंबवूर में 29 साल की एक दलित महिला से बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई. मीडिया की नज़र में उसकी कहानी भले ही 28 अप्रैल को आई हो पर उस कहानी का एक अहम पन्ना बहुत पहले ही पलट चुका था.

जीवन से भरी एक लड़की, जो शास्त्रीय नृत्य में इतनी पारंगत थी कि बच्चियों को सिखाती थी और छोटी-मोटी फ़िल्मों में डांस ग्रुप के साथ हिस्सा भी ले चुकी थी, औरत बनने तक एकदम बदल क्यों गई?

जब उस पर हमला हुआ तो सबने उसकी चीखों को अनसुना क्यों कर दिया?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए पेरंबवूर के उनकी गांव की गलियों से गुज़रना होगा. बंद खिड़की और दरवाज़ों को खटखटा कर चुप बातों को आवाज़ देनी होगी.

उनका घर एक नाले से सटा है, उसमें पानी का नल और शौचालय नहीं है, यह सब उस परिवार की ग़रीबी की कहानी बयान करता है.

पीने के पानी के लिए अक़्सर उन्हें या तो कुंए या दूर लगे सरकारी नल से पानी भरने जाना पड़ता था.पर इस सबके बावजूद ये परिवार खुशहाल था. वो और उसकी बड़ी बहन, दोनों को पूरी पढ़ाई करने का मौका मिला था.

Image caption साबू पी.एम. भी केरल के निर्भया की तारीफ़ करते नहीं थकते.

सामने के घर में रहने वाले साबू पी.एम. के मुताबिक़ वो बहुत मेहनती थी. वो बताते हैं, ''एक बार किसी मामले में पुलिस यहां आई तो वो बड़े गर्व से उन्हें बोली कि देखिएगा आप, मैं एक दिन बड़ी व़कील बनकर दिखाउंगी.''

मोहल्ले में मशहूर थी वो. भरतनाट्यम में बहुत अच्छी थी और बहन के साथ ही बच्चों को सिखाने और फ़िल्मों में काम कर रही थी.

उनके परिवार को पहला झटका तब लगना चाहिए था, जब पिता ने घर छोड़ दिया. लेकिन उनकी मां घबराई नहीं, औरों के घर में झाड़ू-पोछा कर दोनों बच्चियों को बड़ा करती रहीं. शायद हौसला अपनी मां से ही मिला उसे. अपनी हैसियत या कम संसाधनों को परे रख कुछ कर जाने का जज़्बा.

रोज़ी देवास्सी अक़्सर उसे पानी भरते व़क्त मिल जाती थीं. वो कहती हैं, ''उसके मन में बस एक बात थी कि करियर में नाम रौशन करूं और अपना घर-परिवार बनाकर मां को अच्छे से रख सकूं.''

लेकिन उनकी इस सीधी सपाट ज़िंदगी में तब झटका लगा जब बड़ी बहन 16 साल की उम्र में घर छोड़कर अपने प्रेमी के साथ भाग गईं.

प्रेमी दलित ही था पर उप-जाति अलग थी, ना भागते तो शादी ना होती. फिर हो गई, एक बच्चा भी हुआ. लेकिन प्रेमी ने बहन को छोड़ दिया.

इस पूरी घटना ने मां को दहला दिया. रोज़ी बताती हैं, ''एक डर बैठ गया था कि कहीं दूसरी बेटी के साथ भी ऐसा ना हो जाए, एक मां होने के नाते वो बहुत असुरक्षित महसूस करने लगी थीं.''

Image caption रोज़ी देवास्सी केरल के निर्भया के पड़ोस में रहती थीं, उनके मुताबिक वह अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहती थी.

बड़ी बहन के उस एक कदम ने इसका जीवन हमेशा के लिए बदल दिया. आसपास वालों से बातचीत बंद हो गई. नृत्य सिखाने या किसी शो में हिस्सा लेना तो दूर की बात थी.

हर शख़्स पर मां की शक़ की निगाह रहती थी. हंसती मुस्कुराती आवाज़ मानो गले में ही रुंध के चुप हो गई थी.

दो साल पहले इस गांव में आए एक और दलित परिवार की अंबिका कुंजीमोन बताती हैं कि उन्होंने कभी उसे किसी से बात करते नहीं देखा.

वो कहती हैं, ''हमारे घर के ठीक सामने ये सरकारी नल है पर वो कभी कुछ नहीं बोली, ना हमसे कुछ मांगा, हम भी कुछ नहीं कहते कहीं हमारी नीयत पर ही सवाल न उठ जाए.''

साबू के मुताबिक उसके और उसकी मां के झगड़े आम हो चले थे, घर से अक़्सर ऊंची-ऊंची आवाज़ें सुनाई देतीं थीं.

28 अप्रैल की शाम भी आवाज़ें आईं थीं. वो बताते हैं, ''मैं और कुछ साथी नाले के बंड पर बैठे थे, चीखने की आवाज़ें आनी शुरू हुईं तो हमने अनसुनी कर दीं, बहुत देर बाद मन में ख़्याल आया कि एक बार देख लें.''

साबू अपने घर पहुंचे तो उसकी मां दरवाज़े पर थीं और पागलों की तरह रो रही थीं. सब हो चुका था.

मेडिकल कॉलेज के मेडिकल अफ़सर के मुताबिक़ पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि किसी तेज़ हथियार से उसकी आंतों को बाहर निकाला गया, उसके शरीर पर चाक़ू के 30 निशान थे और सीने में दोधारे हथियार के घाव मिले.

एक औरत ने मुझसे कहा कि ये दो मौतें हुई हैं, एक उसकी अपनी, बेहद निर्मम और हिंसक तरीके से और एक उसकी मां की, जिनका एक सादी सी ज़िंदगी का सपना चुपचाप दम तोड़ गया है.

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