नीतीश क्यों नहीं बन पाएंगे अगले पीएम?

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'ज़हरीली शराब से 136 लोगों की मौत'. ये हेडलाइन 2009 की है और मामला गुजरात का है. पाकिस्तान की तरह शराब मुक्त गुजरात में मौत की ऐसी ख़बरें नई बात नहीं हैं.

बिहार में भी इस तरह मौतों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

और ऐसा हो भी चुका है. अप्रैल के अंतिम हफ़्ते में बिहार में दो अलग-अलग घटनाओं में ज़हरीली शराब पीने से चार लोगों की मौत हो गई थी.

अगर ऐसी घटना बिहार में बड़े पैमाने पर होती हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पूर्ण शराबबंदी की नीति को दोष दिया जाएगा.

लेकिन लग रहा है कि नीतीश कुमार एक तरह से पूरे देश में शराब निषेध अभियान चलाने की कोशिश कर रहे हैं. झारखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों में महिला संगठनों ने उन्हें आमंत्रित भी किया है.

वैसे उनकी ये कोशिश किसी दिन बुरी तरह नाकाम हो सकती है .

पिछले दशक में जो सबसे बड़े राजनीतिक बदलाव हुए हैं, उनमें से महिला मतदाताओं का एक ताक़त के तौर पर उभरना भी शामिल है.

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बिहार में नीतीश कुमार ने उन पर ध्यान दिया और इसीलिए चुनावों में उनकी जीत में महिला मतदाताओं का अहम योगदान रहा.

यही कारण है कि नीतीश कुमार की अपनी जाति कुर्मी के महज़ चार फीसदी वोट होने के बावजूद वो लगातार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने.

लगातार तीसरी बार और कुल पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार 2019 में देश के अगले प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं.

इसमें कोई बुराई भी नहीं है कि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और तीन बार मुख्यमंत्री बनने वाला व्यक्ति ऐसी महत्वकांक्षा रखे.

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वैसे भी मोदी के आने के बाद चुनावों का चेहरा बदला है जहां एक व्यक्ति को आगे रख कर चुनाव लड़े जा रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे अमरीका मेें राष्ट्रपति पद का चुनाव होता है.

अगर तीन बार गुजरात का मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तो बिहार का तीन बार का मुख्यमंत्री क्यों नहीं प्रधानमंत्री बन सकता.

फर्क बस इतना है कि बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है. उसके अलावा, सिर्फ़ कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसका देश भर में असर है.

वैसे बीजेपी को आरएसएस का समर्थन भी प्राप्त है जिसके कार्यकर्ता उसे चुनाव जिताने के लिए ख़ूब मेहनत करते हैं.

कांग्रेस का देश के विभिन्न हिस्सों में आधार है जिसकी वजह ऐतिहासिक रही हैं. अरुणाचल प्रदेश से लेकर केरल तक उसकी मौजूदगी है.

वहीं, नीतीश कुमार की पार्टी का बिहार के बाहर कोई अस्तित्व नहीं है. यही नहीं, संगठन के तौर पर बिहार में भी जनता दल यूनाइटेड बहुत कमज़ोर है.

नीतीश एक चतुर राजनेता हैं जिन्होंने तीन बार लगातार बिहार में सत्ता हासिल की है. लेकिन उन्होंने कभी भी 'चुनाव पूर्व गठबंधन' के बिना जीत दर्ज नहीं की.

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2019 में नीतीश को कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल के साथ अपना गठबंधन जारी रखना पड़ेगा.

2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे के हिसाब से देखें तो नीतीश कुमार की पार्टी को अगले आम चुनावों में राज्य की कुल 40 लोकसभा सीटों में से 17 सीटें मिल सकती हैं.

अगर जेडीयू सभी 17 सीटें जीत भी जाती हैं तो भी क्या कोई 17 लोकसभा सीटों के साथ भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है?

महज़ तीन साल में नीतीश कुमार एक पार्टी संगठन खड़ा नहीं कर सकते और बिहार के बाहर अपनी पार्टी की उपस्थिति दर्ज नहीं करा सकते.

केवल कुछ छोटी पार्टियों के विलय और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुर्मी वोटरों को लुभाने से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा.

पक्के तौर पर ये कहना भी मुश्किल है कि उत्तर प्रदेश के कुर्मी बिहार के मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी से ख़ुद को जोड़ पाएंगे.

अगर अपनी ही पार्टी में दम नहीं होगा तो फिर देश भर में नीतीश कुमार कैसे समर्थन हासिल करेंगे.

चुनाव अभियान में नरेंद्र मोदी की तरह नीतीश कुमार भी देश भर में बतौर बिहार की अपनी उपलब्धियां गिनवाएंगे.

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लेकिन उनकी उपलब्धियों के बावजूद बिहार एक ग़रीब और पिछड़ा राज्य है और इसीलिए 'बिहार मॉडल' बेच पाना संभव नहीं होगा.

बिहार की राजधानी पटना की खस्ता हालत राज्य की बदनामी कराएगी.

केवल एक ही तरीके से नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बन सकते हैं, जब कोई तीसरे मोर्चे का गठबंधन बने और उसे कांग्रेस का समर्थन हासिल हो.

ऐसे हालात को नकारा नहीं जा सकता है, ख़ासकर तब, जब 2014 के नतीजे दिखाते हों कि कांग्रेस को छोड़ कर अन्य राजनीयिक पार्टियों के वोट शेयर पर ज़्यादा असर नहीं पड़ा.

हालांकि गठबंधन की स्थिति में नीतीश कुमार पर एक पंचमेल समूह की आम सहमति होना कई कारणों पर निर्भर करेगा.

मसलन उत्तर प्रदेश, ओडिशा या तमिलनाडु की कोई पार्टी, जिसके पास नीतीश कुमार से ज्यादा सीटें हों, वो क्यों प्रधानमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार को समर्थन देगी?

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बहरहाल महत्वकांक्षा होना ग़लत नहीं है. जैसा कि नीतीश कुमार के गठबंधन सहयोगी लालू यादव ने एक बार कहा था, "हर कोई प्रधानमंत्री बनना चाहता है. लेकिन हमको कोई जल्दी नहीं है."

"आप एक योजना के बिना अस्त व्यस्त तरीके से प्रधानमंत्री नहीं बन जाते हैं."

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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