वाराणसी के घाटों के 'डेथ फोटोग्राफ़र'

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दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक वाराणसी हिंदू धर्म की राजधानी भी कही जा सकती है. यहां के गंगा घाटों को बेहद पुण्य माना जाता है.

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वाराणसी में कई घाट हैं जहां देश भर से लोग पूजा करने और पुण्यदायिनी गंगा में डुबकी लगाने के लिए आते हैं.

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वाराणसी के दो घाट हिंदुओं के अंतिम संस्कार के लिए आरक्षित हैं.

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ऐसे ही एक घाट में बीबीसी के विकास पांडे की मुलाकात कुछ लोगों से हुई जो खुद को 'डेथ फोटोग्राफर' कहलाते हैं.

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हिंदू मानते हैं कि अगर किसी के मरने के बाद उसका वाराणसी में अंतिम संस्कार किया जाता है तो मरने वाले को जन्म और मृत्यु के बंधन से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है

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अधिकांश घाट प्राचीन गलियों और गलियों की भूलभुलैया से जुड़े हुए हैं. ऐसी ही गलियों में 'डेथ फोटोग्राफर' अपना अस्थायी स्टूडियो चलाते हैं.

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कई लोग इन फोटोग्राफरों से मृतक के साथ एक आखिरी फोटो खींचने के लिए कहते हैं. ऐसा वो कई कारणों से करते हैं. कुछ के लिए ये यादगार के तौर पर तो कुछ के लिए आधिकारिक कागज़ों में सबूत की तरह इस्तेमाल करने के लिए खींचा जाता है.

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इंद्र कुमार झा अपने पिता के पद चिह्नों पर चलकर करीब एक दशक से मणिकर्निका घाट में बतौर फोटोग्राफर काम कर रहे हैं. वो कहते हैं, "मुझे अभी भी अपने शुरुआती दिन याद हैं. वो आसान नहीं था लेकिन अब मैं सहज हो गया हूं और इसे किसी दूसरी नौकरी की ही तरह मानता हूं. अगर एक आखिरी तस्वीर किसी दुखी परिवार को थोड़ी सांत्वना देती है तो मैं संतोष महसूस करता हूँ."

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झा वाराणसी की किसी गली में रहते हैं और हर रोज़ अंतिम संस्कार वाले घाट पर जाते हैं. कई बार वो 12 से 15 घंटे प्रति दिन मृतकों की तस्वीरें खींचते हैं. वो हर दोपहर भोजन करने के लिए घर जाते हैं. उनका कहना है कि ये काम आसान नहीं है. इसलिए काम से थोड़ी देर का ब्रेक मस्तिष्क के लिए सही रहता है.

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इंद्र कुमार एक छोटे डिजिटल कैमरे का इस्तेमाल करते हैं और पास ही के एक दुकान में फोटो प्रिंट कराते हैं. वो दो तस्वीरों के लिए 200 रुपये लेते है. लेकिन किसी मृतक बच्चे या मृतक जवान आदमी की तस्वीर खींचने के लिए कोई भी फोटोग्राफर कीमत नहीं लेता. झा के मुताबिक वो पहले एक दिन में तीन से पांच हज़ार तक कमा लेते थे लेकिन मोबाइल फोन आने से उनके काम पर असर पड़ा है. वो कहते हैं कि अब दिन में हज़ार रुपये कमाना भी बड़ी बात है.

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लेकिन कुछ ऐसे भी फोटोग्राफर हैं जो खुद की पहचान छुपाना चाहते हैं. उनके मुताबिक वो नहीं चाहते कि दूसरे लोग उनके इस काम के बारे में चर्चा करें. एक फोटोग्राफर ने कहा कि वो इस काम को छोड़कर शादियों में तस्वीरें खींचना चाहते हैं. उनका कहना था कि वो अपनी ज़िंदगी शवों, शोक में डूबे परिवारों, दुख और आंसुओं के बीच नहीं गुज़ारना चाहते हैं.

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