मवेशी भी बेहाल किसानों के सहारा न रहे

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तीन घंटे बीत गए लेकिन बाबा साहेब पांडुरंग अपने बैल के लिए ख़रीददार नहीं ढूंढ पाए हैं.

लगातार चार शनिवार से वो महाराष्ट्र के मराठवाड़ा स्थित अश्ति गांव के साप्ताहिक मवेशी बाज़ार आ रहे हैं.

भले ही ये जगह उनके गांव से 30 किलोमीटर दूर है फिर भी वो इस चिलचिलाती धूप में चलकर यहां आते हैं. इस उम्मीद के साथ कि उन्हें एक ख़रीददार मिल जाए.

हतोत्साहित होकर वो कहते हैं, "एक ख़रीददार मिलना कितना मुश्किल है."

उन्हें लेनदारों के पैसे चुकाने के लिए एक लाख़ रुपए चाहिए जो उन्होंने पिछले साल अपनी बेटी की शादी के लिए उधार लिए थे.

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लेकिन पांडुरंग की ही तरह महाराष्ट्र के लगभग सभी किसान अपने मवेशियों को बेचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

साल दर साल सूखे के कारण भारत के कई हिस्सों के किसान आर्थिक रूप से कंगाल हो चुके हैं.

फसलों से कोई कमाई नहीं होने पर पहले किसान अपने मवेशियों को कसाइयों को बेच देते थे.

लेकिन पिछले साल देवेंद्र फड़नवीस सरकार के महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) विधेयक पारित करने से बैलों को मारने के लिए बेचना अब अपराध है.

इस अपराध के लिए पांच सालों तक के लिए जेल या 10 हज़ार रुपए जुर्माने का प्रावधान है.

पहले ही वहां दशकों से गोहत्या पर पांबदी है. और अब बैलों की हत्या पर भी रोक लगा दी गई है.

हिंदू धर्म में गायों को पूजनीय माना जाता है इसलिए भारत के ज्यादातर राज्यों में गायों की हत्या प्रतिबंधित है.

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लेकिन पाबंदी लगाने का फैसला बैलों पर भी लगाए जाने से इसका असर किसानों पर पड़ा है.

बाज़ार में गोमांस व्यापारियों के नहीं होने से किसानों को अपने मवेशियों के लिए ख़रीददार नहीं मिल रहा है.

केवल साथी किसान इन्हें ख़रीद रहे हैं जिन्हें खेती के लिए गाय और बैलों की ज़रूरत है. लेकिन लगातार सूखे के कारण खेती पर असर पड़ने से ज्यादातर किसान मवेशी ख़रीदने में अक्षम हैं.

40 सालों से खेती करने वाले रघुनाथ राव शिंदे कहते हैं, "प्रतिबंध किसान-विरोधी है. इसने हमारी मुश्किलें और बढ़ा दी है."

अगर ऐसा संभव होता तो किसान कम से कम अपने मवेशी गोमांस व्यापारियों को बेचकर उन पैसों से बच्चों की स्कूल फीस या जून में शुरू होने वाले मॉनसून से पहले बीज ख़रीद सकते थे.

महाराष्ट्र सरकार के इस क़ानून को पारित करने को भारतीय जनता पार्टी की ओर से हिंदू धर्म को बढ़ावा देने के तौर पर देखा जा रहा है. मुसलमान सहित अल्पसंख्यक गुटों ने इस पर चिंता व्यक्त की है.

सरकार का कहना है कि ये फैसला किसी ख़ास समुदाय या धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं है बल्कि बैलों को बचाने के लिए है जो खेती के लिए ज्यादा ज़रूरी है.

लेकिन पार्टी के अंदर ही कुछ लोग, जैसे भाजपा विधायक भीमराव धोंडे, चाहते हैं कि किसानों के पक्ष में इस नीति को बदला जाए. उन्होंने कहा, "बूढ़े बैल खेती का कोई काम नहीं कर सकते और वो किसानों पर आर्थिक बोझ बन जाते हैं. इसलिए उन्हें अपने बूढ़े मवेशियों को किसी को भी बेचने का अधिकार होना चाहिए जो उन्हें इसके लिए अच्छे दाम दे सके."

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किसानों के लिए एक और चुनौती है कि वो अपने मवेशियों को चारा नहीं खिला पा रहे हैं. भयानक सूखे के कारण महाराष्ट्र के कई हिस्सों में पानी की भारी किल्लत है.

पैसे और पानी के अभाव में कई किसान अपने मवेशियों को सरकारी आश्रय घरों में भेज रहे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक गायों, बैलों और भैंसों को प्रतिदिन 70 लीटर पानी की ज़रूरत पड़ती है.

संतोष टैंकले हर रोज़ अपने मवेशियों को बीड़ के आश्रय घर लाते हैं. उनके पास पांच बैल हैं जिनमें से चार बूढ़े हो गए हैं. लेकिन वो उन्हें बेच नहीं पा रहे हैं.

उन्हें इन बैलों के चारे और पानी के लिए इन आश्रय घरों पर निर्भर रहना पड़ता है.

टैंकले कहते हैं, "मेरे बूढ़े बैल खेत में कोई काम नहीं कर सकते लेकिन मुझे नहीं पता कि मैं इनका क्या करूं."

जहां टैंकले जैसे कुछ किसान पूरा दिन इन आश्रय घरों में बिताते हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने बूढ़े मवेशियों को छोड़ दिया है.

आंकड़ों के मुताबिक मॉनसून आने से पहले तक राज्य में दो लाख़ से ज्यादा मवेशियों के लिए कई सौ अस्थायी आश्रय घर खोले गए हैं.

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये पर्याप्त नहीं है और करीब 40 लाख ऐसे पशुओं को आश्रय की ज़रूरत हो सकती है.

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गोमांस प्रतिबंध का प्रभाव महत्वपूर्ण हो गया है. राज्य में मवेशियों की कीमतों में 60 फीसदी की गिरावट आई है.

अप्रैल से दिसंबर के बीच गोमांस के निर्यात में 13 फीसदी की गिरावट आई है. एक के बाद एक कसाइघरों के बंद होने से हज़ारों गोमांस व्यापारी बेरोज़गार हो गए हैं.

कई आवेदकों ने इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी है.

पिछले हफ्ते ऐसे ही एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बाहर से महाराष्ट्र में आने वाले गोमांस पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा. लेकिन गाय, बैल और भैंसो की हत्या पर प्रतिबंध जारी रहेगा.

लेकिन इससे किसानों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है.

अभी के लिए किसान आने वाले मॉनसून की तैयारियों में जुटे हुए हैं और यही उम्मीद लगा रहे हैं कि इस साल बारिश हो जिससे उन्हें कुछ राहत मिले.

लेकिन बैलों के बेचने और हत्या पर लगे प्रतिबंध के कारण आगे उन्हें लंबे समय तक आर्थिक स्थिरता नहीं मिल पाएगी.

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