'नौसेना कैप्टन जो साथियों की जान बचाता रहा...'

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भारतीय नौसेना में ऐसा कोई लिखित आदेश नहीं है कि अगर कोई युद्ध पोत डूब रहा हो, तो उसका कैप्टन भी उसके साथ जल समाधि ले. ये महज़ एक नौसैनिक परंपरा है और उसका हाल की नौसैनिक लड़ाइयों में कभी भी पालन नहीं किया गया है.

1982 के फ़ॉकलैंड युद्ध में ब्रिटेन और अर्जेन्टीना दोनों पक्षों के कुल सात युद्धपोत डुबोए गए, लेकिन सभी के कैप्टन न सिर्फ़ बच निकले बल्कि बाद में उन्होंने अपने संस्मरण भी लिखे.

23 मई, 1941 को लार्ड माउंटबेटन का पोत 'एचएमएस केली' नौसैनिक एक्शन में डूब गया, लेकिन वो अपने पोत के साथ समुद्र के गर्त में नहीं समाए.

लेकिन कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला दूसरी मिट्टी के बने थे.

6 दिसंबर, 1971 के आसपास भारतीय नौसेना को संकेत मिले कि एक पाकिस्तानी पनडुब्बी दीव के तट के आसपास मंडरा रही है.

नौसेना मुख्यालय ने आदेश दिया कि भारतीय जल सीमा में घूम रही इस पनडुब्बी को तुरंत नष्ट किया जाए और इसके लिए एंटी सबमरीन फ़्रिगेट आईएनएस खुखरी और कृपाण को लगाया गया. दोनों पोत अपने मिशन पर आठ दिसंबर को मुंबई से चले और नौ दिसंबर की सुबह होने तक उस इलाक़े में पहुँच गए, जहाँ पाकिस्तानी पनडुब्बी 'हंगोर' के होने का संदेह था.

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लंबी दूरी से टोह लेने की अपनी क्षमता के कारण 'हंगोर' को पहले ही खुखरी और कृपाण के होने का पता चल गया. यह दोनों पोत ज़िग ज़ैग तरीक़े से पाकिस्तानी पनडुब्बी की खोज कर रहे थे. हंगोर ने उनके नज़दीक आने का इंतज़ार किया. पहला टॉरपीडो उसने कृपाण पर चलाया.

हंगोर के कैप्टन लेफ़्टिनेंट कमांडर तसनीम अहमद याद करते हैं, "पहला टॉरपीडो कृपाण के नीचे से गुज़रा लेकिन फट नहीं पाया. इसे आप एक तरह की तकनीकी नाकामी कह सकते हैं. भारतीय जहाज़ों को हमारी पोज़ीशन का पता चल चुका था, इसलिए मैंने हाई स्पीड पर टर्न अराउंड करके खुखरी पर पीछे से फ़ायर किया. डेढ़ मिनट की रन थी और मेरा टॉरपीडो खुखरी की मैगज़ीन के नीचे जा कर फटा और दो या तीन मिनट के भीतर जहाज़ डूबना शुरू हो गया."

खुखरी में परंपरा थी कि सभी नाविक ब्रिज के पास इकट्ठा होकर रात आठ बजकर 45 मिनट के समाचार एक साथ सुना करते थे, ताकि उन्हें पता रहे कि बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है.

समाचार शुरू हुए, “यह आकाशवाणी है, अब आप अशोक बाजपेई से समाचार...” समाचार शब्द पूरा नहीं हुआ था कि पहले टॉरपीडो ने खुखरी को हिट किया. कैप्टन मुल्ला अपनी कुर्सी से गिर गए और उनका सिर लोहे से टकराया और उनके सिर से ख़ून बहने लगा.

दूसरा धमाका होते ही पूरे पोत की बत्ती चली गई. कैप्टन मुल्ला ने मनु शर्मा को आदेश दिया कि वह पता लगाएं कि क्या हो रहा है. मनु ने देखा कि खुखरी में दो छेद हो चुके थे और उसमें तेज़ी से पानी भर रहा था. उसके फ़नेल से लपटें निकल रही थीं.

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उधर सब लेफ़्टिनेंट समीर कांति बसु भाग कर ब्रिज पर पहुँचे. उस समय कैप्टेन मुल्ला चीफ़ योमेन से कह रहे थे कि वह पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख को सिग्नल भेजें कि खुखरी पर हमला हुआ है.

इससे पहले कि बसु कुछ समझ पाते कि क्या हो रहा है, पानी उनके घुटनों तक पहुँच गया था. लोग जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे थे. खुखरी का ब्रिज समुद्री सतह से चौथी मंज़िल पर था. लेकिन मिनट भर से कम समय में ब्रिज और समुद्र का स्तर बराबर हो चुका था.

कैप्टेन मुल्ला ने बसु की तरफ़ देखा और कहा, 'बच्चू नीचे उतरो.' बसु पोत के फ़ौलाद की सुरक्षा छोड़ कर अरब सागर की भयानक लहरों के बीच कूद गए. समुद्र का पानी बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडा था और समुद्र में पाँच-छह फ़ीट ऊँची लहरें उठ रही थीं.

उधर मनु शर्मा और लेफ़्टिनेंट कुंदनमल भी ब्रिज पर कैप्टेन मुल्ला के साथ थे. मुल्ला ने उनको ब्रिज से नीचे धक्का दिया. उन्होंने कैप्टन मुल्ला को भी साथ लाने की कोशिश की, लेकिन कैप्टन ने इनकार कर दिया.

जब मनु शर्मा ने समुद्र में छलांग लगाई, तो पूरे पानी में आग लगी हुई थी और उन्हें सुरक्षित बचने के लिए आग के नीचे से तैरना पड़ा. थोड़ी दूर जाकर मनु ने देखा कि खुखरी का अगला हिस्सा 80 डिग्री का कोण बनाते हुए लगभग सीधा हो गया है. पूरे पोत मे आग लगी हुई है और कैप्टन मुल्ला अपनी सीट पर बैठे रेलिंग पकड़े हुए हैं.

Image caption कैप्टन मुल्ला की बेटी अमिता मुल्ला बीबीसी स्टुडियो में.

जब अंतत: खुखरी डूबा तो बहुत ज़बरदस्त सक्शन प्रभाव हुआ और वह अपने साथ कैप्टन मुल्ला समेत सैकड़ों नाविकों और मलबे को नीचे ले गया. कैप्टन मुल्ला की बेटी अमीता मुल्ला वातल, इस समय दिल्ली के मशहूर स्प्रिंगडेल स्कूल की प्रिंसिपल हैं. उस समय वो महज़ 15 साल की थीं.

अमीता बताती हैं, “उस समय हम दोनों बहनें शिमला के जीज़स एंड मैरी कॉन्वेंट में पढ़ा करते थे. हम लोग छुट्टियों में अपने माता पिता के पास मुंबई आए हुए थे. हम लोग 10 दिसंबर को अपने घर में बैठे हुए थे. कैप्टन कुंते, जो हमारे फ़ैमिली फ़्रेंड थे और बाद में एडमिरल बने, वो हमारे घर आए.”

“उन्होंने मुझसे कहा अपनी माँ को बुलाओ. उन्होंने मेरी माँ से कहा हिज़ शिप हैज़ बीन हिट... ये सुनते ही मेरी माँ नीचे ज़मीन पर बैठ गईं. वो सोफ़े पर नहीं बैठीं. उनके मुंह से तुरंत निकला अब वो वापस नहीं आएंगे. इसके बाद वो अजीब तरह से कांपने लगीं. मैं अंदर से कंबल ले आई और उन्हें उढ़ाया. अगले दिन एडमिरल कुरविला की बीवी ने मेरी माँ से कहा कि बचने वालों में कैप्टेन मुल्ला नहीं हैं. उनको आख़िरी बार लोगों को बचाते हुए देखा गया था.”

Image caption इयान कारडोज़ो बीबीसी हिंदी स्टुडियो में.

जनरल इयान कारडोज़ो ने खुखरी के डूबने पर एक किताब लिखी है. जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि क्या खुखरी को हंगोर से बचाया जा सकता था तो उनका कहना था, “अगर खुखरी की हिफ़ाज़त में लगे सी किंग हेलिकॉप्टर शाम साढ़े छह बजे के बाद वहाँ से हटा नहीं लिए गए होते. उन हेलिकॉप्टरों की कमान भी कैप्टेन मुल्ला के हाथ में नहीं थी.”

“किसी भी नौसेना का ये क़ायदा होता है कि अगर किसी इलाक़े में पनडुब्बी होने का संदेह हो तो पोत ज़िगज़ैग बनाते हुए चलते हैं. खुखरी भी यही कर रहा था जिसकी वजह से उसकी रफ़्तार धीमी हो गई थी. उस समय खुखरी पर नए क़िस्म के सोनार का भी परीक्षण चल रहा था, जिससे उसकी रफ़्तार और धीमी हो गई थी. यही वजह थी कि हंगोर को उसे अपना निशाना बनाने में आसानी हुई.”

जिस समय कैप्टेन मुल्ला की मृत्यु हुई, उनकी पत्नी सुधा मुल्ला केवल 34 साल की थीं.

Image caption कैप्टन मुल्ला की पत्नी सुधा मुल्ला बीबीसी से बातचीत करते हुए.

सुधा याद करती हैं, “शादी के बाद मैंने महसूस किया कि ये इतने मेच्योर आदमी हैं कि मेरी बातें तो उन्हें मज़ाक़ लगती होंगीं. इनके जितने भी दोस्त थे सब इनसे उम्र में 15-20 साल बड़े थे. ये अपनी उम्र वालों को बहुत सतही समझते थे. हालांकि वो मुझसे तेरह साल बड़े थे लेकिन मुझसे बहुत ठीक से पेश आते थे. मेरी किसी भी इच्छा को उन्होंने न नहीं किया. जब हमारी लंदन में पोस्टिंग हुई, तो मैंने कहा कि मैं सारा यूरोप देखना चाहती हूँ. उन्होंने कहा तुम फ़िक्र न करो, मैं बच्चों को देख लूँगा. बच्चे बहुत छोटे हैं. इन्हें घुमाने ले जाने का कोई तुक नहीं है. उन्होंने मुझे सारा यूरोप घुमाया.”

कैप्टेन मुल्ला की सोच आम आदमियों जैसी नहीं थी. उन्हें ये क़तई पसंद नहीं था कि जन्मदिन के मौक़े पर उपहार दिए या लिए जाएं. अमीता याद करती हैं, “वो हमसे कहते थे आप जाएंगी जन्मदिन पर और ज़ोर से कहेंगी... हैपी बर्थ डे, मैं बिना गिफ़्ट के आई हूँ, क्योंकि आपने मुझे बुलाया है मेरे गिफ़्ट को नहीं. हमें बड़ी शर्म आती थी. मम्मी से जा कर कहते थे कि कुछ तो दे दो. लोग कहेंगे बहुत ही कंजूस बच्चे हैं. बेचारी मेरी माँ पीछे से टॉफ़ी का एक डिब्बा पकड़ाती थीं. लेकिन वो इस पर भी नज़र रखते थे. हमारे बैरे से पूछते थे कहीं बच्चे टॉफ़ी का डिब्बा तो नहीं ले जा रहे?”

अमीता बताती हैं कि कैप्टेन मुल्ला उनका शब्दकोष बढ़ाने के लिए काफ़ी जतन करते थे. वे कहते हैं, “हमारे पिता हमारे साथ स्क्रैबल और क्रास वर्ड बहुत खेलते थे. उससे हम लोगों का शब्दकोष बहुत बढ़ा. उनकी दोस्ती बहुत यूनीक लोगों के साथ होती थी. बेगम अख़्तर हमारे यहाँ आती थीं. वो हारमोनियम बजाते थे और दोनों साथ गाते थे. ऐ मोहब्ब्त तेरे अंजाम पे रोना आया उनकी पसंदीदा ग़ज़ल हुआ करती थी.”

“महर्षि महेश योगी भी हमारे यहाँ पधारते थे. एक बार वो अपने पूरे दल के साथ हमारे यहाँ आ कर रुके थे. फ़िल्म के हीरो 'राज कुमार' और याक़ूब से भी उनकी गहरी दोस्ती थी. उनका एक ब्रिज सर्किल हुआ करता था जिसमें बौद्धिक लोग भाग लिया करते थे. इससे हमारा रुझान कला, विविधता और तरह तरह के इंसानों से रिश्ता बनाने की तरफ़ बढ़ा.”

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सुधा मुल्ला बताती हैं कि कैप्टेन मुल्ला अपना सारा वेतन उनके हाथ में रख देते थे और फिर थोड़ा पैसा अपना मेस बिल और सिगरेट कें ख़र्चे के लिए वापस ले लिया करते थे. मेरे साथ की अफ़सरों की बीवियाँ इस बात पर हैरत भी किया करती थीं. उनका प्रिय वाक्य हुआ करता था मुश्किल है लेकिन मुमकिन है. वो उनसे 6 दिसंबर, 1971 को आख़िरी बार मिली थीं जब वो उनसे मिलने के बाद फिर बाहर से वापस लौट कर आए थे और बोले मेरी पूरी बाँह वाली जर्सी निकाल दो क्योंकि डेक पर तेज़ हवा चलने से सर्दी लगती है.

“जब मेरे दोस्त के पति ने आ कर बताया कि महेंद्र सरवाइवर्स में से हैं, तो मेरा माथा ठनका. मैं तभी समझ गईं कि अब ये वापस नहीं आएंगे. मैं ये कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि ये मुसीबत में घिरे अपने साथियों को छोड़ कर अपनी जान बचाएंगे. बाद में बचे हुए लोगों ने मुझे बताया कि उन्होंने किसी को लात मार कर नीचे समुद्र फेंका था ताकि उसकी ज़िंदगी बच जाए. उन्होंगे एक सेलर को अपनी लाइफ़ जैकेट भी दे दी.”

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मुल्ला चाहते तो अपनी लाइफ़ जैकेट पहन कर अपनी जान बचा सकते थे लेकिन उन्हें मालूम था कि खुखरी के लोवर डेक पर सौ से ऊपर नाविक फ़ंसे हुए थे और वो उन्हें चाह कर भी नहीं बचा सकते थे. उन्होंने तय किया कि वो अपने साथियों और जहाज़ के साथ जल समाधि लेंगे.

अमीता मुल्ला कहती हैं, “जिस तरह से वो गुज़रे हैं उसकी वजह से मैं बहुत अलग क़िस्म की इंसान बनी. वो इसके अलावा कुछ और कर ही नहीं सकते थे. उनका जो मिज़ाज था जो उनका वैल्यू सिस्टम था उसमें वो कोई ऐसी चीज़ कर ही नहीं सकते थे कि वो दूसरों को उनके हाल पर छोड़ कर अपनी जान बचा लें. अगर वो ऐसा नहीं करते तो वो पापा नहीं होते वो कोई और इंसान होता. उनके इस फ़ैसले से यह साफ़ हो गया कि ही वाज़ वाट ही सेड ही वाज़.”

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